Wednesday, October 15, 2008

यज्ञकुंड

कृष्ण की कर्मभूमि में राधा धूल बन कर समाहित हो गई। बांसुरी का स्थान लिया सुदर्शन चक्र ने जो गुरु संदीपनी द्वारा भेंट किया गया था। ब्रह्मचर्य की अवधि पूर्ण कर युवा कृष्ण भारतवर्ष का इतिहास लिखने चल पड़े थे। अब स्मृति की छूटीहुई गलियों में वे झांक कर भी क्या करते? मस्तिष्क, तन, मन, सर्वथा नए वर्षो के साथ साथ नया युवा रूप ले रहा था। अब दामन थामने वाला कांह कही खो चुका था। वो कांह खो चुका था जिसके नयनो से प्रेम छलक जाता था। तपोभूमि में कृष्ण तपकर रणभूमि का बांका योद्धा बन चुका था। यशोदा माँ के द्वारा रगरग में भरा हुआ दुग्ध लाल क्षत्रिय रुधिर में बदल चुका था। कृष्ण की एक दृष्टि काफ़ी थी शत्रु की नींद उड़ने के लिए। जहा दृष्टि का काम नही वहा मोहक मुस्कान ब्रह्मास्त्र था। यह कृष्ण वह कृष्ण नही था जो गोकुल छोड़ आया था। यह कृष्ण तो जैसे एक धधकता हुआ ज्वालामुखी था जो सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, चौसर, चतुराई, जैसी हर चिंगारी को स्वयं के वश में किए हुए था। क्यो कृष्ण ने स्वयं को इतना बदल दिया था? कदाचित प्रिया का विछोह एक हार थी जो स्वीकार्य नही थी। प्रेम का उन्माद कृष्ण से अब कोसो दूर था। भारतवर्ष ने एक इश्वर को जन्म दिया परन्तु उसकी प्रिया उससे क्यो हर ली गई थी? कौन जाने उस मनमोहक मुस्कान का अर्थ यही रहता हो की हे जनमानस मैंने तुम्हारे लिए जन्म लिया है परन्तु मेरे लिए किसने जन्म लिया है? उस विराट रुपी परम परमेश्वर के पीछे यदि कही ध्यान सहेज कर देखो तो बांसुरी मिलेगी जो जमुना तट पर अकेली पड़ी थी। स्मृतिया धोखा नही देती, उन्हें सिखाया जाता है की हे स्मृति अब तुम यहाँ आना बंद कर दो। उनके लिए द्वार बंद किए जाते है परन्तु मन है की अनजाने ही दस्तक दे जाता है। और वे फिर-फिर स्वयं को वे इस भूल के लिए क्षमा नही कर सकते। वह क्या था जो कृष्ण को भारतवर्ष के सर्वाधिक भीषण रक्तरंजित रणक्षेत्र की तरफ आकर्षित कर रहा था। क्या वह क्रोध था जो हर प्रेमी को उसकी प्रेमिका की जुदाई के फलस्वरूप मिलता है? विष, हलाहल, पी पी कर कृष्ण सावरे हो चुके थे। सावरे क्या वे तो साक्षात कृष्ण ही हो चुके थे।
आने वाला समय अब इस योद्धा का साक्षी था। कृष्ण यज्ञ की एक आहुति हो चुके थे। न केवल उनमे आग थी, चिंगारी थी, वरन धू धू कर जलने के लिए अब तैयार थी भारतवर्ष की राजनैतिक पृष्ठभूमि।
इस सुर्ख रक्त के लाल रंग के मध्य गुलाबी राधा कही दूर विलूप्त्प्राया थी। पांचजन्य शंख ने फिर कभी बांसुरी को होठो से लगने का अवसर प्रदान नही किया। कदाचित विरह अग्नि रूप ले चुका था और राधा उस अग्निकुंड की समिधा हो चुकी थी। सुशुप्त स्नेहल प्रेम ने कृष्ण को पीला पीताम्बर तो पहनाया परन्तु स्वयं कृष्ण को बर्फ सा जर्द कर दिया था। वे प्रतिष्ठित चक्रवर्ती सम्राट थे जिनके हृदय का दीप अब एक हवनकुंड बन चुका था या फिर धू धू कर जलने वाली मशाल जो जितनीरोशन होती उतनी ही जलती जाती भस्म होने तक, भस्म करने तक ।

