प्रेम का प्याला गरल भरा होता है। वह खाली नही होता है। चाहो भी तो खाली नही हो पाताहै। तुम चाहोगे की यह गरल होटोंसे नही लगना चाहिए तो नही ऐसा कुछ भी नही होगा। जब वह प्याला उठाया गया था पीने के लिए, मदमस्त होने के लिए, तभी वह भरा हुआ था, गरल से। उसे पीकर पहले अमर होना पड़ता है, फिर प्रेम मिलता है, जैसे राधे को मिला।
राधे को प्रेम भावनात्मक व् अध्यात्मिक स्तरपर मिला। रुक्मिणी को भावनात्मक व् भौतिक स्तर पर, सत्यभामा को भौतिक स्तर पर, जो प्रेम को जिस स्तर पर चाहे वह उसे पा जाता है, पर हा कीमत चुकानी पड़ती है। कोई सब कुछ खो कर उसे पाता है, कोई पाने के लिए सब कुछ खो बैठता है, तो कोई बस खोता है, पाता कुछ भी नही, शायद खोजने की प्रक्रिया में भटकता होगा।
कृष्ण ने क्या खोया, क्या पाया? कृष्ण देने के आदि थे। पाने की आकांक्षा कितनी रख पाते है, पता नही।
पर नियति ने किसी और ही मोर्चे पर इस समय उन्हें बाँध कर रख दिया है। युद्धभूमि पर। भविष्य में होने वाला युद्ध उन्हें आज झकझोर रहा है। उनके काँधे पर योजनाओ के तुणीर बंधे हुए है, कमर पर न्याय की तलवार, पैरो में धर्म की जंजीरे, हाथो में समय रुपी रथ के घोडो की लगाम, ललाट पर विजय का तिलक, होटों पर मुस्कान, आँखों में संवेदन, व् मस्तिष्क में चिर सहस्त्र योजनों तक फैला उज्जवल, प्रज्जवल प्रकाशित व्योम।
कृष्ण के हाथो में समय ने दो तलवारे दे दी है। आज उन्हें निर्णय लेना है। कौन सी तलवार से वे अपना फ़ैसला सुनायेंगे? एक तरफ़ उनका अपना ह्रदय है, दूसरी तरफ़ उनकी प्रजा। वे किस ओर जायेंगे? उन्हें अपने दायित्वों से तनिक भी आपत्ति नही है। वे सक्षम है अपनी प्रजा, समस्त प्राणी जगत का पालन करने में, परन्तु आज उन्हें पल पल रंग बदलती हुयी राजनीति, सत्ता, द्वारिका का दुलार, उससे बंधा हुआ उनका परिवार, व् समस्त जम्बुद्वीप पर आई हुई राजनैतिक विषमता का सामना करना होगा। दुविधा यह है की न्यायाधीश केवल वे है, क्योंकि और सब की आँखों पर लालसा की पट्टी बंधी है। कोई उन्हें चाहता है, कोई उनका भक्त है, कोई अपने प्रियजनों से बंधा है, कोई मरने से डरता है, कोई समय की पदचाप से डरता है, कोई आहत होने से डरता है, उन्हें इस समूचे परिसर में एक भी व्यक्ति नही दिखाई पड़ता जो आँखों पर एक सफ़ेद पट्टी बाँध कर न्याय का तराजू हाथो में लेकर फैसला सुना दे। समस्या विकट है। संगीन है। और केवल कृष्ण अर्थात काली है, घनघोर अँधेरी घमासान घटाए घिर आई है। किसी न किसी को विद्युत् रुपी शक्ति हाथो में लेकर खड़े होना पड़ेगा। किसी न किसी को उस अनंत शक्ति का सामना करना होगा, बिना जले, बिना मरे, बिना आहत हुए।
कौन होगा वह?
कृष्ण अपने खयालो में खोये हुए महल के परकोटे पर आ पहुचे। समुद्र से उठती हुए ऊची ऊंची लहरों में खड़ा उनका महल ऊपर आसमान को चुनौती सा दे रहा था, और वे अपना कद उस आसमान तक पहुचता महसूस कर सकते थे।
वे ही है न्यायाधीश।
वे करेंगे न्याय।
सबके साथ।
और इस बार स्वयं के भी साथ।
चेहरे पर न्यायसंगत विजय की मुस्कान से कृष्ण ने उगते हुए सूर्य को नमन किया।
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