होली है। ब्रिज की भूमि गुलाल से महकने लगी है। कल रात के होली पूजन के बाद राधा चुपके से कांह से मिलने निकल गई। बड़ी मन्नत मनाई के बाद कही जा कर कांह मान गया। वो तो कांह है। कांह के बिना होली का क्या मज़ा?
राधे स्वप्निल नयनो से घर आ कर सो गई। कल बरसाने की गलियों में कांह धूम मचाता घूमेगा। उसके साथ धूम मचाएंगे उसके गोप सखा व् राधे की सखिया। ग्राम के बीचोबीच वृक्ष पर एक बड़ा सा रंग भरा मटका टंगा दिया जाएगा और फिर जो भी वहा से निकलेगा, बच नही पायेगा।
कांह की मूरत आँखों में लिए राधा कब सो गई उसे पता नही चला। भोर होने को थी। चंद्रमा अभी भी बादलो पर बैठा आँखे मल रहा था। राधे ने देखा की वह मधुबन के प्राचीन शिव मन्दिर के प्रांगन में बैठी है। शिवलिंग को दुग्ध्धार से स्नान करा कर वह गुलाबी फूलो से लदी हुयी लताओं से फूल चुनने बैठ गई थी। हाथो में चांदी के थाल में पिसे हुए कनक को गीला कर एक दिया बना हुआ था। उसमे राधे ने बड़े मन से एक धागे की पिरोई हुई बात बनाई। मन्दिर के जलते हुए धूने से वह बात जला ली। ज्योत राधे के चेहरे सी दमकने लगी। थाल के एक और उसने सूखा गुलाल भर लिया। गुलाबी फूलो से बनाई एक माल।
वह मन्दिर के द्वार पर खड़ी हो राह ताकने लगी।
और फिर क्षितिज के धुंधलाते तारो से प्रकट होता हुआ दिखाई दिया उसका कांह। श्यामल कजरारी आँखों वाला कान्हा। वह श्वेत वस्त्र धारण किए था। उसका मोर मुकुट आज नीला हरा सुनहरा नही था अपितु वह था श्वेत मोरो के पंखो से बना हुआ। उज्जवल, दुग्ध धार जैसा पवित्र, गंगा की धार सा लहराता सा वह एक श्वेत एरावत जैसे हाथी पर बैठा हुआ मुस्कुराता हुआ राधे की और चला आ रहा था। समीप आ कर हाथी ने वह गुलाबी फूलो वाली लताओं को हिला हिला कर राधे को पुष्पवर्षा से निहाल कर दिया, कृष्ण हँसता हुआ हाथी को हौसला दे रहा था। आज वह दिन भर पुष्प अथवा गुलाल से राधे को थका थका कर निढाल कर देने वाला था। राधे ने विनीत दृष्टि से कृष्ण की ओ र देखा। कृष्ण तरस खा कर नीचे उतर आए, राधे ने पुष्पमाल अपने वर के गले में पहना दी। दिया उनके प्रेम का साक्षी बन दोनों को निहार रहा था।
पक्षियों के कलरव से अचानक राधे जग पड़ी।
चारो तरफ़ देखा। वह अपने कक्ष में थी। यहाँ कोई मन्दिर न था। पुष्पवर्षा, कांह, एरावत कोई भी नही।
यह तो केवल एक स्वप्न था। ....... और समाप्त भी हो गया?
उद्धव आए है। उद्धव आए है। बाहर शोरगुल सुन कर राधे कक्ष से बाहर आ गई।
यही था वह दिन जब श्याम राधे से कहने आया था ..... राधे अब मुलाक़ात हो ना हो। मथुरा जा रहा हु। .... और राधे चक्कर खा कर जमुना तीर आ बैठी थी। ऐसी होली बरसाने-गोकुल ने कभी न देखी थी, जो राधे ने देखी उसके निष्ठुर, निर्मम, निर्मोही श्याम के बिना!
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