Tuesday, October 14, 2008

नारी स्वाधीन है। अपने आप में निर्मित एक परम सत्ता। वह एक ऐसी उ च्छन्खल नदी है जो किलोल करती हुई ऊंचे-ऊंचे पर्वतो में रास्ता बना लेती है। बंधा होता है पुरूष। अपने दायित्वों से। पुरूष भारी भारी bediyon में jakda हुआ धर्म का परचम लिए चलता है। अधीन होकर swadheenta का पुजारी कैसे हो सकता है vo? नारी स्वयं में स्थित एक सत्ता है। साक्षात प्रकृति।

प्रेम किया तो किया। समर्पण किया तो किया। अब कौन पूछेगा राधे से के क्या कर रही हो? कितनी अबोध हो? उससेप्रेम करती हो जो तुम्हे याद भी नही करता? परन्तु राधा अब नारी कहा है? वह तो एक परम सत्ता है जिसपर कृष्ण का निवास है। अपने आप में एक ब्रह्माण्ड जो कृष्ण के नाम से उद्दीप्त है। कौन दृष्टता करेगा ये पूछने की के यह नैतिक है या अनैतिक?

कौन जुर्रत करेगा उस ज़मीन पर पैर रखने की जो चिंगारियां उगलती हो परन्तु अपने वक्षस्थल से शीतल प्रेम के उदगार बहाती हो। राधे वह बहता हुआ स्त्रोत है जो कृष्ण रुपी शिला को हर पल कण कण में बदल देता है। कृष्ण विवश है उस वेग में बहने को परन्तु साथ ही बंधे हुए है दायित्व व् धर्म रुपी बंदरगाहों से। राधे की उर्जा उन्हें हर पल एक शिला से एक महीन कण में बदल देती है और वे फिर बड़े यत्न से सभा में स्वयं को एकत्रित कर लोगो के समक्ष प्रस्तुत करते है। तमाम कार्यो के मध्य किसी कोने में राधे जलती रहती है किसी मद्धिम दीप की तरह। समझ नही पाते है वे की ऊंचे और ऊंचे उठते जा रहे है वे या अपनी ही प्रेम पिपासा के मरुथल में भटकते जा रहे है। राधे से क्या कहेंगे? एक बोल भी फूटेगा मुह से?

मयूर मुकुट धारी श्री कृष्ण याचक से भी गए बीते है जो इस समय सम्पूर्ण राज्य के स्वामी है परन्तु अपने ही हृदय के सामने निर्बल। राधे जैसे निर्झर स्त्रोत का अंश होकर भी प्यासे। राधे को धारण कर के भी वंचित। प्रेम त्याग क्यो मांगता है? कृष्ण एसा प्रेम कभी कर पाएंगे किसी से?

स्वाधीन राधे अपने कृष्ण को ह्रदय में बैठा कर मग्न हो गई है। और कृष्ण अपने संघर्ष को हृदय में छिपाए और एक तपोभूमि पर कदम रखने जा रहे है , गुरु संदीपनीके आश्रम में।

