Saturday, May 16, 2009

युद्ध दावानल की तरह भारत भूमि पर फ़ैल गया। वही हुआ जो श्रीकृष्ण चाहते थे। धर्म की विजय। कर्ण की महत्वाकांक्षा, द्रौपदी का दर्प, अर्जुन का मतिभ्रम, भीम का अंहकार, युधिष्ठिर की भीरुता, दुर्योधन की लिप्सा, शकुनी का कपट, भीष्म की अंधभक्ति, अश्वाथ्थामा की कुंठाए, द्रोणाचार्य का अभिमान, सभी इस युद्ध की लपटों में स्वाहा हो गया। हर वासना इस अग्नि में जल कर महत्वहीन हो गई।

हर लिप्सा समाप्त हो जाती है। सबका अंत वही होता है भस्मीभूत। सभी अनंतेव महादेव की शरण में। त्रिकाल दर्शी महाकाल की लपेट में। हर सृजन विलुप्त हो जाता है, हर क्षण एक नई सृष्टि का जन्म होता है हर क्षण एक नई मृत्यु को गले लगाने के लिए। माया अपना चरम स्वरुप दिखलाती है भस्मीभूत हो जाने के लिए, और तब यह सूक्ष्म शरीर तपता है गरम गरम आंच से जिसकी पवित्रता गंगा जैसी है, जो स्पर्धा से विहीन है और अस्तित्व रखती है इस अन्तरिक्ष में केवल स्वयं के लिए, वह केंद्रित होती है उस उज्जवल परम प्रकाशित सूर्य में विलीन हो जाने के लिए जो सूर्य फिर विलीन हो जाता है एक ऐसे प्रकाश के गह्वर में जो चिरकाल से प्रकाशमान है। जब जब अन्धकार गहन हो जाता है, अनेको शक्तिया एकजुट हो जाती है इस अंधकारमय जीव को प्रकाश का रास्ता दिखलाने।

जीवन काल एक चिता के समान है जिसमे जीव जलता है, जब जलता है तो पवित्र हो जाता है, पवित्र हो जाता है तो पिछले कर्मो से छूट जाता है, पिछले कर्मो से छूट जाता है तो नवीन रचना की ओरे उन्मुख हो जाता है क्योकि सृष्टि बनी है जन्म से, मरण से और इन सबके बीच बसी हुयी माया से।

मेरा सादर प्रणाम उस मयूर पंख धारी पुरूष को जो परा, अपरा से परिचित है, जिसने मेरे भीतर उस पवित्र अग्नि को प्रज्ज्वलित किया। जिसने मुझे हर क्षण रुलाया, मेरे भीतर की मलिनता को मेरे नयनो के आसुओ से धोया, जिसने मुझसे मेरा साक्षात्कार कराया। उस काम, अकाम, तपस्या, सौंदर्य, असौंदर्य, आदि सभी शक्तियों को मेरा प्रणाम है जो सदैव मनुष्य को आगे के पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करेगी।

युधिष्ठिर ने इतना कह कर द्रौपदी इत्यादि के साथ प्रयाण का संकल्प लिया।

HARYASHWA!