Wednesday, March 11, 2009

ग्राम भर में ख़बर आग की तरह फ़ैल गई की कांह राधे को उठा कर घर तक ले कर आया। राधे के पिता वृषभान दौडे दौडे यशोदा के घर तक पहुचे। मन में चिंता; जाने और कैसे कैसे दिन दिखलाएगी ये लड़की? मर्यादा का उल्लंघन, और वह भी वृषभान की छोरी। समाज को वे क्या मुह दिखलायेंगे? चहरे पर रोष लेकर वृषभान संग में बरसाने के माने हुए पहलवानों को लेते हुए आएजिनके हाथो में लाठिया थी। नन्द के घर के बाहर लोगो का ताँता सा लगा था। भीड़ को तीतर बीतर कर वृषभान ने गरज कर नन्द को आवाज़ दी। नन्द जी ने स्थिति की गंभीरता भांपते हुए वृषभान जी को शांत रहने की प्रार्थना की। वे स्वयं उन्हें भीतर ले आए।

ग्रह में प्रवेश करते ही वृषभान जी की दृष्टि अपनी पुत्री पर पड़ी। राधे एक कोने में पत्थर की मूरत बनी बैठी हुयी थी। यशोदा सिसक सिसक कर रोये जा रही थी। वृषभान के कुछ भी समझ में नही आया। कृष्ण की ओर देखते ही उनका चेहरा तमतमा गया। "यही है सारे फसाद की जड़। जाने क्या जादू किया है इसने मेरी पुत्री पर जो वह इसीके चक्कर काटती रहती है। "

"मेरी पुत्री का घर उजाड़ कर तुझे तसल्ली हो गई होगी। " अब और क्या करने बाकी रह गया जो तू उसे अपने घर में ले आया है।

यशोदा बीच में पुत्र का बचाव करने वृषभान के समक्ष आ खड़ी हुयी। हाथ जोड़ कर विनती करते हुए कहने लगी, आप का कथन सही है, राधा को उसकी ससुराल इस स्थिति में कभी स्वीकार नही करेगी परन्तु आप बच्ची का हाल तो देख ले। क्या वह चली जायेगी अपने पति के घर?

वृषभान पर समाज व सम्मान का भूत सवार था। उन्होंने यशोदा से प्रश्न किया तो किस हक से वह राधे को अपने घर में रख लेगी? क्या यशोदा में है इतनी हिम्मत जो एक युवा स्त्री को अपने घर में स्थान दे?

यशोदा ने हर्ष से अभिभूत हो झोली फैला कर राधे को मांग लिया।

आप मुझे राधे को दे दे। यह गोकुल छोड़ कर नही जी पायेगी।

वृषभान सर झुकाए बहार आ गए। राधे की स्थिति उन्हें किसी भी प्रकार का समाधान खोजने नही दे रही थी।

कृष्ण ने भारी मन से माता, नन्द बाबा व् राधे से विदाई ली। उद्धव जी रथ में उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कंस ने मथुरा में एक भारी जलसे का आयोजन किया था। बस उसी जलसे में कृष्ण खिलाड़ी बन कर कंस के महल में pravesh karne wale the.

बलराम का जिम्मा था उनके बाकी के साथियो को योजना के अनुसार सावधान करना।

कृष्ण इतनी हलचल के मध्य स्वयम को शांत रखे हुए थे। उनका सारा ध्यान इस समय केवल अपनी प्रत्येक विचारधारा से उमगते हुए प्रत्येक कण पर था। वे इस समय ऐसे थे जैसे कोई विनाशकारी चक्रवात के मध्य केंद्रबिंदु में होता है।

चुप। शांत। खाली। शून्य।

उनकी दृष्टि केवल वर्तमान में चलते हुए रथ के पहिये पर टिकी हुयी थी।

वे इस पहिये का केन्द्र थे जिसे सृष्टि jitna bhi घुमाये परन्तु वे अपने स्थान पर थे "अप्रभावित।"

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