Sunday, November 30, 2008

"सारथी, रथ जल्दी आगे बढाओ! संध्या के काले बादल घने होते चले है" कृष्ण अकेले ही द्वारिका से बिना किसी को सूचित किए चले है।

रुक्मिणी परेशान हो गई है। न जाने कब क्या घटना घटित हो जाती है, और चल पड़ते स्वामी प्रस्थान पर। अब तो आदत भी हो गई है। जब से विवाह हुआ है, कभी दो दिन का बसेरा श्रीकृष्ण ने द्वारिका में शांतिपूर्वक नही किया है, कभी कोई सभा, तो कभी कोई यात्रा, कोई कभी आखेट, तो कभी राज्य का दौरा। और कुछ नही तो भइया बलराम की मयकी आदत से झुंझलाते श्री कृष्ण। वैसे कम ही झुंझलाते है वे पर बलराम को देखते है तो चिंतित हो जाते है श्रीकृष्ण!

द्वारिका में एक भी व्यक्तित्व ऐसा नही दिखाई पड़ता जो इस महत्वपूर्ण प द को संभालले। रुक्मिणी द्वारिका की महारानी है, और श्रीकृष्ण उस समराज्य के करता धरता। कभी कभी सोचती है कही जानबूझ कर तो कृष्ण राज्य से बाहर नही रहते है वे? रुक्मिणी पतिव्रता है। कृष्ण ने सत्यभामा, रोहिणी को भी भार्या बनाया है। अपने समाधान के लिए रुक्मिणी बस इतना ही सोच पाती है की ये विवाह महत्वपूर्ण थे राजनैतिक दृष्टि से। सत्यभामा से कृष्ण ने पाई एक बड़ी महानायकों की टोली, व् रोहिणी से पाई एक स्यमन्तक मणि। अत्यन्त मनोहर, अति दुर्लभ।

इतने में जानने लगी है वह अपने स्वामी को। जब से पदभार संभाला उन्होंने एक भी मौका नही जाने दिया। रात दिन किस तरह पिता वासुदेव की नगरी को सौंदर्य व् समृद्धि के चरम शीर्ष पर पहुचाया जाए। रुक्मिणी झरोखे में बैठ इंतज़ार करने लगी पति के संदेश का।

कृष्ण नही चाहते थे, उनके निकलने का अंदेशा भी हो किसी का। रूप बदल कर निकले है वे। एक ब्रह्मण के वेश में खूब जंच रहे है वे।

द्रौपदी को रसद, वस्त्र, व् पांडवो को शस्त्र पहुचाने का काम स्वयं ही करना श्रेयस्कर समझा कृष्ण ने। बारह वर्ष की अवधि चुपचाप निकालनी है, यदि इससे पहले पहचाने गए तो हस्तिनापुर का एक पत्थर भी नही मिलेगा कहलवाया है राजकुमार दुर्योधन ने। धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने सर झुका कर मान लिया है, वे निकल पड़े अपने अनुजो व् भार्या समेत।

वे होते तो हस्तिनापुर का लेखा जोखा ही कुछ और होता। वे उलझाते जा रहे है इन सबमे।

रुक्मिणी अक्सर पूछ बैठती है स्वामी आप युद्ध किस तरह से रोक पाएंगे? क्यो चिंतित होते है? उत्तर में एक मुस्कान दे कर कृष्ण चुप हो जाते है। वे अच्छी तरह से जानते है नही ताल पाएंगे इस युद्ध को। प्रकृति के नियम सख्त है। वह जैसे को तैसा कर के देती है।

........क्रमशः

Saturday, November 29, 2008

हाहाकार !

