Tuesday, December 30, 2008

भावनाओ के ज्वार भाटे से जूझती हुई रुक्मिणी झरोखे में बैठी स्वामी की प्रतीक्षा कर रही है। प्रतीक्षा भी कैसा शब्द है? तितिक्षा जैसा लगता है। साँझ ढलने आई, कब से बिन बताये गए है, बिन बोले चले गए,किसी से संदेश भी नही भिजवाया, कहा हु, कब आऊंगा, कुछ भी नही?
यदि क्रोधित है तो कम से कम कुछ क्रोध तो प्रर्दशित कर जाते, परन्तु वह भी नही, स्वामी को समय ही नही है, अपनी राजनैतिक गतिविधियों से।
रुक्मिणी मन ही मन कृष्ण को याद कर परेशानहुए जा रही थी। वैसे कृष्ण जब राजप्रसाद में ही रहते है, तो रुक्मिणी इधर उधर के कामो में उलझी रहती है, तब नही ध्यान रहता कृष्ण महल की अटारी पर खड़े है, अथवा कही और उलझे है। बस है। उतना ही काफ़ी है। अब नही है तो इतनी बेचैनी।
रुक्मिणी को आज भी याद है जब पहली ही बार उसने कृष्ण को देखा तो बस देखती ही रह गई थी। उसके अंतर्मन ने तभी उसे कह दिया था की यही पुरूष उसके तन-मन का स्वामी है, अन्यथा वह कही और सलंग्न ही नही होगी। कृष्ण उसके प्रेम की पाती पाते ही उसे सब से लड़ कर ले गए थे। भीषण संग्राम के पश्चात रुक्मिणी कृष्ण की भार्या हो पायी थी। परन्तु आज सोचती है, के भार्या होना ही काफ़ी नही है। वे तो फिर भी लगे रहते है अपने काम काज में और वह दिवस भर के औपचारिकताओ को पूरा कर के भी खड़ी रहती है पति की प्रतीक्षा में, अंतर्मन ने हंस कर कहा प्रतीक्षा नही तितिक्षा में। वैसे भी पुरुषों के लिए यह सब उपहास का विषय रहता है। तुम नारियो को काम नही रहते, भावनाओ में डूबे रहने के सिवा। पुरूष है तो बहुत तीर मार रखे है। ज़माने भर के जिम्मेदारिया, सम्मान, अपमान इत्यादि इत्यादि, इससे से तो हमारी प्रेम भरी तितिक्षा ही भली।
स्वामी कही भी जाओ, कितने भी दिन के लिए जाओ, कम से कम मिल कर तो जाओ? नयन मिला कर चुरा कर मत जाओ, हा हा समस्त जम्बुद्वीप का ज़िम्मा उठाये फिरते हो, परन्तु जिससे नैना मिला कर हृदय चुराने का जोखम उठाते हो, एक संदेश नही भिजवा सकते के विदा दो, फिर मिलेंगे? वह भी रुक्मिणी ही करेगी? फिर ताना सुनो के गले ही पड़े रहती हो। पल भर के लिए भी नही छोड़ती। अरे झूट क्यो बोलते हो? झूट बोलना तो कृष्ण की पुरानी आदत है। और अपने किए वादों से फिरना तो उससे भी पुरानी। कपटी, झूठे, मन मोहना, मायावी, झूठे आंसू दिखा दिखा कर सच मुच ही रुला देते है। जाने क्या मज़ा आता है इन्हे ये सब करने में।
बेचारी रुक्मिणी नारी स्वाभाव से परेशान झरोखे में बैठी न जाने क्या क्या सोचे जा रही थी।
जब से मिली है, विरह कुछ कम तो नही सहा है। परन्तु इसकी कोई सीमा भी तो हो? सब सिरदर्दी रुक्मिणी की है, कृष्ण को तो बस स्वतंत्र फिरने से मतलब है। एक प्रश्न इन पुरुषों को पूछ लो, बस गले की हड्डी लगने लगती है।
द्वारिका का भीतर का माहौल कुछ ठीक नही था। अभी अभी तो कृष्ण ने नींव डाली है द्वारिका की, और अभी से कृष्ण के विरोधी पनपने लगे है। पीठ पीछे चाकू भोकने वाले। वे सोचते है, के बलराम में उतनी शक्ति नही है राज काज सँभालने के, उत्तराधिकारी को लेकर अपार राजनैतिक मंत्रनाये चलती ही रहती है, कृष्ण के विरोधी सामंत वर्ग के ही नही अपितु कुछ वे मंत्री गन भी है जो ऊपर से स्वयं को सज्जन दर्शाते है, और भीतर से द्वारिका की जड़ो को खाने का भी काम कर रहे है। कृष्ण की अपनी ही शैली में जीने की आदत से इस विशिष्ठ वर्ग को सदैव ही आपत्ति रही है। इस तरफ़ ध्यान देना आवश्यक है।
परन्तु अभी कृष्ण का ध्यान है केवल हस्तिनापुर व् इन्द्रप्रस्थ पर।
रुक्मिणी के मुख पर चिंता के बादल साफ़ झलक रहे थे।
स्वामी मिलिए शीघ्र कुछ समाचार है राज काज को लेकर।
रुक्मिणी मन ही मन कृष्ण से मिलने की प्रार्थना कर रही थी।

Wednesday, December 17, 2008

साधना

साधना के प्रकार होते है। साधना साधक भी स्वयं ही खोजती है। उसे तो बस होने से मतलब है। माद्यम कोई भी हो सकता है। अंतर्मन तितिक्षा से स्वयं ही गुजरने लगता है। उसके लिए किसी कारण विशेष की आवश्यकता नही है। और न ही आवश्यकता है उस साधना को किसी व्यक्ति विशेष की अनुमति अथवा विरोध की। साधना अनंत गहन मौन है। वह चलती जाती है जैसे कोई घुप अँधेरी सुरंग कभी न समाप्त होने वाली राह को चुन लेती है। यह अत्यन्त विषम अत्यन्त सरल है। अंतर्मन जलता जाता है चुपचाप। वह कौन सी चुम्बकीय शक्ति है जो यह सब होने के लिए प्रेरणा बनती है?

कृष्ण स्वयं ही साधक है, स्वयं ही एक साधना है।

पांडवो का वनवास सामाजित व् राजनीतिक दृष्टि से सरासर अन्याय है। अनोखी बात है की उनके पक्ष में अभी तक किसी भी राज्य ने कौरवो के विरुद्ध आवाज़ नही उठाई है। सभी ने यही सोचा होगा की किसी के घर का मामला है। क्या करेंगे बीच में पड़ कर। कोई यह क्यो नही सोचता की यदि एक घर को यह करने की स्वतंत्रता मिल सकती है तो हर घर में भाई भाई दुश्मन बन जायेंगे। न्याय का समाज से नामो निशाँ मिट जाएगा।

द्रुपद पुत्री कृष्णा के साथ नियति क्या खेल खेल रही है कोई नही jaanta.

कृष्ण किस समय-रुपी रथ के सारथि बनने जा रहे है कोई नही जानता।

कृष्ण केवल इतना जानते है की अराजकता जब सीमा पार करने लगे तो सुदर्शन पर हाथ बरबस ही उठ जाता है। क्या ग़लत है?

परन्तु इस समय उन्होंने धैर्य से काम लेना ही श्रेयस्कर समझा।

यदि महाराज युधिष्ठिर किसी और नीति का अनुसरण करते तो आज द्रौपदी वन वन न भटक रही होती?

यह समाज नारी को देवी का स्थान देने की बाते करता है। परन्तु पल भर में अपनी ही नीतियों व् मान्यताओ को जड़ो से काट फेंकता है। समाज कहता कुछ है, करता कुछ है। समाज के बड़े बड़े ठेकेदार जो पलते है इसी समाज के क्षीण वर्ग का रक्त पी पी कर, जिन्होंने अपना स्थान बना रखा hai, विभिन्न प्रकार की कहानियो का गठन कर के अथवा झूट की बुनियाद पर दिखावे की म्यान रख कर, कौन से मुह से नारियो को देवी का स्थान प्रदान करने की बातें करता है?

नारी देवी होती है। कोई द्विपक्ष नही। तभी तो माता का गौरव पाती है। तभी तो कष्ट में भी तपती रहती है। तभी तो पति के संग अग्निसमर्पित होने की प्रथा को भी वह निबाह गई। कितने पुरूष है जो नारी के मृत शरीर के संग समर्पित व् समाप्त हो गए?

कृष्ण राह भर सोचते जा रहे थे। राजा युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता है। क्या युधिष्ठिर को इस सन्दर्भ में अपनी सोच बदलने की आवश्यकता नही है? वे राजा है। दर्प, हठधर्मिता, भीरुता किसी भी हाल में एक शक्तिशाली सामराज्य स्थापित नही कर सकता। उन्हें यदि सत्य की इतनी ही चिंता है तो इस सत्य को समाज के ढांचे पर , उस के असली आयाम निर्धारित करने पड़ेंगे। नही तो यदि हर राज्य की द्रौपदी वस्त्रहीन हो निष्कासित होती जायेगी। नारी की ध्वस्त स्थिति किस प्रकार के सत्य का प्रतिपादन कर रही है? यही के नारी एक वस्तु है? जब चाहे जुए में जीत लिया जाए, जब चाहे जुए में हारा जाए?

कौन सा सम्राट ऐसा कर सकता है? ये सम्राट नही हो सकता। ऐसा मनुष्य केवल आसक्तियों व् तृष्णा का अधीन दास हो सकता है। फिर कैसे जीतेंगे वे अपनी लड़ाई adharm के ख़िलाफ़?

कृष्ण को उत्तर की प्रतीक्षा करनी होगी यह वनवास पूरा होने तक।