Wednesday, March 25, 2009

इन्द्र! स्पर्श, दर्श, रसना, नृत्य, कला, सौंदर्य, वस्त्र, आभूषण......यह मायावी नगरी जाने कहा से प्रारम्भ होती है, जाने कहा सीमित हो जाती है? यह ऐसी दिखती है जैसे किसी नवयौवना ने अपने अनमोल आभूषण रात्रि में इस समस्त आकाश पर बिखेर दिए हो। तारो की तरह टिमटिमाती इस नगरी में प्रलोभन हाथो में स्वागत के फूलमाल लिए खड़े ही रहते है। यौवन यहाँ अधखिली कलियों से ही बाँध तोड़ तोड़ कर अटखेलिया करने हेतु बहने लगता है। गन्धर्व, किन्नर, और न जाने कितने प्रकार के आकर्षक युवक-युवतिया हाथो में नृत्य वाद्य लिए कर्णप्रिय सुर लगाये फिरते रहते है। सोमरस की मादकता इस नगरी की प्रत्येक स्त्री, प्रत्येक युवक में दिखाई पड़ती है। वय स्वर्णिम आभा से झिलमिलाती रहती है। विलास यहाँ हर अटारी पर आलस्य से भरा रेशमी वस्त्रो में लिपटा पड़ा रहता है। वृक्ष अनेक प्रकारों के फूलो से लदेहुए है। जिनकी सुगंध राह चलती हवाओ में बसी हुई है। यह इन्द्र की नगरी है। उसके राजदरबार में काम रति के साथ पैरो में घूँघरू बाँध मादक नृत्य करता रहता है। यहाँ रहने वालो को मनुष्य नही कहते। यहाँ की मादा को अप्सरा कहा जाता है। यहाँ के नरो को गन्धर्व कहा जाता है। संगीत उनका धर्म है। नृत्य उनके प्राण है। यौवन उनकी चिर स्थायी संपत्ति है। यहाँ बसने वाले मनुष्यों की भाँती पसीने से तर बतर नही होते है। इसे स्वर्ग कहा जाता है। यह प्रकृति का वह अंश है जो जीविका कमाने के लिए नही अपितु केवल प्रेम व् सौन्दर्य जीने के लिए बना है। मनुष्यों के स्वप्न जगत का एक हिस्सा जिसे पाने के लिए मानव ज़रा आने तक तरसता है।
प्रजापति इन्द्र जिस भूखंड पर रहते है, किसी भी दृष्टि से भूपति नही कहलायेगा। इसे कहा जाता है स्वर्ग। हिमालय की गोद में उतर कर, कैलाश पर्वत पर पहुचने से पहले ही इन्द्रलोक पड़ता है। समुद्रतट से बहुत ही ऊंचा, जम्बुद्वीप पर सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित होने की वजह से इसे स्वर्ग नाम दिया गया है। यह स्थान सदैव ही बादलो से घिरा हुआ है। यहाँ रहने वालो को देख कर नही लगता वे मनुष्य है। उन्हें जैसे इश्वर ने मनुष्यों पर केवल राज करने के लिए बनाया है। काम-मुखी अप्सराए यहाँ तितलियों की तरह बाहर से आए हुए युवको, व्यापारियों, योद्धाओं पर इतराती फिरती है। हा, इन्द्र की आज्ञा के बिना यहाँ कुछ नही होता है। यहाँ प्रत्येक अप्सरा इन्द्र के आधीन है। यदि वे आज्ञा दे तो ही कोई अप्सरा किसी पुरूष से लिप्त हो सकती है अथवा नही। वह आजीवन इन्द्र जो स्वर्ग का देवता है, उसकी दासी बन कर रहेगी। इन अप्सराओं को देख कर नही लगता की वे ऐश्वर्य को त्यागना कभी पसंद भी करेंगी।
"ये तो कभी जंगलो में कृष्णा की भाँती कभी नही चल पाएँगी", अर्जुन ने मन ही मन सोचा।
कृष्ण ने अर्जुन को इन सभी के बारे में समझा दिया था। परन्तु समझाने से क्या होता है? यात्रा तो अर्जुन को करनी है। संवेदनशील अर्जुन अभी भी कृष्ण को कोस रहे थे। एक तरफ़ कह गए योद्धा बनो। पुरुषार्थ पहचानो। और दूसरी ओर ऐसी नगरी में जाने बोल दिया जहा की युवतिया बस आँखे फाड़ फाड़ कर उन्हें आमंत्रण दिए जाती है। उनका क्षत्रिय रक्त वीर रस त्याग कर कही सौन्दर्य रस में न डूब जाए।
इस नगरी की चकाचौंध देख कर वे पसीने पसीने हो आए।
ऐसा नही है की वे नारी से डरते है। महलों में दसियों का जमघट, व् राजाओ के प्रासादों में क्रीडाये हेतु जब तब सुन्दरियों से सामना होता है रहता है, परन्तु तब वे राजकुमार हुआ करते थे।
नियति ने उन्हें पटककर औंधा मुह गिरा दिया है। अब वे केवल एक धनुर्धर है।
इतना डर तो तब भी नही लगा था जब पानी में ऊपर गोल घूमती हुई मत्स्य की आँख को भेदना था।
यहाँ तो वे स्वयम एक मत्स्या की तरह महसूस कर रहे थे। जैसे अर्जुन ऊपर लटक कर गोल गोल फिर रहे हो, और नीचे साक्षात् कामदेव रति को आलिन्गंबध्ध कर हाथो में तीर लिए अर्जुन को निशाना किए खड़े हो।
पल भर में समझ गए अर्जुन।
कृष्ण...... यह केवल कृष्ण का काम है।
अर्जुन मन ही मन मुस्कुरा उठे।
कृष्ण भी बहुत अजीब ढंग से प्रशिक्षण देते है।
इन प्रलोभनों में से होकर अब इस धनुर्धर को दिव्य शस्त्र पाने होंगे।
....और एक परीक्षा ...............
परन्तु सामने आते हुए ऐरावत व् इन्द्र, और उसकी भव्यता सुन्दरता से आवाक अर्जुन जहा खड़े थे, वही खड़े रह गए।
उन्हें याद आई कृष्ण की रहस्यमयी मुस्कान, युद्ध, जीतना है तो इन्द्र की शरण में जाओ।
वे मुझे जितवाना चाहते है या इन सुन्दरियों के हाथ मरवाना?
इससे तो गुरु द्रोणाचार्य ही ठीक थे जो रात्र भर एक पैर पर खड़ा कर अभ्यास लेते थे।
जाने क्या मज़ा आता है कृष्ण को ये सब करने में?
अर्जुन इन्द्र के साक्षात्कार के लिए आगे बढे।

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