Sunday, October 12, 2008

मनुष्य का अस्तित्व क्यो है? महत्वाकंक्षाओ की गलियों में भटकने के सिवा, और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की आकांक्षाओ के सिवा क्या इस इतनी बड़ी सृष्टि का कोई और भी अर्थ है?
भूख लगी तो अन्न उपजाया, श्रेष्टतम दिखने की तमन्ना जागी तो सूत से लेकर रेशम तक के वस्त्र धारण कर लिए, तन बेचैन हुआ तो स्त्री ले आया, पुत्र, पुत्री, व्यवसाय, न जाने क्या क्या पसारा। इस कभी न रुकने वाली, कभी न थकने वाली दौड़ में मनुष्य अंधाधुन्द दौड़ लगाताहै, किंतु किसलिए, मृत्यु के वश में हो जाने के लिए।
अनंत कुबेर राशीपरम सुन्दरियों का सहवास, आलिशान महल, गगनचुम्बी सफलता जाने किस नशे में मानव चूर रहता है । किसलिए? मृत्यु अवश्यम्भावी है। जो आया है जाएगा। बारिश की बूंदे है कब तक रहेंगी, ओझल हो जाएँगी फिर आसमान में।
क्या सोचकर मानव इतना फसाद करता है। चोरी, डाका, जंजाल, केवल अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाने के लिए। कितना पा पाताहै सब कुछ पा कर भी। क्या सचमुच पा पाता है?
कौन सी अनुभूति, उसके अतृप्त ह्रदय, असंतुष्ट मन को तृप्ति का एहसास दिला पायेगी?
संस्कृति की सीडिया लम्बी होती जा रही है और मानवता का कद छोटा।
मन क्यो चंचल रहता है? क्या था वो जिसने कंस को नन्हे नन्हे बाल शिशुओ का वध करने की प्रेरणा दी? क्या कमी थी? कौन सी महत्वाकांक्षा कब किसे कौन से सोपान पर ले जा पाई है?
कौन सी इच्छा पूरी होकर सदा के लिए तृप्ति की गोद में सो जाती है? क्या मानव स्वाभाव यह नही है की एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी की तलाश में निकल पड़ जाता है? फिर तीसरी, फिर और.... फिर और...... इस दौड़ में एक साँस लेने का भी अवकाश ले पाता है वह?
अकेले आए है, जाना भी अकेले है। आज यह तेरा है, कल मेरा होगा, फिर किसी और का हो जाएगा, फिर यह अतृप्त आत्माएं कितना भी भटके इनकी क्या गति हो सकती है? कोई कितने जन्म ले सकता है? क्या कोई अंत नही इस जनम-मरण के हिसाब का? कोई किस हद तक अपनी ज़रूरतों का गुलाम रह सकता है? क्या इतना कमज़ोर है मनुष्य? क्या इतना नश्वर?
कृष्ण जितना सोचते उतनी ही उनकी प्रश्नों की संख्या बढती जाती। वे हिसाब नही लगा पा रहे थे की मानव जनित इस कुसमाज की जड़ो को कहा से सुधार जाए? और कितने कृष्ण चाहिए इस ब्रह्माण्ड को एक रहने का स्थल बनाने के लिए? और कितने कृष्ण?
प्रेम सुध बुध भुलाता है; सुना था. आज देखा अपनी आँखों से, महसूस किया इस हृदय से. राधे को जमुना तीरे देख हर कोई ठिठक कर वही खड़ा रह जाता है. बावरिया स्वयं को कान्हा कहती है. बांसुरी को है की छोड़ती नही. प्रेम की ये महिमा समझ नही आती. कोई क्षुधा हो तो भोग कर शांत कर ले पर प्रेम को क्या चाहिए. तन जब मेरा है तो आत्मा उसकी तो नही आ जायेगी मुझ में. परन्तु राधे के साथ येही हो रहा है. केवल तन उसका है मन कान्हा की छवि से झिलमिला रहा है. आँखे उसकी स्वयं की नही रह गई है; देखती है तो लगता है कान्हा ही देख रहा है..