Saturday, March 28, 2009

अर्जुन आँखे मूँद कर सोने का प्रयास करने लगे।
उनकी आँखों के समक्ष फिर फिर उर्वशी जल में से बहार आकर खड़ी हो गई।
उनके कानो में अप्सराओ के स्वर गूँज रहे थे।
झूठे। भ्रमित।
क्या ये सत्य है?
हा है।
वे मानते है की वे भी काम के इतने ही अधीन है।
क्या सत्य ही वे उर्वशी को माता का स्थान देते है?
नही जानते।
बस इतना जानते है की उर्वशी की सुन्दरता उन्हें मोहित तो कर गई परन्तु इतनी भी नही की उन्हें अपनी धुरी से हिला सके।
उर्वशी में रूप का अंहकार है। विलासिता की देवी है वह। उन्हें इन सब से कोई सरोकार नही। परन्तु प्रेम बिना काम?
फिर तो वे बस इन अप्सराओं के हाथो का खिलौना भर सिध्ध हो जायेंगे। जब तक दिल किया ये स्वर्ग की देविया जिन्हें किसी वस्तु की कमी नही, उनके साथ खेलेंगी और जब मन भर जाएगा तो पुरुरवा की तरह एकांत में भटकने त्याग देंगी।
वे नही कर सकते अपनी मर्यादा के साथ खिलवाड़।
इससे पहले वे चित्रांगदा से प्रेम कर चुके थे। उलूपी ने उनका अपहरण कर लिया था परन्तु नागकन्या ने फिर भी उनके साथ ज़बरदस्ती नही की थी। इन अप्सराओ से तो वे नाग कुल की कन्याए सही थी।
अप्सराओ ने अवश्य ही अर्जुन के मन के युद्ध को भांप लिया होगा। तभी तो उनके समक्ष हंसती ही जा रही थी। परन्तु जब अर्जुन प्रेम में थे तो थे। उन्होंने कभी असत्य भाषण नही किया। किंतु ये अप्सराए केवल क्रीडा हेतु उन्हें मांग रही है। जब राजकुमार थे तो अनेको सेविकाए उनके साथ जलमग्न होने हेतु तैयार रहती थी, वह उनकी आजीविका थी। मन के डोरों को थामने का प्रयास अर्जुन भी नही करते यदि वह उर्वशी उनसे सचमुच प्रेम करती। जैसे कृष्णा ने किया। जैसे चित्रांगदा ने किया। जैसे राधे ने कृष्ण से किया। परन्तु काम हेतु वे किसी का खिलौना बनने के लिए तैयार नही है और न ही वे किसी के सेवक है।
वे कर्ण नही है जो केवल अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ण करने हेतु दुर्योधन के पीछे रहता है। कर्ण ने अपनी कुंठाओ का जंजाल द्रौपदी कांड में खोल कर रख दिया था। स्वर्ग की सुंदरी है तो क्या हुआ वे स्वयम को न्योछावर कर देते यदि वह स्पष्ट शब्दों में उनसे कहती की वह उनसे प्रेम करती है, उनके सुख-दुःख में साथ देने को तैयार है। फिर वे उनसे संतान उत्पत्ति भी कर सकते थे, उसका पालन, पोषण, सभी कुछ, परन्तु केवल कामाग्नि पूर्ति हेतु क्रीडा उनसे नही होगा। और आज वे स्पष्ट शब्दों में उर्वशी को समझा भी देंगे। फिर चाहे जो हो।
रात्रि का वह पहर भी आ गया। इन्द्र अपने आसन पर बैठे थे। उर्वशी ने नृत्य के पश्चात इन्द्र से वही रहने का अनुरोध किया।
"हे इन्द्र" धनजंय आपके पुत्र है तो क्या उन पर स्वर्ग के नियम लागू नही होते?
