Saturday, January 31, 2009

कन्हाई, ओ कन्हाई? माता यशोदा पूरे गोकुल में फिर आई पर कान्हा का नाम नही।

घबरायी परेशान पूरे ग्राम में फिरती हुई पूछ रही है। ललिता ने माता से कहा, यशोदा बहन, अपना कन्हाई जो देखना हो तो ग्राम भर में काहे देख आती हो, जाओ मिल जाएगा जमुना तीरे, गोपियों के आस पास।

यशोदा ने उग्र दृष्टि से ललिता की और देखा, बेचारी ललिता वहीसहम कर रह गई। door

khadi सखिया hans पड़ी। मिल गया कन्हाई। वह तो हाथ आने से रहा।

यशोदा maiya ने बस राधा से ही नही poocha की कान्हा कहा है? फिर raadhe batlaati, की वह तो ऊंचे kadamb के पेड़ पर muh fulaye baitha है। कहता है, मुझे परेशान मत करो। ये लो, साल भर की सबसे bari ख़बर तो यही है की कान्हा परेशान होने लगा। वह भी सब को परेशान करने के बाद, अब स्वयं ऐसे baitha है जैसे की doodh dhoola हो। हा हा कान्हा, कितने bhole हो, कितने neereeh, तुम तो कुछ करते ही नही हो। वो तो zalim zamaana है जो तुम्हारे पीछे पड़ा rahata है। बेचारा जब gaiya charaata rahata है, तो gav भर की ladkiya उसके पीछे पीछे ghumti ghumti है। और kanh ladkiyo से परेशान हो ऊंचे पेड़ पर चढ़ कर baitha है, कहता है, मुझे परेशान करना band करो। किया बाबा, किया बाबा। अब khabardaar जो नयन matakka किया तो। जान ले lungi। radhe ने वही dhamkate हुए कहा। beimaan। darsal हुआ yu की radhe ने बस yu ही कान्हा से पूछ लिया के कान्हा तुम वैसे तो मुझे ही देखते rahate हो, परन्तु जब gav से bahar कही जाते हो तो बता कर क्यो नही जाते? गोकुल के भीतर तो ऐसे rahate हो जैसे मेरे और तुम्हारे सिवा कोई और है ही नही, परन्तु, जब nandbaba का एक chakkar mathura जैसे नगरी में लगता है, तो काहे की radhe? फिर कहा kanh को याद raadhe की? बस इतना sa prashn poocha था, की कैसे हो? जवाब भी नही दिया? बस यही तो poocha था की काहे घड़ी घड़ी girgit जैसे रंग बदलते हो? कभी एकदम सज्जन, tauba रे tauba, ऐसा लग रहा था, अभी lagn mandap में जाकर सात phere ले लेगा, और नही तो बस गोकुल के bahar कदम रखने की देर है, कान्हा गायब। फिर raadhe को chinta की यह kanh स्वप्न जैसा सामने rahata है। गायब हो जाता है। वह उसके जीवन में है या केवल kalpanao में? क्या ग़लत है?

कान्हा ठीक ठीक radhe को samajha दो की tumhara उससे कोई लेना देना नही है। नही sochegi बेचारी तुम्हारे बारे में दिवस भर baith कर। सवेरे तुम्हारे khayalo में khoyi khoyi matka baha आई जमुना में।

तो कान्हा gussaya तो चढ़ गया पेड़ पर। muh fula कर। कहने लगा, मैंने तो नही कहा ladkiyo को पीछे padne के लिए। और kahs तौर पर उस राधा को। कौन कहता है उसे की इतनी दूर जमुना तीरे panghat पर baansuri सुन ने chali आए। हा भाई कान्हा को ladkiyo की कोई कमी नही। gopiya भरी पड़ी है ग्राम में, ग्राम में ही क्यो shaharo में, jaha जाए waha? फिर kanh क्यो सूचित करने लगा radhe को की वह कहा है। क्या ज़रूरत है। मत करो। radhe paagal है। उसे samjhaana होगा की इस ladke के बारे में khabardaar जो vichaar भी किया। दुष्ट।

