Friday, March 6, 2009

पिया भये परदेसी

उद्धव जी शांत मुद्रा में कमर पर हाथ धरे नन्द जी के कक्ष में आसन पर विराजमान थे। ग्राम्प्रमुख श्री नन्द, किशोर कृष्ण, व् बलराम किसी गंभीर विचार विमर्श में तल्लीन थे। अन्दर रसोई से यशोदा की सिसकिया दबे मुह सुनाये आ रही थी। राधे सशंकित हो द्वार के परदे से झाँक कर देखने लगी। अन्दर कोई और नही आ सकता था। स्वयं राधे भी नही। उसे भय हो आया था। जाने क्या अमंगल घटित होने जा रहा था? उसका ह्रदय ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा।
कंस कितने अंगरक्षकों के बीच होगा? नन्द जी चिंतित स्वर में उद्धव जी से पूछ रहे थे। वहा शस्त्रों की संख्या कितनी है व कंस के अंगरक्षकों के अलावा सैन्यबल की क्या स्थिति होगी?
उद्धव जी ने सुशांत स्वर में उत्तर दिया आप चिंतित न हो नन्द जी समस्त मंत्रिगन व वरिष्ठ सेनाधिकारी इस क्रान्ति में सहयोगी ही सिद्ध होंगे। अब केवल कृष्ण की प्रतीक्षा है। हम सभी ने बचपन से कृष्ण को इस दिन के लिए ही तो सर्वश्रेष्ठ युद्धकला सिखलाई है। अब समय आ गया है की कृष्ण अपने झूठे अवतार से बाहर आ कर अपना असली रूप इस जगत पर प्रकट करे। अब कृष्ण को राजकाज संभालने पहुच जाना चाहिए, स्वयं वासुदेव की भी यही मानना है।
राधे आश्चर्य जनक हो दिवार से टिक कर ठिठक गई। उसका कांह राजपुरुष? नही । वह तो ग्वाला है। उसके मन दर्पण का ....... राधे को ज़ोर से रुलाई फ़ुट आई। वह कैसे जियेगी अपने कांह के बिना?
नन्द जी यदि आप यदुवंश का भला चाहते है तो बेझिझक पुत्र को कंस का वध करने की आज्ञा दे। जरासंध अपनी सीमा से अति दूर लड़ने गया है। यदि वह आ गया तो कृष्ण को दोहरी मार पड़ सकती है, और हो सकता है इतने वर्षो की की हुयी तपस्या यु ही धूलधूसरित हो जाए।
कृष्ण ने उद्धव से उत्तर में हामी भरते हुए कहा, हा बाबा अब समय आ गया है।
राधा चकित रह गई। उसका कांह सुसंस्कृत राजकीय उच्च वर्गीय सुवर्ण भाषा में बात कर रहा था। कहा कांह उसे खड़ी गोकुल बोली में भला बूरा सुनाता है और कहा यह संस्कृत भाषी उच्चवर्गीय राजपुरुष? कौन पुरूष है यह? वह तो इसे ही अपना पति माने हुए थी। कांह के नयन राधे के नयनो से ऐसे टकराते थे जैसे कितने जन्मो उन्होंने राधे की प्रतीक्षा की थी। फिर यह पुरूष कौन है? वह क्यो पहचान नही पा रही थी? कांह उसके मन में बसा था परन्तु इस रूप से वह सर्वथा अपरिचित थी।
बस अब वह और झूट बर्दाश्त नही कर सकती थी। कांह उससे खेल खेल रहा था और जब राधे कृष्ण से प्रेम कर बैठी तो कृष्ण चल दिया अपने रथ पर आरूढ़ हो मथुरापति बनने? झूट। असत्य भाषी। क्यो? क्यो? राधे को तो बतला सकता था वह अपनी असलियत? राधे से क्यो छिपाया? उसे क्यो बनाया? क्या आवश्यकता थी? राधे को ज़ोर से रुलाई फ़ुट आए।
कौन है वहा? नन्द अचानक बिजली की गति से तलवार हाथो में लिए राधे के सामने आ खड़े हुए। राधे को देख बरबस ही उनकी तलवार नीचे गिर पड़ी। कृष्ण दौड़ कर बाहर आए। राधे... रा......राधे अब और सहन करने की सामर्थ्य खो चुकी थी। चेहरा हाथो में छिपाए वह नंगे पाओ जमुना तीरे दौड़ पड़ी।
वह बदहवास नंगे पैरो दौड़ती गई। उसके पैर झाडियों के काटो से उलझ उलझ कर जख्मी हो गए थे। रक्त बहने लगा था। परन्तु राधे रुकना नही चाहती थी। अपने दृष्टिहीन प्रेम की सज़ा वह अपने पैरो को दिए जा रही थी। दुखने दो। आज वह इतने दर्द में थी की रक्त की धार बह चली थी और राधे को दर्द का पता ही नही चल पा रहा था।
वह अपने ही बनाये माया जाल में फंसी हुयी थी। उसका कृष्ण जैसे उसकी ही मरीचिका सिध्ध हुआ। हताश राधे कांह से नाराज़ एक ऐसे रेगिस्तान में पहुच गई थी जहा केवल चिल चिल धुप व केवल प्यास थी। उसका प्रेम का झरना उसे सुखा हुआ प्रतीत हुआ। वह केवल एक जलीय सतह था जिस पर उसके कांह की मोहक छवि अंकित थी।
राधे किसी झाडी से उलझ कर गिर पड़ी। उसने इधर उधर देखा। वह जंगलो के बीचोबीच आ गई थी। कदाचित ग्राम से कुछ दूर। उसकी दृष्टि उस प्राचीन शिव मन्दिर पर पड़ी जो उसके स्वप्न में आया था। वह केवल एक खंडहर था। सुनसान टूटा फूटा एक अवशेष। वहा किसी फूलो की लताओं का नामो निशाँ न था। वह लडखडाते हुए मन्दिर की ओर चल दी। द्वार के मुह पर मकडियों के बड़े बड़े जाले थे जैसे किसी ने सदियों ने उस मन्दिर के कपाट न खोले हो।
वह चकित थी। भयभीत थी। ये स्वप्न ऐसे कैसे होते है? सत्यदर्शन तो दूर व्यक्ति समझ नही सकता के केवल स्वप्न देख रहा है? सुबह के स्वप्न में और इस प्रत्यक्ष सत्य में ज़मीन आसमान का अन्तर था। कापते हुए हाथो से राधे ने उस बंद मन्दिर के कपाट खोलने के लिए धक्का दिया। कर्र कर्र्र की आवाज़ से भारी भरकम कपाट अर्ध खुल पाया। वह मन्दिर के भीतर दाखिल हो गई। उसने देखा शिवलिंग। ऊचा, धूल से भरा शिवलिंग। जैसे किसी ने सदियों से वहा कोई पूजा अर्चना न की हो। यह शिवलिंग ऐसे दिख पड़ा मानो उसकी उमा ने आज ही स्वयं को अग्नि के सुपुर्द कर दिया था, और शिव पत्थर बन वही पड़ा रह गया था। एक कभी न समाप्त होने वाली समाधि में विलीन।
राधे शिवलिंग पर मस्तक टिका कर बेसुध हो गई।

0 comments: