अग्यात्वास की भूमिका पांडवो के लिए महत्वपूर्ण है। कृष्ण ने अत्यधिक सूझबूझ से यह युक्ति निकलवाई। दुष्ट व् स्वार्थी को मूर्ख बनाना आसन होता है। वह देखता है केवल अपना लाभ। संकुचित व् सीमित दृष्टि उसे और कुछ देखने नही देती है। शकुनी अपनी जय पर फूला नही समां रहा था। उसे तो बस पांडवो का परिवार आँखों का कंकर लगता था। जितनी जल्दी छुटकारा मिले उतना ही अच्छा। राजगद्दी का मोह उसे इतना भी नही दिखा पाया की अग्यात्वास जो पांडवो ने माँगा है, वह युद्ध की तयारी हेतु माँगा है। मूर्ख। कृष्ण अपनी मुस्कान रोक नही पाए। संकुचित दृष्टि, सीमित मति, स्वार्थ, कैसे न कैसे स्वयं के लिए अनिष्ट का कारन व् मार्ग खोज ही लाता है। कृष्ण को कुछ करना ही नही पड़ा। सब जैसे अपने आप हो गया। राजा पांडू के वंश से चलती हुई यह शत्रुता अब अपने वास्तविक रूप में आने वाली है।
अग्यात्वास देगा अर्जुन को अधूरी शिक्षा को पूरा करने का अवसर, युधिष्टिर, नकुल व् सहदेव को अपनी राजनैतिक गणनाओ को फिर से गिनने का अवसर, व् द्रौपदी को थोड़ा अवकाश उस कलुषित वातावरण से। कदाचित निसर्ग की सुन्दरता में, अपने जीवन की कुरूप घटनाओ को भूल जाए। उन्हें केवल भीम की चिंता नही है। मस्त मलंग है। स्वयं में। द्रौपदी के लिए मौज मस्ती का सहारा केवल भीम ही होता है। वह कमल मांगेगी, तो कही भी जल सोरोवर से लाकर देगा, वह कहेगी, जंगल में विहार करना है, तो मार्ग से कंटक साफ़ कर देगा। फिर भी द्रौपदी प्रेम करती है अर्जुन से, उसका पहला प्रेम। अर्जुन सर्वाधिक संवेदनशील है। उसे केवल पत्नी, प्रेमिका, राजपाट तक ही नही अपितु और भी सृष्टि सम्बन्धी प्रश्न परेशां करते है, तभी तो अच्छी मित्रता निभ जाती है कृष्ण के साथ। युधिष्टिर बड़े है, सत्यवादी है, परन्तु दुनियादारी में कच्चे है। भीम कई बार दंत चबाते हुए कहते है, बड़े भइया यदि agya दे तो दुर्योधन के यही टुकड़े कर दू। परन्तु युधिष्टिर के लिए धर्म ही सब कुछ है। कृष्ण चिंतित इस बात से होते है की युधिष्ठिर के सत्य असत्य की परिभाषाये तर्कसंगत व् वास्तविक जगत के अनुकूल नही होती है। जो उन्हें ठीक लगता है, वे करते है। सुकुमार कोमल कृष्ण भी है, परन्तु जहा सुदर्शन चक्र का काम पड़ा वे नही चुकते उससे प्रहार करने में। आख़िर शास्त्र रिपु के अनुसार होना चाहिए। शकुनी जैसे दुष्ट स्वार्थी मनुष्य के सामने नैतिकता क्या व् अ नैतिकता क्या?
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