Wednesday, January 28, 2009

राह की धूल से भरे हुए श्रीकृष्ण समीप की झील में स्वयं का मुख निहारने लगे। साथ में लाये हुए वस्त्र व् शस्त्र उन्होंने युधिष्ठिर को सौप दिए। झील की नैसर्गिक सीढियों से उतर कर पानी की सतह पर वे अपने बाहुओ को निहारने लगे। दिन प्रतिदिन उन्होंने ब्रह्मचारी अवस्था से स्वयम का गठन किया है। तब वे यह नही जानते थे की इस प्रशिक्षण का तात्पर्य क्या है। बस इतना जानते थे की हर कार्य का एक तात्पर्य होता है। हर कर्म के पीछे एक उद्देश्य होता है। प्रकृति यु ही खेल नही खेलती। इस ब्रह्माण्ड की हर एक प्रतिक्रिया व् क्रिया का एक धर्म होता है जिसे वह अपने अनुशासन में ढालती है। वस्त्र हटतेही कृष्ण का योद्धा स्वरुप गठित रूप प्रकट हो गया। ब्रह्मण के कोमल रूप में उन्होंने बखूबी स्वयं को छिपा लिया था। अपने मन मस्तिष्क में वे स्वयम को धूल व् स्वेद से भरे हुए युद्धभूमि में शत्रुओ से घिरे हुए स्पष्ट देख सकते थे। बाकी के राजा तो कल जब युद्ध होगा तब लडेंगे परन्तु कृष्ण ने मस्तिष्क में आज ही सम्पूर्ण रचना देख ली थी। वे देख चुके थे क्रिपाचार्य, द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह का युद्ध कौशल। शत्रु को कभी कम नही आंकना चाहिए। गुप्त विद्या ओ के पारखी है श्रीकृष्ण। पर उनके इस वर्तमान में एक और प्रश्न है, युद्ध तो बाद की बात है, पहला प्रश्न है पांडवो की योग्यता। कितने योग्य है वे इस युद्ध को jeetane के लिए। राजसिक युध्ध्कौशल बाद की बात है, पहले कितने बुलंद हौसले है उनके? उन्होंने पञ्च पांडवो को हस्तिनापुर से सर झुकाए निष्कासित हो देखा था। द्रौपदी वस्त्र हरण ने पांडवो की कमर तोड़ दी है। पिता पांडू के वंश से यह बर्बरता शुरू ही है। पांडू में इतनी शक्ति नही थी की राजसिंहासन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते। उन्हें तो अपने काम के वेगो को भी नियंत्रित करना भारी पड़ता था। काम! कृष्ण मन ही मन मुस्का दिए। यह भी एक शक्ति है। अपव्यय की जाए तो अत्यन्त विध्वंसकारी, यदि सहेजी जाई तो परम अचूक शक्ति। कृष्ण यु ही तो योगेश्वर नही कहलाते? कदाचित ये विद्या उन्होंने राधा से ही सीखी है। समस्त रस्नाओ व् इन्द्रियों को एक dhuri पर lakar, वे उन्हें एक केन्द्र पर केंद्रित कर देते है, अंतस को निर्विकार कर, स्पष्ट श्वेत ओज का रूप देकर वे स्वयं उस में समाहित हो जाते है। तब यही काम बन जाता है उनका शस्त्र , कवच, आकर्षण, विकर्षण, शक्तिपुंज। यही केन्द्र है तेजस्व का, शौर्य का!

काम को केंद्रित करने की आवश्यकता तब पड़ती है जब व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक रूप से गठित होने लगे। समस्त प्राणी जगत आवाक हो कृष्ण को निहारते रहते है। उनका आकर्षण कदाचित ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले नक्षत्र व् गृह भी महसूस करते होंगे। पता नही कृष्ण गृहों को मात देते है या गृह ही इर्ष्या वश कृष्ण के पीछे पड़े रहते है? कृष्ण अपनी कल्पना पर हंस पड़े।

पांडवो ने दुर्भाग्यवश नही अपितु पितृ व् माता द्वारा पाए हुए अनुवांशिक गुणसूत्र के दुर्गुणों का हिसाब चुकता किया है। कुंती स्वभावतः भीरु प्रवृत्ति है। किसी और से प्रेम करते हुए भी वह पांडू रोग से पीड़ित राजकुमार से विवाह करने के लिए बद्ध थी। वे वन वन इसलिए नही भटक रहे की शकुनी शक्तिशाली है अपितु इसलिए भटक रहे है क्योंकि उन्होंने स्वयम को, व् अपने केन्द्र को यह संदेश अभी तक नही दिया है की वे ही इस राजसिंहासन के हकदार है। अपने अंतर्मन से भयभीत पांडव अपनी पत्नी की रक्षा नही कर पाए। अपने मन के सम्मुख दुर्बल पड़ता अर्जुन अपनी प्रिया को खो आया। केवल इच्छा काफ़ी नही होती कुछ पाने के लिए, उसेतन, मन, धन, आत्मा से पाने की अभिलाषा करनी पड़ती है। वही होती है इच्छाशक्ति। उसे ही विजय कहा जाता है। और वही होती है विजय होने के लिए। संभावनाओ का कोई अर्थ नही होता। उन्हें सम्भव बनाया जाता है। अकास्मात कुछ नही होता उसे मन व् तन की इच्छा से किया जाता है। बस इच्छा कितनी बलवती है, यही जानने जैसा है। और फिर वह कितनी सही है? उसे होना चाहिए या नही? पर ये सब गौण है। पांडवो का अंतस विक्सित करना पड़ेगा। तभी होगा कृष्णा का प्रतिशोध पूरा। अन्यथा पांडव कृष्णा की दृष्टि में केवल कुचले हुए कीडे है, वह कभी उनका सम्मान नही करेगी।

