यहाँ दूर दूर तक मनुष्य नही बसते।
शीत लहरों के थपेडो से टकराती हुई झीलों की लहरे हवा को थोडी नरमी अवश्य देती है।
बर्फ के जमे हुए टुकड़े पर बैठे हुए अर्जुन पानी पर जमी हुई पतली सतह पर दृष्टि जमाये हुए थे। हाथो में गांडीव, कंधे पर तुणीर, दूसरे हाथ में तीर, परन्तु मस्तिष्क इस शीत कालीन बर्फ की तरह सुन्न।
यहाँ श्वेत चांदी जैसे चादरों का साम्राज्य था। देओदार, चिनार, के वृक्ष भी इस श्वेत सतह के आधीन थे। अर्जुन की बलिष्ट काया, गुंगाराले केश, कमर पर बंधा शिकारियों का वल्कल, सभी कुछ श्वेत बर्फ की लपेट में था।
वे कुछ देर तक देखते रहे उस मत्स्या को जो पानी में गोल गोल चक्कर काट रही थी। सूर्य की किरणों को पाने के लिए वह सतह पर ही थी। ऊपर आसमान में पक्षी मत्स्याओ की फिराक में थे। एक भक्षक, तो एक शिकार!
अर्जुन भी तो शिकार हुए थे। समय ने किया था उनका शिकार। और हाथो में शक्तिशाली गांडीव धारण कर के भी वे इतने बेबस। इतने शक्तिहीन।
कृष्ण चेतावनी देकर गए थे यदि कर्ण को पराजित करना है तो इन्द्र की शरण में जाना होगा। वे ही दे पाएंगे कर्ण की टक्कर की काट।
गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हें सब कुछ दिया। बस नही दे पाए तो स्वामिभक्ति। राजसिंहासन के असली उत्तराधिकारी की समझ। गुरु द्रोणाचार्य को धेनु, स्वर्ण, कुलीनता अपने मूल्यों से अधिक प्रिय जान पड़ी।
अर्जुन को याद है वह दिन जब गुरुदेव ने उन्हें वचन दिया था की वे ही इस पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सिध्ध होंगे। इसलिए उन्होंने अपनी प्रत्येक गुप्त विद्या अपने शिष्य को सिखा दी। परन्तु गुरु हतप्रभ रह गए जब एकलव्य से सामना हुआ था। दक्षिणा में एकलव्य से अंगूठा मांग लिया था गुरुदेव ने। अर्जुन ने अपने गुरु का वह रूप पहली बार देखा था, तब भी यह एहसास नही कर पाए थे की अन्याय की लात ह्रदय पर ज़ोर से लगती है जब ठोकर कोई और न दे अपितु इश्वर के स्थान से भी कही अधिक ऊपर स्थापित गुरु दे। निष्कासित होते समय गुरुदेव ने अपने प्रिय शिष्य से आँखे तक नही मिलायी। वे खड़े रहे हाथो को बांधे दृष्टिहीन स्वर्ण राजसिंहासन की बगल में। उन्होंने उस दिन ज्ञान की सीमा देखि थी। कृष्ण ऐसे क्यो नही है? उनकी तो शिक्षा भी कितनी देर से प्रारम्भ हुई। उन्हें डर किसी का भी नही लगता?
शीत लहरों में घुमड़ते हुए बदल चांदी के अश्वो जैसे दौड़ लगा रहे थे।
उन्हें भी एक दिन ऐसे ही किसी श्वेत चांदी जैसे अश्व पर बैठ कर युद्धभूमि पर लड़ना है।
कृष्ण कह कर गए थे अर्जुन अपने अन्दर के योध्धा को जागृत करो। और तब तक पुरूष नही बन पाओगे जब तक पुरुषार्थ को नही समझ पाओगे।
इन्द्र के महल में एक धनुर्धर क्या करेगा? स्त्री सुख, विलास, सोमरस, इन सबके बीच प्रशिश्क्षण परन्तु कृष्ण कदाचित यही प्रशिक्षण अर्जुन को देना चाहते है। की जब मन की धुरियों में द्वंद युद्ध चलने लगे तो फिर योध्धा क्या करे?? चलो यह भी कर देख लेते है।
और यह आसान नही है। वे जानते है।
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