Saturday, February 14, 2009

फिर कृष्ण ने सारीरात्र बांसुरी बजायी पर राधे नही आई। यमुना घाट सुनसान था। मधुबन भी उदास था। चन्द्रमा अकेले ही अपनी चाँदनी में जल रहा था। जल शिलाओ से टकरा टकरा कर बस बह जाता था। कृष्ण पहली बार रोया था।

राधे ने धड़कते हुए ह्रदय को थाम लिया था। वह अपने चंचल ह्रदय को समझाना चाहती थी की एक छल करने वाले का साथ देना ठीक नही है। यदि कृष्ण इतना ही चाहता है उसे तो कह क्यो नही देता उससे। राधे की ये हठनही थी। बस वह इतना चाहती थी के कृष्ण उसे सचमुच चाहे। अपने ह्रदय में स्थान दे। जैसे राधे तड़पती है वह भी तडपे। वह नही जानती थी श्याम के मन की बात। सावरे ने कभी बतलाया ही नही। बस युही अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाता रहता है। किसलिए। कन्हैया बस करो। हृदयों के साथ खिलवाड़ बुरी बात है। हमें क्या पता की तुम रोते हो या रुलाते हो।

कृष्ण की बांसुरी राधा के बिना अधूरी थी। उसी कदम्ब वृक्ष के नीचे खड़े खड़े वे बादलो को निहारते रहे। वे जिद्दी है। हठी है। राधे को मनाना, मनवाना उनके लिए आसन था, परन्तु राधे उन पर संदेह करे यह उनके लिए असहनीय था। रोहिणी नक्षत्र का तारा चन्द्र के अत्यन्त समीप शोभायमान था। रोहिणी संगिनी है चंद्र की। चंद्र खिल उठता है इस चाँदनी में नहा कर। पर न जाने क्यो आज के दिन यह चाँदनी चुभ रही थी। कृष्ण को! राधे को!

अब कौन किसे मनाये?

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