कृष्ण अर्जुन की ओर देखने लगे। इसे अभी बहुत कुछ सीखना है। ये परिपक्व नही है। न तो युद्ध के लिए और न ही स्त्री के लिए। अभी बहुत काम बाकी है।

Tuesday, January 27, 2009

कृष्ण की चुप्पी बौखलाने वाली है। न तो कुछ कहता है, न कुछ बोलता है। गहरी गहरी मूक आँखे न जाने क्या कहती रहती है, जिन्हें पढ़ना जैसे किसी विदेशी लिपि को पढने जैसा है, या फिर एक ऐसे प्राचीन अवशेष पर आधी मिटीआधी लिखी विलुप्त भाषा जिसे पढने का आखरी स्त्रोत भी कही विलुप्त हो गया हो।

वह किसी पहेली से कम नही लगता। एक तरफ़ ढीटहै तो दूसरी तरफ़ उतना ही तरल। श्यामल छवि, विद्युत् गति, गंभीर दृष्टि, स्नेहल मुस्कान, कभी उदास, तो कभी कही अंतस में खोया खोया, कभी एकदम ही विपरीत। चंचल नयन, और समस्त दुनिया से लापरवाह, अपने मन का राजा।

कौन सा चेहरा सच्चा है? समझ में नही आता। उसकी आवाज़ में एक शून्य है। एक अंतराल। दिखावे की खनक। ह्रदय बटोर कर जैसे सारे शब्दों का जंजाल रचता हो, और फिर स्वयं ही समझ जाता हो की वह झूट बोल रहा है, और वह भी उससे जिससे उसकी जिव्हा बात नही करती केवल नयन बोलते है। नयनो को भी झूट बोलना सिखा दो मयूर धारी। फिर कोई झंझट नही रहेगा। कोई तड़प नही। कोई परेशानी नही। कोई सवाल भी नही आएगा। कोई जवाबदारी भी नही। कोई जंजाल ही नही।

कभी कभी वह जैसे एक कोरे पर्ण पर एक कलाकार की खीची हुई कलाकृति जैसा लगता है। उसकी चुप्पी मेरे ह्रदय को विदीर्ण करती है। उसकी आवाज़ मेरे ह्रदय के आर पार हो जाती है। वह श्यामल सघन मूर्ती मेरे मानस पर स्पष्ट अंकित हो जैसे सर्वदा प्रतीक्षारत है। जिसकी मौन बांसूरी भी कोई संगीत छोड़ जाती है फिर फिर कानो में गूंजने के लिए।

उसकी बेचैन करवटें, उसकी सहमी हुई स्थिरता, जैसे कोई मृग शावक इधर उधर कुछ टटोलता, न जाने क्या खोजता, बरबस स्वयं को भीतर से कचोटता या फिर बड़े यत्न से संभालता हुआ नितांत दर्शनीय है। वह थका हुआ प्रतीत होता है अपने मन के उठाते हुए उफानों से। सुकोमल, सुकुमार कदाचित ही किसी तूफ़ान के थपेडो से गुज़रा हो। जैसे किसी फूल की कोमल पंखुडी पर संभल कर गिरी हुई ओस की बूँद हो। मेरा दिल नही करता उसे परेशान करने का। समय की कोई कठोर दृष्टि भी न पड़े उस पर। मेरा क्या तलवारों सी कही भी टकरा जाती हु। आवारा हवाओ की तरह सायं सायं गलियों से, रास्तो से, पर्वतो से टकराना मेरी आदत में शुमार है। मे कड़कती धुप तो वह श्यामल बादल। में फूटता निर्झर तो वो शांत साहिल। में एक आंसू तो वो सीप। में केवल रेत तो वह स्वाति नक्षत्र की अम्रित्बून्द। उसका मेरा मेल नही है। वह मेरे जैसा नही है और में उसके जैसी नही हु। फिर भी वह रहता है मेरे ह्रदय में। मुझ में। वह स्वप्नवत मेरे सामने रहता है, और में भरी नींद में उसे जी भर देख लेती हु। जानती हु नींद से उठूंगी तो वह नही होगा मेरे आसपास। तब यही आवारा रास्ते और में।

