अर्जुन टहलने इन्द्र के प्रासाद से बहार आ गए। सेब के बागान, उन पर लिपटी हुई फूलो के गुच्छोसे भरी हुई बेले, बादलो से ढका आसमान, और इस छोरसे उस छोर पर चमकता हुआ इन्द्रधनुष। गहरे हरीतिम वन, चौकडियाभरते हुए मृग, नन्हे नन्हे चीतल शावक, बाघ, बारह्सिंघ, यह सभी निर्भीक, बिना एक दूसरे से कोई वैर भावके शांत भ्रमण करते दिख पड़े।
विभिन्न प्रकार के मयूर पक्षी पंख फैलाये नृत्य करते व् श्वेत हंस झीलों में क्रीडा कर रहे थे।
इन्द्र के उद्यान में जल फवारो में उनकी अप्सराए जल क्रीडा कर रही थी। अर्जुन नही जानते थे वहा पैर रखना निषेध है। वे तो बस पृकृति के सौन्दर्य में उलझे न जाने कब वहा पहुच गए, नही जान पाए।
उन्हें देखते ही समस्त अप्सराओ का ध्यान उनकी ही तरफ़ आकर्षित हो आया।
अर्जुन इस अकास्मात मुठभेड़ के लिए तैयार नही थे। वे वही के वही खड़े रह गए।
उनके नेत्र स्वयम ही नीचे झुक गए।
परन्तु ये अप्सराए तो उन्हें देखती ही जा रही थी। यदि वे पृथ्वी पर होते तो कुछ और ही होता। स्त्री लज्जा से लाल हो आती, या तो अर्जुन की खैर नही, या स्वयम स्त्री ही भाग जाती। परन्तु यहाँ ऐसा कुछ नही।
वे सभी अप्सराए निर्निमेष अर्जुन को देखती ही गई। उन्हें ऐसा लगा के वे सभी उन्हें उन में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित कर रही थी।
अर्जुन ने हाथ जोड़ कर क्षमा मांग ली।
अप्सर्ये एक दूसरे की ओर देख कर हंसने लगी।
आओ धनञ्जय।
स्वर्ग की जल क्रीडा का आनंद उठाओ।
एक अप्सरा ने चुटकी बजाते हुए कहा, मनुष्यों की खासियत है, की कितने ही नयन चंचल क्यो न हो रहे हो परन्तु दिखाते ऐसा है जैसे दमन ही सर्वश्रेष्ट है। आर्य जाती तो यही करती है। काम का दमन। प्रेम का शमन। वीर्य से मुख चुरा कर ऐसा दिखलाती है जैसे की इनके अंगो में यह होता ही नही। मनुष्य इतना भ्रमित व् झूठा क्यो होता है?
दूसरी अप्सरा ने हँसते हुए कहा, लज्जा का गहना?
अर्जुन को ऐसा लगा जैसे वे बिन बात ही घिर गए है।
ये सभी अप्सराए इन्द्र की अमानत है।
वे सच्चे आर्य है, और दूसरो की अमानत की वे केवल रक्षा कर सकते है, भक्षण नही।
"ऐसे न हंसो" ये यहाँ अतिथि है।
हमारे स्वामी के सुपुत्र है।
अतः इन्द्रलोक पर इनका उतना ही आधिपत्य है।
उन सभी अप्सराओ में सबसे आकर्षक, स्वर्णिम आभा वाली एक नवयुवती जल में से निकल कर अर्जुन के समक्ष खड़ी हो गई।
उर्वशी!
ओह उर्वशी!
कोई आश्चर्य नही की पुरुरवा, अर्जुन के पूर्वज प्रेम में पागल हो अनंत अवधि तक विरह में भटके थे। उन्होंने राजपाट सब त्याग दिया था। तो वह उर्वशी ये थी। कोई आश्चर्य नही।
वह तो बनी ही प्रेम व् काम हेतु थी। लंबे सुनहरे केश, सर्प की भांति बलखाई हुई काया, स्वर्णिम त्वचा, बड़ी बड़ी गहरी काली आँखे, नए पीपल के कच्चे पत्तो जैसे अधर, अर्जुन उन्हें देखते ही रह गए।
उर्वशी मोहित हो अर्जुन को देखती ही रही।
पुरुरवा का अंश आज फिर उसके सामने जीवंत हो खड़ा हो गया था।
उर्वशी पुरु से प्रेम करती थी।
परन्तु इन्द्र के अधीन हो उसे स्वर्ग पर पुरु को त्याग कर आना पड़ा।
आज इतने वर्षो के पश्चात उसी पुरु कावंशज उसके सामने खड़ा था।
अर्जुन ने सविनय हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी।
उर्वशी ने सम्मोहन करने जैसे आवाज़ में कहा, अर्जुन हम अप्सराओ का धर्म केवल प्रेम व् आसक्ति ही है।
हम बंधी नही होती है।
हम किसी से भी प्रेम करने के लिए स्वतंत्र होती है।
"परन्तु मेरे लिए आप माता है" में पुरुरवा का वंशज हु। देवी न में गन्धर्व हु, न ही देव। में केवल एक मनुष्य हु अतैव मेरा धर्म मुझे यही कहता है की आप मेरी माता है।
क्योकि में इन्द्र पुत्र हु व् आपमेरे पिता की संगीनिया है अतैव में इस जल क्रीडा में सहभागी नही हो सकता।
अर्जुन दृष्टि झुकाए पीछे हट गए। कुछ दूर चल कर वे वापिस महल में अपने कक्ष में चले गए।
उन्हें यहाँ कुछ भी अच्छा लग नही रहा था।
वे कब से नारी-विमुख हो गए?
उर्वशी के क्रोध का ठिकाना न रहा।
पुरु जैसे दिखने वाले इस पुरूष को प्राप्त करने हेतु वह मचल गई थी।
कुछ भी हो जाए वह उसे पाकर ही रहेगी।
आज की रात्रि न्रित्य्सभा उर्वशी के यौवन से महकने वाली है। उर्वशी ने एक आखरी आसक्त दृष्टि अर्जुन के कक्ष पर डाली।
कौन है यह पुरूष जो उसेना कह गया?
वह इन्द्र की सर्वश्रेष्ठ न्रित्यांगना है।
अर्जुन की इतनी हिम्मत ? उसका आमंत्रण ठुकरा दिया गया?
उर्वशी इस पुरूष की कामाग्नि में झुलस रही थी।
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