कृष्ण ने समझदारी से काम लिया। नन्द बाबा को भीतर आने का संकेत दे कर उद्धव के साथ वार्तालाप को समाप्त कर दिया। आगे की योजनाओं को वे कई बार अपने मन मस्तिष्क में दोहरा चुके थे।
सांझ होने में समय था। उन्हें आज ही संध्याकाळ मथुरा के लिए निकलना होगा।
परन्तु जाने से पहले उन्हें राधे से मिलना होगा।
राधे! उस अनबूझ पहेली को वे किस प्रकार सुलझाने वाले है स्वयं वे ही नही जानते। उसके सामने दीनदुनिया सब समाप्त प्राय लगता है। वह है भी जग से निराली। कृष्ण की जोगन। कृष्ण सहसा ही उसके समक्ष जैसे अपनी समस्त शक्ति खो बैठते है। सोच समझ पर जैसे घडे भर पानी फ़िर जाता है।
कृष्ण चिंतित हो उठे। उद्धव जी को अपनी शंका न दिखलाते हुए उन्होंने नन्द बाबा को घर पर ही रहने का संकेत दिया। नन्द बाबा आज कुछ भी न बोले। वे एक गहरी सोच में डूबे हुए थे। उनके मस्तक पर लकीरे थी। राधा उन्हें अपनी पुत्री समान ही प्रिय थी। बस राधा को संभालना थोड़ा कठिन प्रतीत होता था। राधा का संसार कांह से शुरू होता और कांह पर ही समाप्त हो जाता।
कृष्ण चल दिए उस दिशा में जिस ओर राधे निकल गई थी। उनका अनुमान था की राधे कदाचित उसी दिशा में दौडी होगी जहा वे अक्सर मिलते थे। झूलो के पीछे एक संकरी यमुनाधारा के तीरे से ढलान लगती है। वहा से कुछ दूर एक मन्दिर है। राधे ने कई बार कृष्ण से उस मन्दिर में जाने की इच्छा बतलाई थी। परन्तु कृष्ण सदा उसकी बात हँसी में टाल देते।
झूलो पर राधे नही थी। जंगलो के बीचों बीच सुनसान सन्नाटा था। वृक्षो के झुरमुट सूर्य को बाहर ही रोक देते थे। अंधेरे रास्तो को कृष्ण सावधानी से पहचानते हुए मन्दिर में गए। सामने राधे को देख उनकी साँस में साँस आई। राधे अचेत थी। कृष्ण ने राधे को बाहुओं में ले लिया। मन्दिर अत्यन्त पुराना था। मन्दिर के भीतर एक कोने में प्राचीन टूटी फूटी बावडी थी जिसका जल यमुना नदी से आ मिलता था। कृष्ण राधे को उठा कर उस बावडी की सीढियों से नीचे उतरते गए। घाट अत्यन्त चिकने व सूखे पत्तो से भरे हुए थे। यहाँ सर्प भी हो सकते है। परन्तु राधे को होश में लाना आवश्यक था। और आज कृष्ण एकांत चाहते थे अपनी राधे के साथ।
इतने वर्ष राधा साथ थी परन्तु उन्होंने ऐसे किसी एकांत की इच्छा नही की। परन्तु न जाने आज उनके सीने में क्या सीलक सी चुभ रही थी। उन्हें अपराध बोध हो आया। किस मुह से राधा को बतलाते की वे तो आए ही जाने के लिए थे। राधे उन्हें देख कर ही जीती थी।
कृष्ण ने राधा को पहली बार सर से लेकर पैर तक निहारा। गौर वर्ण राधे खिली हुयी चाँदनी जैसे प्रतीत हुई। चेहरा कुम्हलाया हुआ था। कृष्ण ने संभाल कर राधा का सर अपनी गोद में टिका लिया। चहरे से केशो को पीछे लिया। एक अंजलि भर उन्होंने जल लेकर राधे के चहरे पर छिडकाव किया। राधे ने अधर बुदबुदाने लगे। कांह..... कांह..... राधा ने नयन खोले तो स्वयं को कृष्ण के आगोश में पाया। राधा नाराज़ थी। उसने कृष्ण की पकड़ से छुटने की कोशिश की। परन्तु इस बार कृष्ण ने उसे अपने पाश में बाँध लिया। राधे के नयनो से अश्रुधार बह चली। कांह ने होठो पर अंगुली रख कर रोने के लिए मना किया। उसे अपने ह्रदय के समीप ला कर उसके कानो में कहा राधे, में यदुवंशी श्री कृष्ण चंद्र अपनी आत्मा से तुम्हे स्वीकार करता हु। में हाथो में जल ले कर इस पवित्र बंधन का तुमसे आग्रह करता हु। तुम मेरी आत्मा हो। राधे में जहा कही भी रहू परन्तु मेरे भीतर तुम ही विराजमान हो। कृष्ण कहते कहते भावुक हो उठे। राधे विस्मित नयनो से कृष्ण की ओर देखती रही। कृष्ण ने झुक कर राधे के अधरों को अपने अधरों से छु लिया। राधे अपने प्रीतम में सिमट गई। कृष्ण ने अपनी कमर में बाँधी हुई बांसुरी दे कर कहा राधे में तुम्हारा अपराधी हु। तुम जो चाहे मुझे सज़ा देना परन्तु मुझे मेरे धर्म मार्ग से च्युत न करो। मेरा जन्म इस पृथ्वी पर किसी कारण वश हुआ है। तुम मेरी शक्ति हो राधे। मुझे कमजोर न होने देना।
राधे मृतप्राय हो कृष्ण के वक्ष से लिपट कर रो पड़ी।
नियति ने राधे से अन्याय किया था उससे उसका कृष्ण ले कर। अब आगे राधा स्वयम को क्यो कर संजोयेगी वह कुछ समझ नही पा रही थी। वह केवल अपलक अपने प्रीतम को देखती रही। कृष्ण राधा को बाहुओं में उठा कर ग्राम की ओर चल दिए। आज वे किसी से भी भयभीत न थे। आज वे अपनी आत्मा इस ग्राम में छोड़ कर जा रहे थे। नितांत अकेले , नितांत अधूरे...... जाने सृष्टि का कौनसा पहिया किस ओर जा रहा था जिसके साथ कृष्ण मुड़ने को विवश थे।
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