और बस उसका नाम।

राधे कृष्ण की स्मृतियों में विलीन थी।

Friday, January 23, 2009

भोर होने के पहले ही सारथि ने कृष्ण को चेताया। कृष्ण ने रात्रि शिला पर ही बितायी थी। सारथि सुघड़ धनुर्धर व् तल्वार्बाज़ था। कृष्ण का सर्वश्रेष्ठ अंगरक्षक। अब आगे रथ ले जाना कृष्ण ने उचित नही समझा। इस बीहड़ जंगल में वे एक भी संकेत देना नही चाहते थे। दुर्योधन ने अवश्य ही गुप्तचरों का जाल बिछाया होगा। अब तक तो पूर्ण द्वीप के प्राय : सभी नरेशों के पास शकुनी ने संदेश अथवा धमकी पंहुचा दी होगी। पांडवो को समर्थन करने वाला दुर्योधन के कोप का भागी होगा। इस स्थिति में वैसे भी शायद ही कोई समर्थन में आए। द्रौपदी कांड ने पांडवो के विरुद्ध वातावरण खड़ा कर दिया है। स्वयं बलराम पांडवो के विरुद्ध है। गुप्तचरों ने यहाँ तक कहा है की भीष्म पितामह, गुरु द्रोन, व् अंगनरेश कर्ण पांडवो के विपक्ष में ही है। समय जैसे पूर्णतया दुर्योधन के पक्ष में व् पांडवो के विरुद्ध हो गया है। वे अकेले ही इस समय इस समस्या से जूझ रहे है।

कृष्ण का स्वभाव नही है चिंतित होना। वे एक मुस्कान रख कर बड़ी से बड़ी विपदा का सामना कर पाते है। बड़ी बात है यह है की उनका गणित उन्हें कभी धोखा नही देता। जैसे सभी कुछ वे अपनी अंगुलियों पर गिन कर बता सकते है की भविष्य में क्या होने वाला है। जैसे की यह सूर्य भी उनके ही इशारो पर निकलता या ढलता हो।

बीहड़ वन का अन्धकार भोर के सूर्य की किरणों से संघर्ष कर रहा है। वन इतना गहन है की सूर्य भी मंद पड़ जाता है। कृष्ण ने स्वयं को संयंत किया व् अंगरक्षक को दूर ही रहने का संकेत कर पांडवो के निवास स्थल की ओर निकल गए।

"देवी, ब्रह्मण भूखा है" भीक्षाम देही।

"देवी, भीक्षाम देही। "

कृष्णा चौक कर उठ खड़ी हुई। अर्जुन सचेत हो उठ बैठे। सामने उषाकाल में एक ब्रह्मण ऐसे वन में, अर्जुन हाथ जोड़े सशंकित से सामने प्रस्तुत हो गए।

कृष्ण ने चिर परिचित मुस्कान बिखेर दी। अर्जुन हतप्रभ से कृष्ण की गंभीर आँखों पर केंद्रित हो उठे। देवकीनंदन आप?

कृष्णा मुस्काती हुई बाहर आई। हाथो में खाली कटोरा लिए। हे सखा, अब तो केवल अक्षत का एक ही दाना बचा है। मुझ अभागन के भाग्य में इतना भी नही के नारायण स्वरुप रक्षक को भोजन कराऊँ।

कृष्ण ने कृष्णा के अश्रु हथेली में ले लिए। "कृष्णा" तुम्हारे हाथ से यह अक्षत का एक दाना भी मेरी क्षुधा को मिटा देगा। द्रवित ह्रदय से कृष्ण ने फफकती कृष्णा को थाम लिया।

पञ्च पांडव सर झुकाए कृष्ण के समक्ष प्रस्तुत हो गए।

कृष्ण के गंभीर नेत्र अर्जुन के लिए सूचक थे की युद्ध की तैयारी अतिशीघ्र करनी होगी। आज का दिन आगे की रणनीति व् रणभूमि तैयार करने में जाएगा। कृष्ण द्वीप का मानचित्र बिछा कर त्रिन्पत्र पर बैठ गए।

Friday, January 16, 2009

कान्हा ! 'देखो-देखो मेरे पाँव में कांटालग गया है।' रुधिर बह रहा है। देखो न कान्हा। राधे ने पुकार कर कांह की ओरदेखा। कांह गैया के सीन्घो पर सोने का पानी मढ़ रहे थे। कांटा, राधे के पैर में, सुनते ही दौडे चले आए। रुधिर, राधे- राधे! कहा ? बताओ! दिखाओ? कांह को बिलखते देखराधे हँसी न रोक पाई। हंसती चली गई। कांह ये क्या ? रो क्यो रहे हो? कांह का चेहरा देखने जैसा था। सबको नाच नचैया नाचने वाला स्वयं रुआंसा हो आया था। राधा हंसते-हंसते रुक गई। कांह की आँखों में अश्रु वह नही देख सकती थी। वह तो बस ठिठोली कर रही थी। कांह भी तो सताता है उसे। द्वार पर बेशर्मो की तरह नन्द बाबा के सामने टकटकी लगाये उसे देखता रहता है। वह स्वयम को लाज के मारे कहा छिपाए समझ नही पाती है। अब मौका मिला बदला लेने का। पर काहे का बदला? ऐसी ठिठोली किस काम की जो कांह को रुलाये? कांह मेरे पैर ठीक है। काँटों की क्या मजाल ? जिसे कांह मिला हो, उसकी गोद में प्रकृति केवल फूल बरसाती है। तुम्हारी राधे ठीक है। कांह फिर राधे से कृत्रिम क्रोध प्रर्दशित कर वापिस गैया की ओर चल दिए। फिर दूर दूर से गैया के कानो में कुछ कहे जा रहे थे। राधे चिढ गई। क्या कर रहे हो? तुम्हारी बुराई। कांह ने हँसते हुए उत्तर दिया। राधा पैर पटकती हुई सखियों में जा मिली। अब नही मिलूंगी तुम से। अपने सखाओ में रहा करो। लड़कियों में कुछ अधिक ही समय बिताते हो। देखना सहस्त्र नारिया होंगी फिर भी मेरे लिए तरसोगे, मुझे ही याद करोगे! क्रोधित राधे ने उत्तर दिया।

वन की सुन्दरता, कृष्ण को बरबस पीछे की ओर लौटा लिए जा रही थी। एक क्षण के लिए वे फिर ग्वाले कान्हा हो गए थे। वन की छवि देखते ही बनती थी। आज पूर्णिमा का चंद्र खिला हुआ था। वे अभी तक पांडवो के पड़ाव पर नही पहुच पाए थे। भोर होने तक पहुच जायेंगे। इस एकाकी यात्रा में कृष्ण जैसे राधे को साथ साथ महसूस कर रहे थे। ऐसा अक्सर होता है। रानीवास, महल, दरबार, सभी कार्य निपटाते निपटाते कृष्ण जैसे स्वयं को भी भूल जाते है, परन्तु जैसे ही अकेले पड़ते है, राधे साक्षात् मूर्ती बन सामने आ खड़ी होती है, स्मृतियों के रूप में। और तब बिना किसी से कुछ कहे वे जी भर जी लेते है उस सामीप्य को। राधे उनकी अन्तरंग सखी है। उसकी छवि उनके मानस पर इतनी स्पष्ट अंकित है की उन्हें उसका चेहरा देखने की आवश्यकता नही पड़ती।

मौन धारण किए हुए वृक्षो की स्वर्णिम लताए, कृष्ण को मधुबन के झूलो की याद दिला रहा था। राधे खेल खेल में अक्सर उनके गले में बाहे पसारे झूल जाती। पर फिर एक दिन न जाने राधे को क्या हुआ। अल्हड लड़को जैसी राधे के भाल पर स्वेद की बुँदे स्पष्ट देखि उन्होंने। उस दिन राधे पूरी पूर्णिमा का चंद्र लग रही थी। कृष्ण अपलक ही राधे को निहारते रह गए थे। राधे प्रतिदिन खेलती, कार्य निपटाती, पर उस दिन, न जाने क्या हुआ, वह लज्जित अनुभव कर रही थी। नयन झुकाए सरपट दौड़ गई माता के भवन में। अगली साँझ तक भी पलंग से उतरी नही, तो माता को चिंता हुयी। क्या हुआ? काहे मुह लिपटाए पड़ी है?

फिर राधे को एहसास हुआ था की वह राधा है, और वह कृष्ण उसका कांह, जिसे निर्निमेष नेत्रों से वह देखती है, वह उसके मनका अन्तरंग साथी है। राधे का कभी साहस नही हुआ ये सब कृष्ण से कहने का, परन्तु कृष्ण अब जाकर समझते है ये सब। वन का नीरव सन्नाटा कृष्ण की स्मृतियों को जैसे अग्नि की दाहक प्रदान कर रहा था और नील गगन का चंद्र उन्हें उतनी ही शीतलता, चाँद में अपनी प्रेमिका जो दिखती है उन्हें।

स्मृतियों को ह्रदय से लिपटाये कृष्ण एक शिला पर टिक कर बैठ गए।

उनका कल आज भी उन्हें रह रह कर बुलाता है। आज भी कांह निर्निमेष राधा को देखता है। आज भी राधे चुप रहती है। राधे पूछना चाहती थी ऐसे क्यो देखते हो? क्या कांह उत्तर देते इस प्रश्न का? कौन जाने। वह कल था जो बीत गया, आने वाला कल कैसा होगा, कोई नही जानता !

