Thursday, March 12, 2009

अगला कदम, दुर्ग पर विजय।
परन्तु उससे पहले दुर्ग का नक्शामस्तिष्क पर छपा होना चाहिए।
उद्धव जी ने मानचित्र कृष्ण के सामने रख दिया। वह एक ताबीज़ जैसे लकड़ी के बने यंत्र में संभल कर छिपाया गया था। उद्धव जी कृष्ण को वह गोल घेरा बतलाया जहा कृष्ण अपनी शस्त्र कला का प्रदर्शन करने वाला था। उस गोल खेमे से कुछ उचाई पर रहेगा कंस का सिंहासन। वह चारो ओर से अपने अंगरक्षकों से घिरा होगा। उसके समीप होगा अक्रूर। उसका सबसे अधिक भरोसेमंद व् कूटनीति विशेषग्य मंत्री। कृष्ण कंस के समीप तभी जा पायेगा जब अक्रूर को उसके स्थान से हिला दिया जाएगा, और वह योजना कभी की बना ली गई है।
कंस अंहकार के अधीन हो इन राजनैतिक गतिविधियों से सर्वथा अनभिज्ञ था। उसने राज काज अक्रूर पर छोड़ दिया था और स्वयं मदिरा व् स्त्री आसक्ति में डूब चुका था। उसका पतन उसके इतने करीब था और उसे ख़बर भी न थी। वैसे भी मृत्यु दबे पाँव ही आती है। परन्तु कंस राजगद्दी के मद में चूर, विलासिता की चरम सीमा पर बेहोश पड़ा था। ऐसी स्थिति में उसे मात देना आसन था। और यदुवंशी महानायकों को ऐसे ही मौके की तलाश थी। आखिरकार यह मौका हाथ आ ही गया था, जब कंस राज्य में चलने वाली गतिविधियों से बेखबर जलसे का आयोजन कर रहा था।
अक्रूर को गद्दी से हिलाने के लिए बलराम मुख्य द्वार पर तैनात सैनिक को एक गुप्त सूचना देने वाले थे जिसके अंतर्गत उनकी सीमा पर पड़ोसी सम्राट का धावा होने वाला था। बस यह सूचना अक्रूर को जैसे ही मिलेगी वह अवश्य ही आपातकालीन बैठक बुलवायेगा अपने सेनाधिकारियों व् गुप्तचर विभाग के साथ। वर्षो के दमन ने बुध्धिजीवी वर्ग को इस क्रांति में सहयोगी बना दिया था। कह सकते थे वह गुप्तचर विभाग कंस का नही अपितु कारागृह में बंद वासुदेव का था। उस गुप्तचर विभाग की वजह से ही कृष्ण भी टोकरे में अपने पिता के सर पर यमुना के पार पहुच पाया। केवल कंस को जरासंध का समर्थ होने की वजह से सैन्यबल बहु मात्र में प्राप्त था। कंस व् अक्रूर व् जरासंध ने मिल कर सभी बड़े, स्वामिभक्त नायको को हाथो हाथ मौत के घाट उतार दिया। उस समय बचे हुए बुध्धिजीवी नायको ने यथासंभव कंस की आँखों में धुल झोंक कर कृष्ण का शैशव सुरक्षित कर लिया, ताकि इस गद्दी का असली उत्तराधिकारी बच सके। अब जनता के समक्ष कृष्ण को सही उत्तराधिकारी साबित करने के लिए आवश्यक है की कृष्ण कंस का वध सम्पूर्ण मथुरा वासियों के समक्ष करे।
कृष्ण ने बारीकी से दुर्ग, दीवारे, व् रास्तो का अध्ययन कर लिया। उन्हें अपनी तरफ़ से अपने योध्धाओ को सामान्य प्रजा की सुरक्षा हेतु साधारण कपड़ो में नियुक्त करना था, और यह तैयारी भी पूर्ण हो चुकी थी।
अक्रूर का वध भी निश्चित था, उस कक्ष में जहा वह गुप्तचर विभाग के साथ आपातकालीन बैठक करने वाला था।
यदि यह असफल होता है, तो आगे की योजना भी तय थी।

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