मानवता के परखच्चे उड़ना कोई नवीन घटना तो नही है। वर्षो से, सदियों से, कई जन्मो से यही होता आया है। बनाने वाले ने न जाने क्या सोच कर यह धरती बना दी, उसे प्रकृति से सजा दिया, न जाने विकृति कहा से आ गई?
क्यो आ गई?
कोई अपना ही घर क्यो फूंकता है? कोई अपने ही देश में आग क्यो लगाता है? फिर अत्यन्त सावधानी से मुखौटो का प्रयोग कर अपनी दानवी हिंसात्मक विकृतियों को कैसे छिपा लेता है? घर के घर में पता नही लगता के यह व्यक्ति मेरे प्राणों का प्यासा है। मनोविकारों की जड़े कितनी गहरी है, अंधकूप की भांति पाताल लोक से निकलती हुई, पृथ्वी की सतह को लहुलुहान करने का षड़यंत्र रचती रहती है यह विकृति!
इतने वृक्ष है गहन जंगलो में, सभी पंछी एक एक neer banakar रह सकते है, इतने फल दिए है देने वाले ने, सभी एक एक फल खा कर क्षुधा मिटा सकते है। इतनी धरती दी है, इतना पानी दिया है, और दिया है दूर दूर तक फैला हुआ यह विस्तृत आसमान यह बताने के लिए की हे मनुष्य हृदय को फैला लो इस आसमान की तरह जिसके साए में पूरा जगत आ जाता है।
परन्तु हाय रे मानव सभ्यता! पशुता के चंगुल से आज तक swatantra नही कर पाई स्वयं को।
निम्न से निम्नतम स्तर पर उतर कर वहशी खेल खेलती है।
शकुनी आराम से हस्तिनापुर के राजप्रासादों में पैर फैला कर baitha हुआ है। उसकी हर चाल टेढी है। मुस्कान वक्र है। वह जानता है, समय के बहाव को किस वक्रता से मोड़ लिया जाता है। वह घर बैठे बैठे इस जम्बुद्वीप के परखच्चे उडाना जानता है। वैसे भी जिस देश का राजा दृष्टिहीन हो vahaa की प्रजा भी दृष्टिहीन देर सवेर हो ही जाती है। दृष्टि से अंधे, कानो से बहरे, जीह्वा से गूंगे, हाथ पैरो से लाचार, यदि कोई लाचार नही हो तो धन का लालच दे कर अपने जैसे बना दो, जो धन से न माने, उसे इस दुनिया से उठा दो, यही तो है राजनीति!
शकुनी अट्टहास कर के हंस रहा है। याद है किस तरह उसने पाँच पांडव व् उनकी माता को ज्वलनशील राजप्रासाद में घेर कर मार डालने का षड़यंत्र किया था? उनकी किस्मत जो वे बच गए, अब नही बचेंगे।
जब भेदी घर में बैठा हो तो शत्रु को देश की सुरक्षा दीवार पार करना मुश्किल नही पड़ता। शकुनी का विस्तार गली गली में है। बरसों से उसने अपनी जड़े जमाने के लिए अपराधी वर्ग के युवको की भीड़ जमा की है। शकुनी की वक्र चाले राजनीति तक ही सीमित नही है। वे सम्मिलित है जन मानस के घरो में, जो जब समय आता है, मोहरों की तरह काम आ जाते है, अन्यथा आसान है अपने ही घर में आग लगाना?
जन मानस जो भूखा है सदियों से, जिसके बच्चो को शिक्षा की छांव तो दूर दो समय का दूध भी नसीब नही होता, जिसने देखा है अपनी ही aatma को मरते हुए, जिनके लिए एक समय का अन्न ही काफ़ी है, भोजन प्राप्ति व जल ही काफ़ी है मानव अस्तित्व के लिए, यह वर्ग, जो राजधिकारियो की नज़रो से ओझल रहा है। प्रशासन सदियों से ऐयाश है। जनता के मालिक बनने के बाद उसे और चुसो, उनकी रग रग से रक्त की एक एक कोशिका खीच लो, फिर वे नही रह जाते किसी के। अपने देश के भी नही। वे देशभक्ति क्या जानेंगे जो केवल जलते है इस रोष से की हमें किसी ने अनाज का एक दाना नसीब नही होने दिया, या जो जलते है इस आग में, की में काबिल था फिर भी मेरे हिस्से का आसमान मुझे नही मिला?
ये वर्ग पड़ जाता है शकुनियों की हाथ में, और शकुनी खेलता है रक्त की होली। कितने वीर पुरुषों की समाधि बन जाती है, इस रंग्लीला को अंजाम देते देते। कितने अभिमन्यु गिर पड़ते है ज़मीन पर, शकुनियों के संबंधियों से लड़ते लड़ते।
प्रशासन इतना apang क्यो होता है?
शकुनी को इतनी जगह मिल ही कैसे जाती है के वह गुरु कृपाचार्य, गुरु द्रोणाचार्य, सबल राजकुमार सुयोधन जैसे व्यक्तित्व को विकारों से भर सके?
वह इसलिए की हम सभी में एक शकुनी छिपा है। हम सभी सोचते है, की यह सम्पूर्ण साम्राज्य केवल मेरा है। एक सुई की नोक के बराबर भी हिस्सा किसी को नही दिया जाएगा। समस्त मेरा। लार टपकाता हुआ कुत्ता व् मरी हुई लाशो पर गोल गोल चक्कर काटते हुए गिध्ध, यही है शकुनी का साम्राज्य, यही है शकुनी का विस्तार। हम देते है शकुनी को पनपने की जगह। हम देते है उसे इजाज़त अपनी सभ्यता, अपनी विरासत, अपने मौलिक स्तंभों की धज्जिया उडाने की।
जन जन मिल कर बनाता है देश। फिर मुठ्ठी भर सत्तालोलुप राजनैतिक अधिकारी, अथवा अपराधी वर्ग के हाथो में क्या करता रहता है राजसिंहासन।
इधर कृषको के खेत जल गए है। ये वर्ष पानी नही बरसा है। जंगलो में आग लग कर saangwaan की लकड़ी का कोई व्यापार नही हो पाया है। धनिक वर्ग, गरीब वर्ग सभी एक ही तराजू में झूल रहे है, शकुनी के लिए इस से अच्छा समय क्या हो सकता है, जन मानस को बहका कर अपने हक में कर लेना कौन सी बड़ी बात है?
मस्तिष्क पर मकडियों के jaale पड़े है। हे जन मानस यदि रोकना चाहते हो इस विनाश की लीला को, तो आँखे खोलो।
धन की चकाचौंध से ऊपर उठ कर केवल अपने हल की आवाज़ तो सुनो, मुठ्ठी भर ज़मीन के लिए आवाज़ तो उठाओ, मिल कर कदम उठाओ, फिर देखो कौन सा शकुनी टिक पायेगा?
लेकिन नही, अभी तो भारतवर्ष के सीने पर महाभारत का युध्ध बाकि था। सूत्रधार की पुकार नही पहुच पायेगी उस समय की शिलाओ तक।
अभी अज्ञान का अँधेरा गहन है।
यह रक्तपात कैसे रुकेगा?
स्वयं श्रीकृष्ण नही रोक पा रहे!