उर्वशी ने इन्द्र से प्रश्न पुछा।
इन्द्र ने अर्जुन की ओर प्रश्नचिन्ह दृष्टि से देखा। होते है यदि अर्जुन सहमति दे तो।
"हे इन्द्र" क्या कभी आपने स्वर्ग में संयम का दंड स्वयम पर लागू किया है?
"इसकी कभी आवश्यकता नही पड़ी उर्वशी"
इन्द्र ने उत्तर दिया।
उर्वशी लहरा कर इन्द्र दे सामने आ खड़ी हुई। तो हे इन्द्र आप मुझे ये बतलाये की यदि कोई अप्सरा किसी पुरूष पर आसक्त तो हो जाए तो क्या उस पुरूष का ये धर्म नही की उसके आसक्ति को तृप्ति प्रदान करे?
"इसका उत्तर तो केवल अर्जुन ही दे सकते है उर्वशी"
अर्जुन स्थान से उठ खड़े हुए।
हे देवी, यदि आप ही की तरह में भी काम के तीर से आहत हो काम की तृष्णा से पीड़ित होता तो अवश्य ही आप को अंगीकार करता परन्तु में केवल प्रेम की भाषा जानता हु।
हे अर्जुन क्या पुरूष का यह धर्म नही की एक स्त्री यदि अनुरोध करे तो उसकी ओर ध्यान दिया जाए।
अर्जुन गंभीर हो आए। हे देवी मेरे पूर्वज पुरु ने आपकी ओर ध्यान दिया। आपको रानी बनाया। आपने क्या कियाउनके पौरुष को धिक्कार कर आप फिर इन्द्रलोक आ गई।
में पुरु नही हु। में अर्जुन हु।
अर्जुन तुम तो पुरूष भी कहलाने के काबिल नही हो। तुम्हारी दृष्टि साफ़ कह रही थी तुम मंत्रमुग्ध थे।
हा देवी। में मंत्रमुग्ध था। परन्तु में आपका सेवक नही हु।
तो अर्जुन तुम पुरूष भी नही ho । यदि कभी अपने अंतर्मन से पूछो तो तुम्हारा मन तुम्हे बतलायेगा की तुम मेरे साथ अपना पौरुष इसलिए नही दिखला सकते क्योंकि तुम अपनी धर्मपत्नी की सुरक्षा नही कर पाये। तुम निर्वासित हो यहाँ केवल shstro की भीख हेतु आए हो। तुम अपना पौरुश्बल वही हस्तिनापुर की शतरंज पर रख आयेहो।
अर्जुन और नही सुन सकते थे। उनके अपने मन ने उन्हें इतना पीड़ित किया था। अब वे एक नारी के हाथो अपमानित नही हो सकते थे। कृष्णा ने उन्हें सूना सूना कर बधिर कर दिया था। हा में केवल और केवल शस्त्रों के लिए आया हु। में तुमसे प्रेम नही करता और न ही किसी के हाथो का खिलौना हु। में काम पूर्ति का साधन नही हु।
तो हे अर्जुन यदि तुम्हारा मन दर्पण कभी तुम्हे तुम्हारी सच्ची तस्वीर दिखाए तो उस दिन इस पुरूष का वेश त्याग देना। तब तुम न नर का रूप रखना और न ही नारी का। तुम पुरूष नही हो परन्तु तुम नारी भी नही हो।
इन्द्र उर्वशी को रोकते हुए कहने लगेशांत देवी। अपने शब्दों को सीमा दो। अर्जुन अवश्य ही तुम्हारे कथन पूर्ण करेगा परन्तु उसकी अवधि सीमित कर दो।
इन्द्र ने अर्जुन से अंततः कह ही दिया, हे अर्जुन ये स्वर्ग है। में इन्द्रियों का स्वामी हु, और इन्द्रियों का शमन यहाँ नही होता है अतैव तुम उर्वशी के श्राप को जीयोगे। परन्तु केवल एक वर्ष के लिए।
अर्जुन ने झुक कर प्रणाम किया व् चल दिए।

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