कान्हा ! 'देखो-देखो मेरे पाँव में कांटालग गया है।' रुधिर बह रहा है। देखो न कान्हा। राधे ने पुकार कर कांह की ओरदेखा। कांह गैया के सीन्घो पर सोने का पानी मढ़ रहे थे। कांटा, राधे के पैर में, सुनते ही दौडे चले आए। रुधिर, राधे- राधे! कहा ? बताओ! दिखाओ? कांह को बिलखते देखराधे हँसी न रोक पाई। हंसती चली गई। कांह ये क्या ? रो क्यो रहे हो? कांह का चेहरा देखने जैसा था। सबको नाच नचैया नाचने वाला स्वयं रुआंसा हो आया था। राधा हंसते-हंसते रुक गई। कांह की आँखों में अश्रु वह नही देख सकती थी। वह तो बस ठिठोली कर रही थी। कांह भी तो सताता है उसे। द्वार पर बेशर्मो की तरह नन्द बाबा के सामने टकटकी लगाये उसे देखता रहता है। वह स्वयम को लाज के मारे कहा छिपाए समझ नही पाती है। अब मौका मिला बदला लेने का। पर काहे का बदला? ऐसी ठिठोली किस काम की जो कांह को रुलाये? कांह मेरे पैर ठीक है। काँटों की क्या मजाल ? जिसे कांह मिला हो, उसकी गोद में प्रकृति केवल फूल बरसाती है। तुम्हारी राधे ठीक है। कांह फिर राधे से कृत्रिम क्रोध प्रर्दशित कर वापिस गैया की ओर चल दिए। फिर दूर दूर से गैया के कानो में कुछ कहे जा रहे थे। राधे चिढ गई। क्या कर रहे हो? तुम्हारी बुराई। कांह ने हँसते हुए उत्तर दिया। राधा पैर पटकती हुई सखियों में जा मिली। अब नही मिलूंगी तुम से। अपने सखाओ में रहा करो। लड़कियों में कुछ अधिक ही समय बिताते हो। देखना सहस्त्र नारिया होंगी फिर भी मेरे लिए तरसोगे, मुझे ही याद करोगे! क्रोधित राधे ने उत्तर दिया।
वन की सुन्दरता, कृष्ण को बरबस पीछे की ओर लौटा लिए जा रही थी। एक क्षण के लिए वे फिर ग्वाले कान्हा हो गए थे। वन की छवि देखते ही बनती थी। आज पूर्णिमा का चंद्र खिला हुआ था। वे अभी तक पांडवो के पड़ाव पर नही पहुच पाए थे। भोर होने तक पहुच जायेंगे। इस एकाकी यात्रा में कृष्ण जैसे राधे को साथ साथ महसूस कर रहे थे। ऐसा अक्सर होता है। रानीवास, महल, दरबार, सभी कार्य निपटाते निपटाते कृष्ण जैसे स्वयं को भी भूल जाते है, परन्तु जैसे ही अकेले पड़ते है, राधे साक्षात् मूर्ती बन सामने आ खड़ी होती है, स्मृतियों के रूप में। और तब बिना किसी से कुछ कहे वे जी भर जी लेते है उस सामीप्य को। राधे उनकी अन्तरंग सखी है। उसकी छवि उनके मानस पर इतनी स्पष्ट अंकित है की उन्हें उसका चेहरा देखने की आवश्यकता नही पड़ती।
मौन धारण किए हुए वृक्षो की स्वर्णिम लताए, कृष्ण को मधुबन के झूलो की याद दिला रहा था। राधे खेल खेल में अक्सर उनके गले में बाहे पसारे झूल जाती। पर फिर एक दिन न जाने राधे को क्या हुआ। अल्हड लड़को जैसी राधे के भाल पर स्वेद की बुँदे स्पष्ट देखि उन्होंने। उस दिन राधे पूरी पूर्णिमा का चंद्र लग रही थी। कृष्ण अपलक ही राधे को निहारते रह गए थे। राधे प्रतिदिन खेलती, कार्य निपटाती, पर उस दिन, न जाने क्या हुआ, वह लज्जित अनुभव कर रही थी। नयन झुकाए सरपट दौड़ गई माता के भवन में। अगली साँझ तक भी पलंग से उतरी नही, तो माता को चिंता हुयी। क्या हुआ? काहे मुह लिपटाए पड़ी है?
फिर राधे को एहसास हुआ था की वह राधा है, और वह कृष्ण उसका कांह, जिसे निर्निमेष नेत्रों से वह देखती है, वह उसके मनका अन्तरंग साथी है। राधे का कभी साहस नही हुआ ये सब कृष्ण से कहने का, परन्तु कृष्ण अब जाकर समझते है ये सब। वन का नीरव सन्नाटा कृष्ण की स्मृतियों को जैसे अग्नि की दाहक प्रदान कर रहा था और नील गगन का चंद्र उन्हें उतनी ही शीतलता, चाँद में अपनी प्रेमिका जो दिखती है उन्हें।
स्मृतियों को ह्रदय से लिपटाये कृष्ण एक शिला पर टिक कर बैठ गए।
उनका कल आज भी उन्हें रह रह कर बुलाता है। आज भी कांह निर्निमेष राधा को देखता है। आज भी राधे चुप रहती है। राधे पूछना चाहती थी ऐसे क्यो देखते हो? क्या कांह उत्तर देते इस प्रश्न का? कौन जाने। वह कल था जो बीत गया, आने वाला कल कैसा होगा, कोई नही जानता !
कृष्ण अतीत की सीढियों से उतर कर वर्तमान के प्रांगन में आ कर खड़े हो गए।
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