Monday, January 12, 2009

बड़ी सावधानी से अर्जुन ने गुफा का द्वार तीरों से ढकदिया। रात्रि होने को है। इस बियाबान जंगल में पशुओ व् निशाचरों का खतरा सर्वाधिक मंडराता है। स्वयं अर्जुन व् भ्राता योद्धा है तो ठीक है परन्तु द्रौपदी नाजो से महलों में पली बढ़ी है। राजकुमारी व् क्षत्राणी होने के नाते शस्त्रविद्या में निपुण है परन्तु राजमहलों के सुख भोगने वाली राजपुत्री कंटक भरे मार्ग कितना चल पायेगी?

वे जीत कर लाये थे कृष्णा को स्वयम्वर से। पहली नज़र में वे राजकुमारी पर मुग्ध हो गए थे। मत्स्यपरीक्षा में अद्वितीय तीरंदाज़ के रूप में काफ़ी यश प्राप्त किया था। घर जब राजकुमारी को लेकर आए तो माँ ने कहा मिल कर बाट लो। बहार आई तो हतप्रभ रह गई । उसने जाने अनजाने एक स्त्री को बाटने की आज्ञा दी थी।

कृष्णा ने फिर रो रो कर अर्जुन से लाख सवाल किए थे। हे आर्य आप मुझे स्वयम्वर में जीत कर लाये तो मै आपके भाइयो की पत्नी कैसे बन सकती हु? हे आर्य जब मै प्रेम आप से करती हु, मेरे मन दर्पण मे केवल आपका ही चित्र बसता है तो मै आपके भाइयो को किस प्रकार स्वीकार करू? द्रौपदी यह कभी नही जान पाई की जब मनुष्य केवल एक से प्रेम करता है तो उसे किसी दूसरे से सम्बन्ध रखने के लिए कोई कैसे प्रताडित कर सकता है? कदाचित नर एक व् अनेक मै फर्क नही जानता होगा? माता के अनुशासन को लांघने की उद्दंडता वह नही कर सकती थी । एक आर्या होने का उसने प्रत्येक धर्म निभाया। आज जान पाई की धर्म का कमंडल व् धर्म की शिला स्वयं के हाथ मै धरनी पड़ती है अन्यथा धर्म शब्द का केवल इस्तेमाल होता है।

अर्जुन स्वयं नही जान पाए की माँ ने द्रौपदी को पांचो भाइयो मै बाटने के लिए क्यो कहा? उसकी माता कोई ग्रामीण निरक्षर नारी तो थी नहीफिर माँ ने ऐसा क्यो किया? निरपराध अर्जुन के प्रेम को बाटने के लिए कह दिया? अर्जुन घुट कर रह गए पंख फडफडाते कबूतर के समान। माँ का कथन, बड़े भाइयो की सर्वसम्मिति व् उनका अपना धर्मयुद्ध, भाई को सम्राट बने देखने की तीव्र इच्छा, सब जैसे अर्जुन को प्रेम पर भारी पड़े। एक आर्य होने के नाते उन्होंने धर्म निभाना श्रेयस्कर समझा नाकि अपनी इच्छाओ के सामने घुटने टेकना।

द्रौपदी ने बखूबी अपनी कमान संभाल ली। अपने मन को मार कर। युधिष्ठिर चाहते तो हस्तक्षेप कर सकते थे, पर नही किया। उसे अपनी पत्नी स्वीका कर लिया? अर्जुन जानते है कृष्णा के मन मै वितृष्णा है। एक ऐसा बवाल है जो अभी तक उभर कर नही आया है। वे जानते है हर क्षण कृष्णा केवल अर्जुन का विचार करती है। क्या कोई जान सकता है उस मलाल को जब एक स्त्री हृदय किसी और को देती है और उसे जबरन तन किसी और को देना पड़े और वह भी माता पिता के बलपूर्वक अनुरोध पर? कृष्णा कदाचित इस मर्यादा का उल्लंघन करती भी परन्तु स्वयं अर्जुन चुप थे, यह देख कर रुक गई, जब उसका प्रेमी ही उसके लिए लालायित नही है तो वह अकेली लडेगी भी तो किससे? अर्जुन के प्रति उसके ह्रदय मै मान व् प्रेम हेतु उसने निसार दिया अपना सर्वस्व।

कुंती ने क्यो कहा होगा की द्रौपदी को बाट लो? ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर ने अभी तक विवाह नही किया था। उसका स्वभाव ऐसा नही था की नारियों को मुग्ध कर सके। इसके विपरीत अर्जुन को स्त्रियों की कमी नही थी। कृष्ण की तरह वहभी राजकुमारियों मै आकर्षण का केन्द्र रहता था। यदि अर्जुन प्रेम सम्बन्ध मै लीं हो जाता, वह भी अज्ञातवास के दौरान, कुंती को डर था, कही अर्जुन अपने ध्येय से च्युत न हो जाए। वह देख चुकी है अपने पति की मृत्यु जिसे काल ने ग्रस लिया था केवल इस मद मादक प्रेम के नशे ने। वह नही चाहती थी जिस प्रकार उसका पति अकाल मृत्यु का ग्रास बना, हस्तिनापुर के राज्य को जीतने की इच्छा भी इस अकाल मोह-बंधन का ग्रास बन जाए। और फिर द्रौपदी एक बहाना ही हो जायेगी इन भाइयो के सदैव साथ रहने का। कल को अलग अलग नारी आयेगी, कही भाई अलग थलग न पड़ जाए। कुंती ने कब से यह मुठ्ठी बांच कर रखी है। वह अडिग थी अपने पति का हक हासिल करने के लिए। वह किसी भी कीमत पर अपने पुत्रो को खो नही सकती थी। उसका विचार मात्र उसे थर्रा देता था।

अर्जुन ने कीमत दी थी अपनी माँ के दूध की। कोई आश्चर्य नही था कई बार वे अनमने से इस संसार के परे की बातें सोचते थे। वे तो कई बार ये भी सोचते है की युध्ध की क्या आवश्यकता है? परन्तु कृष्ण के सामने बेबस है।

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