Friday, November 28, 2008

इर्ष्या ! पड़ोसी देश को पड़ोसी देश से! उसकी उन्नति से इर्ष्या! उसकी सफलता से इर्ष्या! कैसे इस भव्य खड़ी इमारत को ढहा दू, बस इतना ही संघर्ष!
यही हो रहा था हस्तिनापुर में भी! इन्द्रप्रस्थ की भव्यता से इर्ष्या। उसके वैभव से इर्ष्या! पाँच राजकुमारों के स्नेहमय परिवार से इर्ष्या! अनुपम सुंदरी स्त्री पांचाली कृष्णा से इर्ष्या।
शकुनी ने अपनी टेढी चाल हस्तिनापुर के सीने पर चल दी थी। अपनी बहन गांधारी के सुहाग का वंश उजाड़ने की कसम जो खायी थी उसने।
इर्ष्या मति को ऐसे कैसे भ्रष्ट कर देती है?
युधिष्ठिर के मस्तक पर शकुनी ने वह दाग दिया है की उसकी लोकप्रियता अब सदैव चंद्रमा की तरह कलंकित रहेगी। स्वयं पत्नी द्रौपदी उसका मान नही रख पायेगी। एक चाल, और सम्पूर्ण इन्द्रप्रस्थ मुठ्ठी में। शकुनी से जुआ? अपनी कुटील मुस्कान चेहरे पर रख शकुनी अपनी सफलता से फूला नही समां रहा था। सब सही हो रहा था। पांचाली मुठ्ठी में आ चुकी थी। हस्तिनापुर की मिटटी सदैव के लिए पलित हो जाती यदि वह.... वह... शकुनी के चेहरे की वक्रता बढ़ने लगी, वह कृष्णअपनी चाल न चल जाता। अपने श्रेष्ठ अधिकारी नियुक्त कर रखे थे उसने। महाराज ध्रितराष्ट्र के कान भरने में शकुनी ने कोई कसर नही रखी परन्तु इस जम्बुद्वीप पर कृष्ण के खिलाफ कोई चाल चलना शकुनी को भी भारी पड़ता है। क्या है इस कृष्ण में? कहते है योग्पुरुष है। योग! मूर्खो की मति का भ्रम! अथवा स्वप्न दृष्टाओं का इन्द्रधनुषी ताना बाना। इतनी ही शक्ति है कृष्ण के योग में तो बचा क्यो नही लेता हस्तिनापुर को अपनी शक्ति से? इतनी ही योग शक्ति है कृष्ण में तो पाँच पांडव क्यो भटकते रहते है। हर बार शकुनी के हाथ जीत लगी है, और अब तो शकुनी की जीत अपनी चरम सीमा पर है। कुटिल शकुनी कृष्ण की काट सोचता ही जा रहा है। इन्द्रप्रस्थ के राजप्रासादों में वह कृष्ण को नीचा दिखा सकता था, पूरी तयारी हो चुकी थी परन्तु स्वयं कृष्ण ने झूठे बर्तन धोने का कर्म हाथो में लेकर स्वयं को ऐसा महापुरुष सिद्ध किया की शकुनी को भी कोई काट नही सूझी। और उसी मौके का फायदा कृष्ण ने उठा लिया, महाराज ध्रितराष्ट्र से राजनैतिक तौर पर स्वयम के प्रतिनिधि स्वयं महल में नियुक्त करा दिए। शकुनी जानता था ये अधिकारी कम गुप्तचर अधिक थे। कृष्ण को राजप्रासादों के क्षण क्षण की सुचना रहती थी।
दुर्योधन के मित्र व बहनोई जरासंध, दुशाला का पति मथुरा को अग्नि के सुपुर्द कर आया था, इस कृष्ण की उसने जान ही ले ली होती यदि यह ग्वाला उस रणभूमि से भाग न खड़ा होता। चोर। चोरी से दबे पाव अपनी जनता को संग ले कर दुष्ट द्वारिका में जा बसा। और अब देखते ही देखते सम्पूर्ण समुद्र, बेशकीमती समुद्री खजाने, वनस्पति, मत्स्य, मणि-मानिक इत्यादि इस अकेले कृष्ण के अधीन है। द्वारिका के aishwary की कहानिया सम्पूर्ण जम्बुद्वीप में बच्चे बच्चे के मुख पर है। और इन सबका महानायक है यह ग्रामीण, ग्वाला, कृष्ण। uh ! कैसे कैसे लोग राजनीति में है। ग्वाले, चोर!
इससे पहले की शकुनी कृष्ण की और अधिक तारीफे सोचता, महाराज ध्रितराष्ट्र का शकुनी के लिए बुलावा आ पंहुचा।

Sunday, November 23, 2008

चीत्कार

द्रौपदी सर झुकाए अपने कक्ष में मौन कही शून्य में टकटकी लगाये हुए थी। भारतवर्ष के महानतम शूरवीरों की भार्या एक वस्त्र में लिपटी खड़ी थी। उसके मान की धज्जिया स्वयं उसकी मर्यादा की पताका थामने वालो ने उडाई थी।

आज वह एक ऐसी लाश थी जो न मिटटी में दफ़न हो पाई और न ही सम्पूर्णतया चिता में जल पाई। मिटटी के इस खिलौने को कौन से आशय से संभाले? वह अब भी जीवित है, क्यो ? उसकी समझ से बाहर था। जी तो किया आग लगा दे इस हस्तिनापुर की जीवित अट्टालिकाओं को, इन निर्लज्ज झरोखों के पर्दों को नोच नोच कर तहस नहस कर दे, एक महारानी चीथडो में लिपटी अपनी मर्यादा की दुहाई दे रही थी और यह समस्त संसार अपनी शूरवीरता की कहानिया फिर भी कहने से थकता नही है।

केश खोल कर द्रौपदी लाल लाल नेत्रों से जैसे ठहाके लगाना चाहती थी। वाह रे पुरूष प्रधान समाज। लोहे की ढाले, तलवारे जंग खायी हुई है। पल भर में ये सभी पुरूष नपुंसक ही सिद्ध हो जाते है। कौन से मन से वह अपने पतियों को पतिपरमेश्वर का मान दे? समाज नारी से सौ सवाल कर बैठता है, की क्या वह बेहया है जो अपने पतियों का त्याग कर देगी? वह ये क्यो नही पूछता जो व्यक्ति एक स्त्री का पुरूष होने का कर्तव्य नही निबाह पाया वह एक साम्राज्य का निर्वाह कैसे करेगा?

प्रश्न केवल नारियों के लिए है? पुरूष हर प्रश्न पूछे जाने पर मुह बाये क्यो खड़ा हो जाता है? नारी का अस्तित्व एक शिशु तक ही सिमित क्यो है?

द्रौपदी आज लुटे हुए मोहरों की तरह चौसर के पानो पर बिखरी पड़ी हुई थी। अग्नि, मान मर्यादा, सिन्दूर सब जैसे उस पर हंस रहे थे।

हस्तिनापुर की पुत्रवधू, इन्द्रप्रस्थ की महारानी, राजा द्रुपद की पुत्री वह द्रुपद जो मान अभिमान का युद्ध द्रोणाचार्य से लड़ गया था, आज पुत्री का मान तहस नहस होने पर हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

अच्छा ही है जो प्रकृति ने इन पुरुषों को शिशुओ को पैदा करने का अधिकार नही दिया अन्यथा सृष्टि कब की रुक जाती। स्वयं को पीड़ा, त्याग से बचाना खूब आता है इन्हे। जीवन maano चौसर का खेल है और स्त्री उस पर पड़ी हुई बिसात, जो जीत जाए तो पुरूष का मनोरंजन और हार भी जाए तो उसका कुछ नही बिगड़ता।

द्रौपदी इतिहास से पूछने वाली है की रणभूमि क्या केवल उसके दर्प का परिणाम है अथवा दुर्बल, मक्कार पुरुषों की लिप्सा का?

वाह रे भारतवर्ष की ऊंची मर्यादा, यह वह मर्यादा है जिसने राम से एक भी प्रश्न नही पुछा और सीता पृथ्वी की गोद में समां गई। द्रपादी सीता नही है। वह नही चुकायेगी कीमत उस अपराध का जो उसने किया ही नही।

कृष्ण की सांत्वना ने द्रौपदी का धैर्य बंधाया है। वह नही छोडेगी इस रणक्षेत्र को।

द्रौपदी भारतवर्ष की मर्यादाशील पृष्टभूमि का एक ऐसा शर्मनाक पन्ना थी जो इतिहास लाख लाख मुह छिपा कर मिटाने की कोशिश करे, कभी नही मिटा पायेगा, हर युग में नारी स्वयं को द्रौपदी के उधार के चीर में लिपटा हुआ पाती है, बस कृष्ण ओझल है।

सृष्टि

परमेश्वर क्या होता है? विराट रूप क्या होता है?
क्या ये हम ही नही होते है जब अपने अदने से कद से ऊपर ऊपर उठने का प्रयास करते है?
कोई भौतिक वस्तु अथवा भौतिक पदार्थ की लिप्सा अंतर्मन को भीतर से खोखला करने लगती है तब एक ज्योति जागृत होती है स्वयं में से ही जो समस्त अंधकार को चीरने की क्षमता रखती है। तब अनुभूति होती है इस विशाल ब्रहमांड की जो फैला हुआ है निर्विकार तक।

तब मै उठने लगता हु। मेरा आकार बढ़ने लगता है। मेरी आकंक्षाये छोटीहोती जाती है, मेरा घनत्व बढ़ता जाता है। मेरा रूप देख कर कर समस्त विश्व आश्चर्यचकित हो जाता है। मै लड़ता हूँ स्वयं से और लड़ता जाता हूँ, मेरी मानस शक्ति बढती जाती है। मेरा शक्ति पुंज विस्तृत होता जाता है और समस्त जगत का मै एक विराट परम परमेश्वर रूप प्रकट हो जाता हु।

आज श्री कृष्ण गहन विचार मग्न थे।

द्वारिकाधीश सवेरे से ही कुछ अनमने से अपने विचारों में लीन थे। बुआ कुंती की ओर से हस्तिनापुर की खबर ख़बर कम अपशगुन अधिक लग रही है।

आज द्रौपदी का अपमान हुआ था। हस्तिनापुर नरेश ध्रितराष्ट्र की पुत्रवधू का अपमान।

किसने किया यह शर्मनाक कर्म?

स्वयं नरेश पुत्र राजकुमार दुर्योधन ने।

क्यो किया?

राजकुमारी को पाने की विषैली महार्वाकंक्षा के तीर ने दृष्टिहीन बना दिया है। सम्राट तो है ही दृष्टिहीन। चटोरे चालाक शकुनी के नयनो से राजकाज सत्ता संभालेंगे तो पुत्रवधू क्या पुत्री भी दिखाई नही देगी।

द्रौपदी परम सुंदरी है। ओज तेजस्व की साक्षात् अग्नि रूपा मूर्ति। क्षत्राणी है । दूत संदेश लाया है की परम ओजस्वी राजकुमारी ने अपने केश खुले छोड़ दिए है। दुशासन के रक्त से धोने की कसम खायी है।

दुशासन। यह दुशासन मेरे ही सामने पला, बढ़ा, कब इसकी उच्च्न्ख्लता इतनी बढ़ गई की राजपुत्री पर झपट बैठा?

वासना धर्मांध क्यो होती है? लिप्सा लोलुपता राजपुत्रो को हीनतम शुद्रो से भी हीन स्तर पर गिरा देती है। कौन सी नज़र से आज के बाद इतिहास दुर्योधन को देखने वाला है?

और भीष्म पितामह ? वे क्या कर रहे थे? चुपचाप हाथ बांधे दृष्टि नीचे झुकाए ज़मीन देख रहे थे? कहा गई वीरता? एक नारी का अपमान कोई बड़ी बात नही है। यहाँ इतना गोरखधंधा चलता है, ये एक और सही। क्या जाता है? किसका क्या जाता है? कहा है पंचाल नरेश स्वयं राजकुमारी के पिता? दामादों को हाथ से धोने के डर से बैठे होंगे अपने रेशमी पलंगो पर महलों में कैद होकर?

जितना बड़ा सम्राट उतनी ही क्षुद्र दृष्टि।

कृष्ण का मस्तक धधक रहा था। हृदय पीड़ा से व्याकुल होने लगा था। राधे को प्रेम किया था उन्होंने। राधे का रोम रोम स्वयं कृष्ण के प्रेम से दीयों की तरह जलता था। परन्तु राधे को इस दृष्टि से देखना दूर वे ऐसा दुस्साहस कभी नही कर पाए। कर भी नही पाएंगे। जब वह है ही उनकी। अपनी अंतरात्मा से भी कभी कोई जोर जबरदस्ती होती है क्या?

लालच, प्रेम नही जान सकता। नारीदेह पुरूष के अन्तर के जानवर को जगा देती है कोई नई बात नही है परन्तु वह नारी क्या चाहती है उसका कोई मोल नही?

पिता ने गौना कर भेज दिया ससुराल में, अब चाहे उसके टुकड़े टुकड़े हो जाए, या गली के कुत्ते नोच खाए, वह पड़ी रहेगी अपने परम परमेश्वर पति के भरोसे। ऐसा पति जो उसे जुए में हार जाता है। स्वयं को दाव पर लगाने के पश्चात।

यह नारी है। अधीन, परातंत्र पति की अर्धांगिनी। वह पति जो स्वयं की रक्षा नही कर सकता, जो स्वयं के अधिकारों की रक्षा नही कर सकता उस नारी का क्या करेगा जिसे पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर घर में लाया है। और वह नारी कहा जायेगी जब उसका अपना ससुराल उसे वेश्या बुलाये। जब घर के जेठ देवर उसकी स्वयं की देह को हाट बनाने बैठ जाए।

कृष्ण चतुर है। पहले इन्द्रप्रस्थ के अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने द्वारीकधीश की ओर से राजमहल में राजाधिकारी छोड़ दिए थे। कदाचित जब द्रौपदी ने विवश हो कर हे कृष्ण हे कृष्ण पुकारा होगा, स्वयं द्वारिका के राजदूत व् राजाधिकारी कृष्ण की ओर से प्रस्तुत हो गए थे। दुश्शासन का दुस्साहस धरा का धरा रह गया। चक्कर खा कर गिर पड़ा, सवेरे से सम्पूर्ण ग्रामीण द्वारिका व् हस्तिनापुर में यही चर्चा है की कृष्ण ने द्रौपदी का चीर बढ़ा दिया है।

कृष्ण अन्तर्यामी है, कृष्ण परम परमेश्वर है।

कृष्ण एक ठंडी निश्वास के साथ उठ खड़े हुए।