Friday, March 27, 2009

दलदल !

एक गहरी खाई, गहरी और गहरी, बड़ी सी, विस्तृत, एक दलदल, कीचड ही कीचड, जिसमे पाव और नीचे और नीचे धंसता ही जा रहा है। कर्ण उस दलदल में फंसते ही जा रहे थे। हाथ मारे , पाव मारे , चीखे, कोई नही। उनके रथ का पहिया नीचे नीचे, और उस के साथ वे भी नीचे और नीचे, "मित्र मेरे होते हुए तुम्हे कोई हरा नही सकता", ऐसा वे सुयोधन से कह रहे थे परन्तु पृष्ठभूमि में न जाने कौन यह कह रहा था...... यदि तुम रहे ही नही तो........ सुयोधन का फिर क्या? .... किस की आवाज़ थी वह? .... कुछ जानी पहचानी सी.......कर्ण की साँस घुटने लगी.... उन्हें अपने प्राण जाते से प्रतीत हुए.....आँखे फटने लगी, भय व् कौतुक ने उन्हें और अधिक जकड लिया....
गहरी नींद से कर्ण उठ बैठे। प्रातः होने को थी। ब्रह्ममुहूर्त का स्वप्न। सच होता है। सुना है ऐसा।
कर्ण का सर पीड़ा से फटा जा रहा था। वह आवाज़ किसकी थी? सुनी सुनी सी। कौन है सुयोधन का शत्रु जो स्वप्न में उन्हें चेतावनी देने आया था?

कर्ण ने स्वयम को दर्पण में देखा।
वे किसी राजकुमार से कम नही लगते। अपितु दूसरो से कुछ बढ़ कर लगते है।
उनके रूप, रंग, सदचरित्र के चर्चे है। सुयोधन से सामीप्य की वजह से उन्हें हर तरफ़ प्रतिष्ठा प्राप्त है। ... परन्तु यह कितना सत्य है? यदि सुयोधन न होता तो?
कौन है वह?
क्या पहचान है उसकी?
वह एक सूतपुत्र है।
तो क्या?
वह सूतपुत्र है तो उसका क्या दोष है?
उसकी माता कौन है?
कर्ण ने सुना था की कवच कुंडल उसके साथ ही पाए गए थे। अर्थात वह किसी कुलीन राजवंश से है। कदाचित सूर्य वंश से क्योकि कवच कुंडल पर सूर्य की मोहर है। कर्ण ने अपने कवच कुंडल ध्यान से देखे। वे इन्हे प्रतिदिन देखते है। इन्हे देख देख कर वे अपने सूतपुत्र होने की कमी को कुछ सीमा तक महत्वाकांक्षा के शिखर पर लाने का प्रयास करते है, परन्तु न जाने क्यो कुंठा उन्हें दिन प्रतिदिन जकड़ती जाती है।
वे वह दिन कभी नही भूल पाये जब द्रौपदी ने सूतपुत्र कह कर उन्हें स्वम्वर में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन नही करने दिया। उन्हें कब स्त्री की आसक्ति थी? वे तो केवल अपने मित्र के लिए उस तुच्छ मत्स्या को अपने तीर से मार कर यह बतलाना चाहते थे की महाराज द्रुपद की शर्त कोई असंभव नही थी। फिर भी अर्जुन बाज़ी मार ले गया।
अर्जुन...अर्जुन...अर्जुन! कर्ण थक गए उस नाम को लेकर। जिसे देखो बिन बात ही उन्हें अर्जुन से स्पर्धा में लगा देता है। फिर अर्जुन इसलिए जीत जाता है क्योकि वह अवैध नही है। क्योकि उस पर राजवंश की मोहर है। क्योकि कर्ण की माता का नाम कोई नही जानता परन्तु ये सभी जानते है की वह एक सूतपुत्र है।
कर्ण आज प्रातः के स्वप्न में डूब गए।
आज उन्हें हस्तिनापुर में जाना होगा। सुनते है कृष्ण कुंती बुआ से मिलने आने वाले है।
जाते जाते कुछ राजकार्य हेतु दरबार में ही रुकेंगे।
अवश्य ही शकुनी व् दुर्योधन आज दरबार से कही नही जायेंगे।
कर्ण से कहा गया है वहा रहने के लिए।
कर्ण जानते है दुर्योधन केवल अपना बल दिखलाने के लिए उन्हें अपने साथ लिए फिरता है, परन्तु फिर भी वे आभारी है, जब उनके अपने माता पिता ने उन्हें त्याग दिया तो दुर्योधन का यह एक स्वय्म्केंद्रित आभार भी उन्हें अधिक ही प्रतीत होता है। वे उसकी कीमत अवश्य चुकायेंगे चाहे कुछ भी क्यो न हो। चाहे उनके प्राण ही क्यो न चले जाए और आज उन्होंने अपने प्राण जाते देख लिए थे... वह आवाज़ किस की थी?

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