कृष्ण अतीत की सीढियों से उतर कर वर्तमान के प्रांगन में आ कर खड़े हो गए।

Monday, January 12, 2009

बड़ी सावधानी से अर्जुन ने गुफा का द्वार तीरों से ढकदिया। रात्रि होने को है। इस बियाबान जंगल में पशुओ व् निशाचरों का खतरा सर्वाधिक मंडराता है। स्वयं अर्जुन व् भ्राता योद्धा है तो ठीक है परन्तु द्रौपदी नाजो से महलों में पली बढ़ी है। राजकुमारी व् क्षत्राणी होने के नाते शस्त्रविद्या में निपुण है परन्तु राजमहलों के सुख भोगने वाली राजपुत्री कंटक भरे मार्ग कितना चल पायेगी?

वे जीत कर लाये थे कृष्णा को स्वयम्वर से। पहली नज़र में वे राजकुमारी पर मुग्ध हो गए थे। मत्स्यपरीक्षा में अद्वितीय तीरंदाज़ के रूप में काफ़ी यश प्राप्त किया था। घर जब राजकुमारी को लेकर आए तो माँ ने कहा मिल कर बाट लो। बहार आई तो हतप्रभ रह गई । उसने जाने अनजाने एक स्त्री को बाटने की आज्ञा दी थी।

कृष्णा ने फिर रो रो कर अर्जुन से लाख सवाल किए थे। हे आर्य आप मुझे स्वयम्वर में जीत कर लाये तो मै आपके भाइयो की पत्नी कैसे बन सकती हु? हे आर्य जब मै प्रेम आप से करती हु, मेरे मन दर्पण मे केवल आपका ही चित्र बसता है तो मै आपके भाइयो को किस प्रकार स्वीकार करू? द्रौपदी यह कभी नही जान पाई की जब मनुष्य केवल एक से प्रेम करता है तो उसे किसी दूसरे से सम्बन्ध रखने के लिए कोई कैसे प्रताडित कर सकता है? कदाचित नर एक व् अनेक मै फर्क नही जानता होगा? माता के अनुशासन को लांघने की उद्दंडता वह नही कर सकती थी । एक आर्या होने का उसने प्रत्येक धर्म निभाया। आज जान पाई की धर्म का कमंडल व् धर्म की शिला स्वयं के हाथ मै धरनी पड़ती है अन्यथा धर्म शब्द का केवल इस्तेमाल होता है।

अर्जुन स्वयं नही जान पाए की माँ ने द्रौपदी को पांचो भाइयो मै बाटने के लिए क्यो कहा? उसकी माता कोई ग्रामीण निरक्षर नारी तो थी नहीफिर माँ ने ऐसा क्यो किया? निरपराध अर्जुन के प्रेम को बाटने के लिए कह दिया? अर्जुन घुट कर रह गए पंख फडफडाते कबूतर के समान। माँ का कथन, बड़े भाइयो की सर्वसम्मिति व् उनका अपना धर्मयुद्ध, भाई को सम्राट बने देखने की तीव्र इच्छा, सब जैसे अर्जुन को प्रेम पर भारी पड़े। एक आर्य होने के नाते उन्होंने धर्म निभाना श्रेयस्कर समझा नाकि अपनी इच्छाओ के सामने घुटने टेकना।

द्रौपदी ने बखूबी अपनी कमान संभाल ली। अपने मन को मार कर। युधिष्ठिर चाहते तो हस्तक्षेप कर सकते थे, पर नही किया। उसे अपनी पत्नी स्वीका कर लिया? अर्जुन जानते है कृष्णा के मन मै वितृष्णा है। एक ऐसा बवाल है जो अभी तक उभर कर नही आया है। वे जानते है हर क्षण कृष्णा केवल अर्जुन का विचार करती है। क्या कोई जान सकता है उस मलाल को जब एक स्त्री हृदय किसी और को देती है और उसे जबरन तन किसी और को देना पड़े और वह भी माता पिता के बलपूर्वक अनुरोध पर? कृष्णा कदाचित इस मर्यादा का उल्लंघन करती भी परन्तु स्वयं अर्जुन चुप थे, यह देख कर रुक गई, जब उसका प्रेमी ही उसके लिए लालायित नही है तो वह अकेली लडेगी भी तो किससे? अर्जुन के प्रति उसके ह्रदय मै मान व् प्रेम हेतु उसने निसार दिया अपना सर्वस्व।

