Wednesday, January 28, 2009

राह की धूल से भरे हुए श्रीकृष्ण समीप की झील में स्वयं का मुख निहारने लगे। साथ में लाये हुए वस्त्र व् शस्त्र उन्होंने युधिष्ठिर को सौप दिए। झील की नैसर्गिक सीढियों से उतर कर पानी की सतह पर वे अपने बाहुओ को निहारने लगे। दिन प्रतिदिन उन्होंने ब्रह्मचारी अवस्था से स्वयम का गठन किया है। तब वे यह नही जानते थे की इस प्रशिक्षण का तात्पर्य क्या है। बस इतना जानते थे की हर कार्य का एक तात्पर्य होता है। हर कर्म के पीछे एक उद्देश्य होता है। प्रकृति यु ही खेल नही खेलती। इस ब्रह्माण्ड की हर एक प्रतिक्रिया व् क्रिया का एक धर्म होता है जिसे वह अपने अनुशासन में ढालती है। वस्त्र हटतेही कृष्ण का योद्धा स्वरुप गठित रूप प्रकट हो गया। ब्रह्मण के कोमल रूप में उन्होंने बखूबी स्वयं को छिपा लिया था। अपने मन मस्तिष्क में वे स्वयम को धूल व् स्वेद से भरे हुए युद्धभूमि में शत्रुओ से घिरे हुए स्पष्ट देख सकते थे। बाकी के राजा तो कल जब युद्ध होगा तब लडेंगे परन्तु कृष्ण ने मस्तिष्क में आज ही सम्पूर्ण रचना देख ली थी। वे देख चुके थे क्रिपाचार्य, द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह का युद्ध कौशल। शत्रु को कभी कम नही आंकना चाहिए। गुप्त विद्या ओ के पारखी है श्रीकृष्ण। पर उनके इस वर्तमान में एक और प्रश्न है, युद्ध तो बाद की बात है, पहला प्रश्न है पांडवो की योग्यता। कितने योग्य है वे इस युद्ध को jeetane के लिए। राजसिक युध्ध्कौशल बाद की बात है, पहले कितने बुलंद हौसले है उनके? उन्होंने पञ्च पांडवो को हस्तिनापुर से सर झुकाए निष्कासित हो देखा था। द्रौपदी वस्त्र हरण ने पांडवो की कमर तोड़ दी है। पिता पांडू के वंश से यह बर्बरता शुरू ही है। पांडू में इतनी शक्ति नही थी की राजसिंहासन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते। उन्हें तो अपने काम के वेगो को भी नियंत्रित करना भारी पड़ता था। काम! कृष्ण मन ही मन मुस्का दिए। यह भी एक शक्ति है। अपव्यय की जाए तो अत्यन्त विध्वंसकारी, यदि सहेजी जाई तो परम अचूक शक्ति। कृष्ण यु ही तो योगेश्वर नही कहलाते? कदाचित ये विद्या उन्होंने राधा से ही सीखी है। समस्त रस्नाओ व् इन्द्रियों को एक dhuri पर lakar, वे उन्हें एक केन्द्र पर केंद्रित कर देते है, अंतस को निर्विकार कर, स्पष्ट श्वेत ओज का रूप देकर वे स्वयं उस में समाहित हो जाते है। तब यही काम बन जाता है उनका शस्त्र , कवच, आकर्षण, विकर्षण, शक्तिपुंज। यही केन्द्र है तेजस्व का, शौर्य का!

काम को केंद्रित करने की आवश्यकता तब पड़ती है जब व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक रूप से गठित होने लगे। समस्त प्राणी जगत आवाक हो कृष्ण को निहारते रहते है। उनका आकर्षण कदाचित ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले नक्षत्र व् गृह भी महसूस करते होंगे। पता नही कृष्ण गृहों को मात देते है या गृह ही इर्ष्या वश कृष्ण के पीछे पड़े रहते है? कृष्ण अपनी कल्पना पर हंस पड़े।

पांडवो ने दुर्भाग्यवश नही अपितु पितृ व् माता द्वारा पाए हुए अनुवांशिक गुणसूत्र के दुर्गुणों का हिसाब चुकता किया है। कुंती स्वभावतः भीरु प्रवृत्ति है। किसी और से प्रेम करते हुए भी वह पांडू रोग से पीड़ित राजकुमार से विवाह करने के लिए बद्ध थी। वे वन वन इसलिए नही भटक रहे की शकुनी शक्तिशाली है अपितु इसलिए भटक रहे है क्योंकि उन्होंने स्वयम को, व् अपने केन्द्र को यह संदेश अभी तक नही दिया है की वे ही इस राजसिंहासन के हकदार है। अपने अंतर्मन से भयभीत पांडव अपनी पत्नी की रक्षा नही कर पाए। अपने मन के सम्मुख दुर्बल पड़ता अर्जुन अपनी प्रिया को खो आया। केवल इच्छा काफ़ी नही होती कुछ पाने के लिए, उसेतन, मन, धन, आत्मा से पाने की अभिलाषा करनी पड़ती है। वही होती है इच्छाशक्ति। उसे ही विजय कहा जाता है। और वही होती है विजय होने के लिए। संभावनाओ का कोई अर्थ नही होता। उन्हें सम्भव बनाया जाता है। अकास्मात कुछ नही होता उसे मन व् तन की इच्छा से किया जाता है। बस इच्छा कितनी बलवती है, यही जानने जैसा है। और फिर वह कितनी सही है? उसे होना चाहिए या नही? पर ये सब गौण है। पांडवो का अंतस विक्सित करना पड़ेगा। तभी होगा कृष्णा का प्रतिशोध पूरा। अन्यथा पांडव कृष्णा की दृष्टि में केवल कुचले हुए कीडे है, वह कभी उनका सम्मान नही करेगी।

कृष्ण अर्जुन की ओर देखने लगे। इसे अभी बहुत कुछ सीखना है। ये परिपक्व नही है। न तो युद्ध के लिए और न ही स्त्री के लिए। अभी बहुत काम बाकी है।

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