नेत्रों से पानी की धारा बह रही है परन्तु आँखों में फिर भी कही कांह की रहस्यमयी मुस्कान छिपी है. मन पीड़ा से बिलख रहा है परन्तु कही गहरे में जैसे राधे इस संसार से पार हो गई है. नेत्र मूँद कर बैठे तो पीड़ा भी नही है. सब कुछ कान्हमय हो गया है. जैसे कोई साँस रोके सागर के तल में चुपचाप बैठ जाता है. . राधे स्वयं से ही क्रोधित हो जाती है तो स्वयं ही कृष्ण बन कर मना लेती है. कौन समझाए अ री कुछ नही धरा ये सब में. राधे जमुना देखे तो लहरों में कान्हा की ही छवि है, मटका देखे तो हंसने लगती है जैसे अभी अभी छलिया कंकर से मटका फोड़ ने की फिराक में हो. माटी में बैठे तो जैसे कान्हा के दामन से लिपट कर बैठी हो या फूलमाला सी कान्हा के गले में झूल रही हो. कभी कभी राधे को यू भी भान होता है की मधुबन के वृक्षो की डालियों से लटके हुए झूलो में कान्हा ही झूल रहा है और रह रह कर उसे बुला रहा है राधे आ जा हिडोले में झोके लेंगे. कानो से लग कर बहने वाली हवा कान्हा का नाम ले ले कर पुकार रही है. कृष्ण की कभी न रुकने वाली सृष्टि में राधा वह सूर्य बन चुकी थी जो केवल जलना जानता था, बुझना नही. कृष्ण की राजनैतिक चहल पहल में अनजान बेखबर राधे कृष्ण में सिमट कर ब्रह्माण्ड को जैसे चुनौती दे रही थी. प्रेम की महिमा कोई न जान ,,पाया जिसने जानी अग्निपरीक्षा का पात्र बना!
"पीड़ा की झोली में प्रीतम कर डाला तुमने अर्पित,
तप-तप कर, जल-जल कर प्रीतम,
तीव्र हो गई मेरी प्रीत!"
पुरे उफान से बहती हुई जमुना के शांत तीर पर राधा समाधिस्त है । प्रेम ने उसे जोगन बना दिया है। रात, दिन, राधे को केवल कान्हा का ही रूप दीखता है। राधे की माता ने रो रो कर सारा वृन्दावन सर पर उठा रखा है। वैद्य को बुलाया गया है। सभी कहते है राधे बावरी हो गई है। ये लक्षण शुभ नही है। राधे को किसी उच्चतम वैद्य को दिखलाना ही चाहिए। राधे ग्राम्प्रमुख की पुत्री थी। माता-पिता को राधे की चिंता खाक किए जा रही थी। पिता उठाते बैठते केवल यही कहते इश्वर किसी को पुत्री का पिता न बनाये। माता दिन रात भाग्य को कोसने लगी। हे इश्वर ये मेरी पुत्री को कौन टोना टोटका कर गया। मेरी पुत्री तो ऐसी न थी। सखिया राधे को मनाती तो किस तरह। कही से कृष्ण आ जाए। कान्हा ऐसे कैसे निठुर हो सकता है। प्रेम नही समझता तो न समझे परन्तु मनुष्यता तो जानता ही होगा।
येही होता है, येही होता आया है, समृद्धि शाली कृष्ण अब ग्राम क्यो आने लगा?अ री वह तो छोटो थो पर राधे उससे पाँच वर्ष बड़ी, नारी है, लज्जा नही आई छोकरे से नयन लडाते समय! जितने मुह उतनी बाते। कोई राधे को देख रो पड़ता तो कोई मुह बनाकर बगल से निकल जाता। कदाचित इस सृष्टि में जितना प्रेम बदनाम है कोई दूसरीचीज़ नही, आकर्षण भी नही!
सोने-चांदी से लदे बड़े बड़े राजे महाराजे नव्यौव्नाओ को उठा लाये तो बड़प्पन, और यदि एक भोला मन किसी को मन में बिठा ले तो मच जाता है तमाशा। कौतुहल का विषय हो जाता है। हर किसी को चिंता है राधे का क्या होगा? कोई सहानुभूतिवश , तो कोई आलोचक बन कर राधे की माता को पट्टी पड़ता ही रहता है।
इन सबसे अनजान, बेखबर राधे स्वयं को कान्हा मानने लगी है। बांसुरी हाथो में थम रात्रि भर बजाती है, की यशोदा को भी कृष्ण का भान होने लगा है। आँचल में मुह छिपा कर सिसक सिसक रोने के सिवा वह कर भी क्या सकती है?
कान्हा था ही एसा।