कुंती ने क्यो कहा होगा की द्रौपदी को बाट लो? ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर ने अभी तक विवाह नही किया था। उसका स्वभाव ऐसा नही था की नारियों को मुग्ध कर सके। इसके विपरीत अर्जुन को स्त्रियों की कमी नही थी। कृष्ण की तरह वहभी राजकुमारियों मै आकर्षण का केन्द्र रहता था। यदि अर्जुन प्रेम सम्बन्ध मै लीं हो जाता, वह भी अज्ञातवास के दौरान, कुंती को डर था, कही अर्जुन अपने ध्येय से च्युत न हो जाए। वह देख चुकी है अपने पति की मृत्यु जिसे काल ने ग्रस लिया था केवल इस मद मादक प्रेम के नशे ने। वह नही चाहती थी जिस प्रकार उसका पति अकाल मृत्यु का ग्रास बना, हस्तिनापुर के राज्य को जीतने की इच्छा भी इस अकाल मोह-बंधन का ग्रास बन जाए। और फिर द्रौपदी एक बहाना ही हो जायेगी इन भाइयो के सदैव साथ रहने का। कल को अलग अलग नारी आयेगी, कही भाई अलग थलग न पड़ जाए। कुंती ने कब से यह मुठ्ठी बांच कर रखी है। वह अडिग थी अपने पति का हक हासिल करने के लिए। वह किसी भी कीमत पर अपने पुत्रो को खो नही सकती थी। उसका विचार मात्र उसे थर्रा देता था।

अर्जुन ने कीमत दी थी अपनी माँ के दूध की। कोई आश्चर्य नही था कई बार वे अनमने से इस संसार के परे की बातें सोचते थे। वे तो कई बार ये भी सोचते है की युध्ध की क्या आवश्यकता है? परन्तु कृष्ण के सामने बेबस है।

Saturday, January 10, 2009

अग्यात्वास की भूमिका पांडवो के लिए महत्वपूर्ण है। कृष्ण ने अत्यधिक सूझबूझ से यह युक्ति निकलवाई। दुष्ट व् स्वार्थी को मूर्ख बनाना आसन होता है। वह देखता है केवल अपना लाभ। संकुचित व् सीमित दृष्टि उसे और कुछ देखने नही देती है। शकुनी अपनी जय पर फूला नही समां रहा था। उसे तो बस पांडवो का परिवार आँखों का कंकर लगता था। जितनी जल्दी छुटकारा मिले उतना ही अच्छा। राजगद्दी का मोह उसे इतना भी नही दिखा पाया की अग्यात्वास जो पांडवो ने माँगा है, वह युद्ध की तयारी हेतु माँगा है। मूर्ख। कृष्ण अपनी मुस्कान रोक नही पाए। संकुचित दृष्टि, सीमित मति, स्वार्थ, कैसे न कैसे स्वयं के लिए अनिष्ट का कारन व् मार्ग खोज ही लाता है। कृष्ण को कुछ करना ही नही पड़ा। सब जैसे अपने आप हो गया। राजा पांडू के वंश से चलती हुई यह शत्रुता अब अपने वास्तविक रूप में आने वाली है।
अग्यात्वास देगा अर्जुन को अधूरी शिक्षा को पूरा करने का अवसर, युधिष्टिर, नकुल व् सहदेव को अपनी राजनैतिक गणनाओ को फिर से गिनने का अवसर, व् द्रौपदी को थोड़ा अवकाश उस कलुषित वातावरण से। कदाचित निसर्ग की सुन्दरता में, अपने जीवन की कुरूप घटनाओ को भूल जाए। उन्हें केवल भीम की चिंता नही है। मस्त मलंग है। स्वयं में। द्रौपदी के लिए मौज मस्ती का सहारा केवल भीम ही होता है। वह कमल मांगेगी, तो कही भी जल सोरोवर से लाकर देगा, वह कहेगी, जंगल में विहार करना है, तो मार्ग से कंटक साफ़ कर देगा। फिर भी द्रौपदी प्रेम करती है अर्जुन से, उसका पहला प्रेम। अर्जुन सर्वाधिक संवेदनशील है। उसे केवल पत्नी, प्रेमिका, राजपाट तक ही नही अपितु और भी सृष्टि सम्बन्धी प्रश्न परेशां करते है, तभी तो अच्छी मित्रता निभ जाती है कृष्ण के साथ। युधिष्टिर बड़े है, सत्यवादी है, परन्तु दुनियादारी में कच्चे है। भीम कई बार दंत चबाते हुए कहते है, बड़े भइया यदि agya दे तो दुर्योधन के यही टुकड़े कर दू। परन्तु युधिष्टिर के लिए धर्म ही सब कुछ है। कृष्ण चिंतित इस बात से होते है की युधिष्ठिर के सत्य असत्य की परिभाषाये तर्कसंगत व् वास्तविक जगत के अनुकूल नही होती है। जो उन्हें ठीक लगता है, वे करते है। सुकुमार कोमल कृष्ण भी है, परन्तु जहा सुदर्शन चक्र का काम पड़ा वे नही चुकते उससे प्रहार करने में। आख़िर शास्त्र रिपु के अनुसार होना चाहिए। शकुनी जैसे दुष्ट स्वार्थी मनुष्य के सामने नैतिकता क्या व् अ नैतिकता क्या?

