भीरुता व् उदारता में क्या अन्तर है? विपक्षी को स्वयं पर हावी होने देने को ही कहते है भीरुता। विपक्ष कुछ भी हो सकता है। वहमानसिक शत्रु भी हो सकता है या कोई भी निर्बलता । उदारता का मुखौटा लगा कर लोग भीरु होने की अपनी कमी को किस प्रकार छिपा लेते है। युधिष्टिर उदार है अथवा भीरु? यह कौन सा कवच है जिसका नाम सत्य है परन्तु जिसके तरकस से विध्वंस के तीर निकलते है, युधिष्ठिर फिर भी चुप रहते है, सज्जन बन कर, यह कौन सा कवच है जो केवल उनके व्यक्तित्व का रक्षण करता है, समाज की दुश्प्रुवृत्यो को पनपने का मौका फिर भी मिलता ही रहता है, यह कौन सा मुखौटा है जिसके पीछे एक भीरु भयभीत सम्राट छिपा रहता है, क्या वह सचमुच सम्राट बनने के काबिल है? द्रौपदी के खुले केश अवश्य ही युधिष्टिर को ताना देते होंगे। कौन सी नीति ने पञ्च पांडवो को स्त्री का अपमान सहने की सीख दी? और अब क्रोध कर के भी क्या, द्रौपदी की भीतर की ज्वाला किस प्रकार शांत होगी?
नीतियों का क्या, अपने अपने फायदे के लिए जिसने तिसने तोड़ मरोड़ कर बना दिए और खड़ा कर दिया एक उन्नत समाज का ढांचा। उन्नत अर्थात जो जितनी चालाकी से धन जोड़ सकता है, जो बिना श्रम किए ही अपने लिए महल खड़ा कर सकता है, जो सभी प्रकार के उपभोगों का रस ले सकता है, चाहे उसके लिए उसे कितना ही मक्कार होना पड़े, मानव सभ्यता की उन्नत सभ्यता जुआ शराब व् व्यभिचार से पहचानी जा सकती है। जितना तमस उतना उन्नत।
उन्नति का एक रूप कृष्ण अपनी द्वारिका में भी देख रहे है। कृष्ण की बनाई नीतियों के फलस्वरूप धन ही धन हो गया है परन्तु नागरिक उतने ही लापरवाह व् आलसी होते जा रहे है।
द्रौपदी का वस्त्र हरण व् पांडवो का अग्यात्वास आख़िर कृष्ण के लिए क्यो विशेष है, ऐसा क्या है जो वे द्वारिका, छोड़ कर पांडवो की सहायता में लगे है? द्वारिका दिन पर दिन क्षीण होती जा रही है। रसना व् इन्द्रिय सुख व्यापारिक वर्ग को खोखला करने में लगे है। सभी व्यापारी है वहा, समुद्र के बीच में होने के कारन कृषि व्यवसाय पनप नही पाया है जिसके कृष्ण निर्भर है समुद्र तटीय इलाको से दूर मैदानी भागो पर और वह है दुर्योधन का साम्राज्य। अब यदि कृष्ण इस मसले में नही पड़ते है, तो उनकी अपनी प्रजा भूकी मरती है। द्वारिका खड़ी है केवल समुद्री, तटीय, व् क्षार व्यवसाय पर। गेहू, चावल, व् अन्य अन्न उपज के लिए आवश्यक है पड़ोसी क्षेत्रीय सम्बन्ध और ये सभी क्षेत्र दुष्ट शकुनी के हाथो में है। दुर्योधन केवल एक कठपुतली है। ऐसे में यदि पांडवो की जीत हो जाती है तो वे द्वारिका के लिए एक सुरक्षित भविष्य का निर्माण कर सकते है।
उनकी अनउपस्थिति द्वारिका में राजनैतिक खलबली का कारण बनी हुई है। परन्तु कृष्ण जानते है, यदि इस परिस्थिति से वे किनारा भी करते है तो भी वे इस महायुद्ध के परिणामो से नही बच सकते है। दुर्योधन का वर्चस्व द्वारिका को फलने फूलने नही देगा, व् महायुद्ध द्वारिका के लिए कृष्ण की लम्बी अवधि के लिए अनुपस्थ्ती का कारन बनेगा। द्वारिका हर हाल पर दाव पर लगी है। पांडवो की जीत ही जम्बुद्वीप के लिए श्रेयस्कर है।
कृष्ण न केवल द्रौपदी को वस्त्र प्रदान करने जा रहे है वरन जम्बुद्वीप के लिए एक श्रेयस्कर नींव का निर्माण करने जा रहे है।
क्रमश:
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