Saturday, October 11, 2008

कान्हा से कृष्ण

"राजकुमारों की शिक्षा का प्रबंध किया जाए। कृष्ण व् बलराम गुरु सांदीपनी के अंतर्गत ज्ञान प्राप्त करेंगे।" सभी वरिष्ठ अधिकारीयों व् मंत्रियो की यही मंत्रणा थी। क्योंकि कृष्ण का कैशोर्य ग्रामीण शैली का था अतः राजसिक प्रशिक्षण आवश्यक था। परन्तु उद्धव, नन्द, व् वासुदेव जानते थे की कृष्ण प्रशिक्षित था। वह अद्भुत बालक था। क्यो न कहलाये अद्भुत , यदु वंश का उत्तराधिकारी था। पिता वासुदेव के मित्र नन्द बाबा ने कृष्ण का प्रशिक्षण बलाकावस्था में ही प्रारम्भ कर दिया था। तभी तो बलाकावस्था में भी कृष्ण कंस के सभी प्रयासों को विफल कर पाया। कृष्ण की मोहिनी मुस्कान सभी के लिए आश्चर्य का कारन हुआ करती थी परन्तु कृष्ण स्वयं में बहुत कुछ छुपाया करते थे। अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना उन्होंने चुने हुए यदु नायको से सीखा था जो लम्बी अवधि से कंस के अंत की प्रतीक्षा कर रहे थे। आज मथुरा कही से भी सुरक्षित नही थी। एक अन्तराल के बाद राजकुमारों की वापसी हुई थी जिसके लिए बड़े बड़े महानायकों ने सूक्ष्मता व् गंभीरता से कंस का सामना किया था। कूटनीति व् राजनीती दोनों का ही अभ्यास अब कृष्ण व् बलराम को करना होगा। यदु वंश इन दोनों के हाथ में है। पिता वासुदेव जानते थे इस छोटे से साम्राज्य में महत्वकांक्षी नायको की कमी नही है जिन्हें देशभक्ति से अधिक केवल सत्ता लोलुपता ही अधिक आकर्षित करती है। कृष्ण का इन लोगो में उठाना बैठना होगा। सात्यकी जैसे कई वरिष्ठ नायक है जो दम्भी व् उद्दंड है। कृष्ण व य में छोटा है परन्तु अब उसे राजा बनाना है। शस्त्रीकरण, अध्यात्म, विज्ञानं, वाणिज्य व् गणित सभी में कृष्ण का प्रशिश्क्षण आवश्यक है। हा केवल एक प्रशिश्क्षण देने की आवश्यकता नही है संगीत व् नृत्य। 'हा हा गोकुल वृन्दावन में येही तो प्रशिश्क्षण होता था' बलराम की टिपण्णी से सभासदों के मुख पर बरबस मुस्कान खीच आई। केवल कृष्ण टेढी भोहो से बलराम को ताकता रहा। पिता वासुदेव हंस पड़े व् राजकुमारों के प्रस्थान की तयारी में लग गए।

Thursday, October 9, 2008

कृष्ण सोचते ही जा रहे थे। राजमहल की औपचारिक चहल-पहल जैसे उन्हें छु भी नही पा रही थी। अब वे क्या करे? वे सबके साथ न्याय करेंगे। विश्वसनीय मित्र उद्धव के साथ। पिता वासुदेव के साथ। माता देवकी के साथ। इस संपूर्ण जम्बुद्वीप के साथ। राधा के साथ? क्या दोष है उसका? राधा का हृदय पुकार पुकार कर उन्हें विचलित कर रहा था। मति सुन्न पड़ती जा रही थी। विवाहित है तो क्या हुआ? वे राजा से भी अधिक महत्वपूर्ण स्थान पर है। पल भर में राधे को वृन्दावन से उठा कर राजमहल में अपनी छत्रछाया में ले लेंगे। परन्तु इसका जनसमूह पर क्या असर पड़ेगा? विरोध से नही डरते कृष्ण। क्यो नही ला सकते वे राधे को यहाँ?
नही ला सकते। अभी समस्त द्वीप पर इस सत्ता का बिगुल बजना बाकि है और पहले ही कृष्ण जनमानस के ह्रदय में आक्रोश नही पैदा कर सकते। उन्हें याद है राधा के माता पिता ने कभी उसका कृष्ण से मिलना स्वीकार नही किया था। ग्राम ने भी कभी उनके रास को मान्यता नही दी थी। कृष्ण समझ नही पा रहे थे अंततः वे स्वयं से व सभी से इतना संघर्ष क्यो कर रहे है? उनका पदार्पण मथुरा के राजमहल में लोकहित वश हुआ है। तो क्या कांह का कोई अस्तित्व नही? क्या कांह का होना अनैतिक है? क्या कोई प्रेम नही कर सकता? नीतिनुसार, सामाजिक मान्यतानुसार यदि विवाह किया तो ठीक नही तो सब ग़लत है। ये कहा का न्याय है? क्या विवाह प्रेम समन्धित नही होना चाहिएऔर यदि एसा नही होता तो विवाह होना ही क्यो चाहिए?
तभी निष्ठुर हृदय की एक प्रताड़ना ने कृष्ण को चेताया "हे कृष्ण वासुदेव " आप यदु वंश के नायक घोषित किए गए है। चीत्कार आपको शोभा नही देता। आपकी कर्मभूमि आपको विह्वल हो पुकार रही है।
कर्मभूमि! हाँ। व्यक्ग्तिगत भोग, व्यक्तिगत प्रेम, व्यक्तिगत सुख कदाचित सामाजिक कर्तव्यों से अधिक महत्वपूर्ण नही हो सकता।
कृष्ण ने स्वयं को संयंत किया। ब्रहाम्मुहूर्त हो चला था। रात्रि आँखों ही आँखों में कटी थी। संपूर्ण रात्री, शय्या कंटक पूर्ण थी। कहा दिन भर गैया चरा कर, गोपियों संग ठिठोलिया कर राधा को सता कर वे , रात्रि भर बांसूरी बजा कर राधे को बेचैन करते और कहा अब रेशमी शयन कक्ष में वे करवट बदल रहे है।
भोर का सूर्य ॐ नमन से आरम्भ हुआ। राजमहल के भीतर अत्यधिक कुशलतापूर्वक निर्मित किए हुए नील सरोवर में वे स्नान करने उतर पड़े। सुंदर कमल सूर्य देव को नमस्कार कर रहे थे। कृष्ण ने नयन मूँद लिए व बेसुध सरोवर की गहराईयों में उतरते चले गए। मस्तिष्क पटल पर सूर्य के प्रकाश की आभा जगमगा रही थी।
'जमुना का पानी भी गहरा है। काला है कृष्ण की तरह।' पक्षी के कलोहल से जग पड़े वे। तैर कर ऊपर आए तो देखा एक हंसिनी उड़ गई थी, हंस अकेले सरोवर में क्रंदन कर रहा था। कृष्ण बेबस उसे देखते रहे।
"मथुरा नरेश ने संदेश दिया है महाराज की आप व बड़े भ्राता मल्ल युध्ध क्रीडा के लिए आ जाए। " उद्धव ने झुक कर संदेश दिया।

Monday, October 6, 2008

कृष्ण स्वयं को सहेज नही प् रहे थे। कल तक वे एक नंदकिशोर गोपालक हुआ करते थे और आज वे यदु वंश की नींव का पत्थर बनने जा रहे थे। अत्यन्त नाटकीयता से कंस का वध तो हुआ परन्तु सभी जानते है कि यह एक पूर्वनियोजित योजना थी।
पिता वासुदेव एक जर्जर कंकाल हो चुके थे, राजा उग्रसेन अत्यन्त वृद्ध। बलराम रोहिणी का पुत्र था अतः उग्रसेन का उत्तराधिकारी घोषित नही किया गया, सभी कि नज़र किशोर कृष्ण पर ही टिकी थी।
महल अत्यन्त वैभवशाली व भव्य था। दास दासी, तोरण, भव्य कक्ष, अद्भुत विहार, क्रिराग्रह, सभी मन मोहक था। इतनी चहल पहल में कान्हा का कही अस्तित्व मिट सा गया था।
'प्रणाम वासुदेव'। कृष्ण चौक गए।
पल भर पहले वे माँ यशोदा की फटकार, राधा के झूठे क्रोध को मन ही मन में सहेजे जा रहे थे। यहाँ सब नया है। यहाँ माँ नही है। राधे नही है। क्या सोचती होगी राधा। यही कि कृष्ण ने उससे छल किया है।

वह गाव की निर्मल, अबोध क्या जाने साम्राज्य, समाज, और डूबते हुए यदुवंश के सूर्य को। कंस ने नीतियों के साथ ही साथ मथुरा के कोशो को भी खोखला कर दिया है। एक सूत्रधार कही से मिल जाए इस वंश को। और कृष्ण जानते है वे अकेले है इस साम्राज्य के योग्य उत्तराधिकारी। परन्तु अब कृष्ण कंस की नीतियों को नही दोहराएंगे। मथुरावासियों को आदत सी हो गई है अपमान और अराजकता सहने कि। एक कृष्ण को नायक का रूप लेना पड़ा।
कितने लोग समझ पाएंगे इस पीड़ा को कि कृष्ण और साम्राज्यवाद के बीच कांह कही खो गया है। नयन रोयेंगे पर छु प कर। कभी सम्राट भी रोता है भला। राधा का क़र्ज़ नही चुका पाएंगे। उसके अनमोल प्रेम कि कीमत नही दे पाएंगे। उसके खाली आँचल को कभी नही भर पाएंगे।
कितना छोटा हो गया है इतना बड़ा साम्राज्य एक भोली राधा के सामने।
कहा से शक्ति आती hai राधा में। उसे देख कर कृष्ण सहेजते है स्वयं को। विष का यह प्याला पीना पड़ेगा कांह को। राधा विवाहित है। उसके पति को कंस ने ही जीविका दी थी और अब वह कृष्ण का सेवक होगा। राधे ने कभी उसे पति नही माना। परन्तु क्या करती विवश थी पिता और माता के समक्ष। प्रेम का एहसास हुआ भी तो देर से । ब्याह के मायने तक नही जानती थी परन्तु किशोरी होने के नाते पिता ने गौना नही किया। किशोर व् य व् किशोर मन क्या जाने ये बाते समाज कि। आज कृष्ण जान पाए मन के अथाह विश्मंथं को। विष है कि गले तक भर आया है। कृष्ण का राजतिलक हो रहा है पर नेत्र रो नही सकते। कैसे रोयेंगे इस जर्जर टूटे हुए समाज के क्षीण ढांचे पर। राधा तुम जलो, में जलूँगा। यह अग्नि परीक्षा देनी होगी। यह आहुति देनी होगी। कृष्ण को नींव का पत्थर बनना पड़ेगा। बांसुरी छोड़ आए है कृष्ण राधे कि झोली में। अब कृष्ण केवल रणनीति अपनाएंगे। बनाना पड़ेगा कृष्ण को महानायक। अन्तर का कांह कही दूर हंस रहा था, देखो ये कृष्ण है जिसे लोग इश्वर कहते है। कितना एकाकी, कितना अधूरा, कांह ...... या कृष्ण?

Wednesday, October 1, 2008

गोधुली के क्षण बीतते जा रहे थे। राधा अब भी जमुना के तीर बैठी श्याम की बांसूरी हाथो में लिए दूर कही खोयी हुयी थी। धुंधलका गहन हो चला था। और संग ही धुंधली होती जा रही थी कांह की वापसी के आस। काहे राधे, नयन खोये जा रही है। अरी दुष्ट था वो।
कान्हा कह के गया था राधे अब भेट हो न हो। मथुरा जा रहा हू। गुप्तचर की सुचना के अंतर्गत अब समय हो गया है कृष्ण के चलने का।
कृष्ण, राजपुरुष? गुप्तचर? कृष्ण कब से मथुरा की राजगद्दी का स्वामी हो गया? वो तो ग्वाला है। उसके मन-दर्पण का स्वामी। मेरा भोला नादाँ कान्हा मथुरा के कंस का अंत कैसे करेगा?
राधे को चक्कर आ रहा था। थक कर जमुना तीरे आ बैठी।
अश्रुओं की धारा रुकने का नाम नही ले रही थी।
रातो रात कृष्ण को मथुरा की राजनैतिक चहल पहल की भनक नही लग सकती। वह जानता था ये सब। फिर राधा को अंधेरे में क्यो रखा गया? क्या ये राजनीती ऐसी ही होती है? प्रेम, निष्ठां, दर्द का कोई अस्तित्व नही?
राधा अब एक ग्वालन है और कृष्ण एक राजपुरुष। अब उसका और राधा का क्या मेल? कौन जाने कांह लौटेगा भी या नही। अब तो उसका एक रानीवास होगा। यहाँ गोकुल में वह गोपियों को भी फटकने नही देती थी अब मथुरा के महलों से क्या ताल मेल?
जलन, मोह, विरह, मिल कर राधा को जैसे नश्तर चुभा रहे थे। कांह ने राधे से प्रेम का नाट्य रचा था अन्यथा कोई ऐसे जाता है भला?