Monday, January 5, 2009

भीरुता व् उदारता में क्या अन्तर है? विपक्षी को स्वयं पर हावी होने देने को ही कहते है भीरुता। विपक्ष कुछ भी हो सकता है। वहमानसिक शत्रु भी हो सकता है या कोई भी निर्बलता । उदारता का मुखौटा लगा कर लोग भीरु होने की अपनी कमी को किस प्रकार छिपा लेते है। युधिष्टिर उदार है अथवा भीरु? यह कौन सा कवच है जिसका नाम सत्य है परन्तु जिसके तरकस से विध्वंस के तीर निकलते है, युधिष्ठिर फिर भी चुप रहते है, सज्जन बन कर, यह कौन सा कवच है जो केवल उनके व्यक्तित्व का रक्षण करता है, समाज की दुश्प्रुवृत्यो को पनपने का मौका फिर भी मिलता ही रहता है, यह कौन सा मुखौटा है जिसके पीछे एक भीरु भयभीत सम्राट छिपा रहता है, क्या वह सचमुच सम्राट बनने के काबिल है? द्रौपदी के खुले केश अवश्य ही युधिष्टिर को ताना देते होंगे। कौन सी नीति ने पञ्च पांडवो को स्त्री का अपमान सहने की सीख दी? और अब क्रोध कर के भी क्या, द्रौपदी की भीतर की ज्वाला किस प्रकार शांत होगी?
नीतियों का क्या, अपने अपने फायदे के लिए जिसने तिसने तोड़ मरोड़ कर बना दिए और खड़ा कर दिया एक उन्नत समाज का ढांचा। उन्नत अर्थात जो जितनी चालाकी से धन जोड़ सकता है, जो बिना श्रम किए ही अपने लिए महल खड़ा कर सकता है, जो सभी प्रकार के उपभोगों का रस ले सकता है, चाहे उसके लिए उसे कितना ही मक्कार होना पड़े, मानव सभ्यता की उन्नत सभ्यता जुआ शराब व् व्यभिचार से पहचानी जा सकती है। जितना तमस उतना उन्नत।
उन्नति का एक रूप कृष्ण अपनी द्वारिका में भी देख रहे है। कृष्ण की बनाई नीतियों के फलस्वरूप धन ही धन हो गया है परन्तु नागरिक उतने ही लापरवाह व् आलसी होते जा रहे है।
द्रौपदी का वस्त्र हरण व् पांडवो का अग्यात्वास आख़िर कृष्ण के लिए क्यो विशेष है, ऐसा क्या है जो वे द्वारिका, छोड़ कर पांडवो की सहायता में लगे है? द्वारिका दिन पर दिन क्षीण होती जा रही है। रसना व् इन्द्रिय सुख व्यापारिक वर्ग को खोखला करने में लगे है। सभी व्यापारी है वहा, समुद्र के बीच में होने के कारन कृषि व्यवसाय पनप नही पाया है जिसके कृष्ण निर्भर है समुद्र तटीय इलाको से दूर मैदानी भागो पर और वह है दुर्योधन का साम्राज्य। अब यदि कृष्ण इस मसले में नही पड़ते है, तो उनकी अपनी प्रजा भूकी मरती है। द्वारिका खड़ी है केवल समुद्री, तटीय, व् क्षार व्यवसाय पर। गेहू, चावल, व् अन्य अन्न उपज के लिए आवश्यक है पड़ोसी क्षेत्रीय सम्बन्ध और ये सभी क्षेत्र दुष्ट शकुनी के हाथो में है। दुर्योधन केवल एक कठपुतली है। ऐसे में यदि पांडवो की जीत हो जाती है तो वे द्वारिका के लिए एक सुरक्षित भविष्य का निर्माण कर सकते है।
उनकी अनउपस्थिति द्वारिका में राजनैतिक खलबली का कारण बनी हुई है। परन्तु कृष्ण जानते है, यदि इस परिस्थिति से वे किनारा भी करते है तो भी वे इस महायुद्ध के परिणामो से नही बच सकते है। दुर्योधन का वर्चस्व द्वारिका को फलने फूलने नही देगा, व् महायुद्ध द्वारिका के लिए कृष्ण की लम्बी अवधि के लिए अनुपस्थ्ती का कारन बनेगा। द्वारिका हर हाल पर दाव पर लगी है। पांडवो की जीत ही जम्बुद्वीप के लिए श्रेयस्कर है।
कृष्ण न केवल द्रौपदी को वस्त्र प्रदान करने जा रहे है वरन जम्बुद्वीप के लिए एक श्रेयस्कर नींव का निर्माण करने जा रहे है।
क्रमश: