इधर कृष्ण अंगुलियों पर शत्रु गिन रहे थे। हस्तिनापुर के राजप्रासाद में टोहलेने गुप्तचर आधिकारिक तौर पर नियुक्त थे, परन्तु वहा की हवा का रुख जानने के लिए कृष्ण ने स्वयं जाना श्रेयस्कर समझा।
ख़बर आई थी की अर्जुन इन्द्र से शस्त्र लेने में सफल हो गए था। संग में पाशुपत भी अर्जुन हासिल कर चुके थे। युद्ध के लिए आवश्यक सामग्री लगभग तैयार थी। परन्तु युद्ध होने से पहले युद्धविराम की चेष्ठा आवश्यक थी।
स्वयम कृष्ण जानते थे की शान्ति सुलह की बाते यहाँ किसी की समझ आने वाली नही है। यदि ऐसा होता तो ये नौबत ही क्यो आती? परन्तु राजनीति भी आख़िर नीति है। नीति से चलना विजय पथ की ओर जाना है।
आने वाले युध्ध किन किन नीतियों की धज्जिया उड़ने वाली है उन्हें इन्सबका अंदाज़ था। अतः कृष्ण चले आए शान्ति का प्रस्ताव लेकर दृष्टिहीन ध्रितराष्ट्र व् शकुनी के राजमहल में।
अंगराज कर्ण, दुर्योधन, दुशासन, अन्य कौरव, गांधार देश के मित्र राजा, शिशुपाल, जरासंध के प्रतिनिध इत्यादि से प्रासाद खचाखच भरा हुआ था।
सभी को कौतुक द्वारिकाधीश वासुदेव श्री कृष्ण का था। सभी सर्प की भांति फन उठाये कृष्ण की बीन को सूंघते से नज़र आए। एक भय सभी को सताता था, जाने अब क्या हो इस कृष्ण की झोली में। सभी को वे राजा कम कोई जादूगर अधिक ही लगते थे। कब जाने कौन सा तमाशा खड़ा हो आए। और कृष्ण को तो जनता भी मिल जाती है तालिया बजाने के लिए। इस बीन्बजैया का तमाशा देखने आज फिर सभी हाज़िर थे।
कृष्ण ने शान्ति प्रस्ताव प्रस्तुत किया। दुर्योधननही माना। कृष्ण जानते थे यही होगा। अतैव उठ खड़े हुए। जाते जाते उन्होंने कर्ण की सरसरी दृष्टि घुमाई, और घोषणा की, सभी राज्यों के प्रतिनिधियों व् राजाओ की स्वीकृति से अब यह स्पष्ट हो गया है की युद्ध तो होना ही है। पांडवो का केवल एक ही वर्ष अज्ञातवास का रह गया है। जो समाप्त होते ही युद्ध की घोश्नाकाल निर्धारित करेगा। सभी राज्य अभी से यह निर्णय ले ले की कौन किस ओर है?
....वैसे भी समय एक दलदल समान है, जिसमे यदि कोई रथ का पहिया धंसा तो धंसता ही जाता है, अतैव में अनुरोध करूँगा की सभी सम्राट अपने पैरो की ज़मीन देख समझ कर चुने.........
कर्ण अचानक ही आसन छोड़ उठ खड़े हुए।
ये स्वर उन्होंने स्वप्न में सूना था।
तो कृष्ण आया था स्वप्न में चेतावनी देने। अर्थात सुयोधन की हार सुनिश्चित है। सभी कहते है कृष्ण जादूगर है, ये जादू कुछ समझ में नही आ रहा.....
कृष्ण जाते जाते मोहिनी मुस्कान कर्ण के भयभीत मानस पर अंकित कर चुके थे।
...इसलिए तो आए थे इतनी दूर..... शकुनी की हार सुनिश्चित करने!
1 comments:
Aapke Bhai Ki Bhabhi Ki...
Saas Ke Bhai Ki Biwi Ki...
Saas Ke Pati Ke Jamai Ke...
Pote Ki Maa Ki Nanand Ka
Bhai Apka kaun Hai???
jawab dijiye
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