Tuesday, January 27, 2009

कृष्ण की चुप्पी बौखलाने वाली है। न तो कुछ कहता है, न कुछ बोलता है। गहरी गहरी मूक आँखे न जाने क्या कहती रहती है, जिन्हें पढ़ना जैसे किसी विदेशी लिपि को पढने जैसा है, या फिर एक ऐसे प्राचीन अवशेष पर आधी मिटीआधी लिखी विलुप्त भाषा जिसे पढने का आखरी स्त्रोत भी कही विलुप्त हो गया हो।

वह किसी पहेली से कम नही लगता। एक तरफ़ ढीटहै तो दूसरी तरफ़ उतना ही तरल। श्यामल छवि, विद्युत् गति, गंभीर दृष्टि, स्नेहल मुस्कान, कभी उदास, तो कभी कही अंतस में खोया खोया, कभी एकदम ही विपरीत। चंचल नयन, और समस्त दुनिया से लापरवाह, अपने मन का राजा।

कौन सा चेहरा सच्चा है? समझ में नही आता। उसकी आवाज़ में एक शून्य है। एक अंतराल। दिखावे की खनक। ह्रदय बटोर कर जैसे सारे शब्दों का जंजाल रचता हो, और फिर स्वयं ही समझ जाता हो की वह झूट बोल रहा है, और वह भी उससे जिससे उसकी जिव्हा बात नही करती केवल नयन बोलते है। नयनो को भी झूट बोलना सिखा दो मयूर धारी। फिर कोई झंझट नही रहेगा। कोई तड़प नही। कोई परेशानी नही। कोई सवाल भी नही आएगा। कोई जवाबदारी भी नही। कोई जंजाल ही नही।

कभी कभी वह जैसे एक कोरे पर्ण पर एक कलाकार की खीची हुई कलाकृति जैसा लगता है। उसकी चुप्पी मेरे ह्रदय को विदीर्ण करती है। उसकी आवाज़ मेरे ह्रदय के आर पार हो जाती है। वह श्यामल सघन मूर्ती मेरे मानस पर स्पष्ट अंकित हो जैसे सर्वदा प्रतीक्षारत है। जिसकी मौन बांसूरी भी कोई संगीत छोड़ जाती है फिर फिर कानो में गूंजने के लिए।

उसकी बेचैन करवटें, उसकी सहमी हुई स्थिरता, जैसे कोई मृग शावक इधर उधर कुछ टटोलता, न जाने क्या खोजता, बरबस स्वयं को भीतर से कचोटता या फिर बड़े यत्न से संभालता हुआ नितांत दर्शनीय है। वह थका हुआ प्रतीत होता है अपने मन के उठाते हुए उफानों से। सुकोमल, सुकुमार कदाचित ही किसी तूफ़ान के थपेडो से गुज़रा हो। जैसे किसी फूल की कोमल पंखुडी पर संभल कर गिरी हुई ओस की बूँद हो। मेरा दिल नही करता उसे परेशान करने का। समय की कोई कठोर दृष्टि भी न पड़े उस पर। मेरा क्या तलवारों सी कही भी टकरा जाती हु। आवारा हवाओ की तरह सायं सायं गलियों से, रास्तो से, पर्वतो से टकराना मेरी आदत में शुमार है। मे कड़कती धुप तो वह श्यामल बादल। में फूटता निर्झर तो वो शांत साहिल। में एक आंसू तो वो सीप। में केवल रेत तो वह स्वाति नक्षत्र की अम्रित्बून्द। उसका मेरा मेल नही है। वह मेरे जैसा नही है और में उसके जैसी नही हु। फिर भी वह रहता है मेरे ह्रदय में। मुझ में। वह स्वप्नवत मेरे सामने रहता है, और में भरी नींद में उसे जी भर देख लेती हु। जानती हु नींद से उठूंगी तो वह नही होगा मेरे आसपास। तब यही आवारा रास्ते और में।

और बस उसका नाम।

राधे कृष्ण की स्मृतियों में विलीन थी।

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