साधना के प्रकार होते है। साधना साधक भी स्वयं ही खोजती है। उसे तो बस होने से मतलब है। माद्यम कोई भी हो सकता है। अंतर्मन तितिक्षा से स्वयं ही गुजरने लगता है। उसके लिए किसी कारण विशेष की आवश्यकता नही है। और न ही आवश्यकता है उस साधना को किसी व्यक्ति विशेष की अनुमति अथवा विरोध की। साधना अनंत गहन मौन है। वह चलती जाती है जैसे कोई घुप अँधेरी सुरंग कभी न समाप्त होने वाली राह को चुन लेती है। यह अत्यन्त विषम अत्यन्त सरल है। अंतर्मन जलता जाता है चुपचाप। वह कौन सी चुम्बकीय शक्ति है जो यह सब होने के लिए प्रेरणा बनती है?
कृष्ण स्वयं ही साधक है, स्वयं ही एक साधना है।
पांडवो का वनवास सामाजित व् राजनीतिक दृष्टि से सरासर अन्याय है। अनोखी बात है की उनके पक्ष में अभी तक किसी भी राज्य ने कौरवो के विरुद्ध आवाज़ नही उठाई है। सभी ने यही सोचा होगा की किसी के घर का मामला है। क्या करेंगे बीच में पड़ कर। कोई यह क्यो नही सोचता की यदि एक घर को यह करने की स्वतंत्रता मिल सकती है तो हर घर में भाई भाई दुश्मन बन जायेंगे। न्याय का समाज से नामो निशाँ मिट जाएगा।
द्रुपद पुत्री कृष्णा के साथ नियति क्या खेल खेल रही है कोई नही jaanta.
कृष्ण किस समय-रुपी रथ के सारथि बनने जा रहे है कोई नही जानता।
कृष्ण केवल इतना जानते है की अराजकता जब सीमा पार करने लगे तो सुदर्शन पर हाथ बरबस ही उठ जाता है। क्या ग़लत है?
परन्तु इस समय उन्होंने धैर्य से काम लेना ही श्रेयस्कर समझा।
यदि महाराज युधिष्ठिर किसी और नीति का अनुसरण करते तो आज द्रौपदी वन वन न भटक रही होती?
यह समाज नारी को देवी का स्थान देने की बाते करता है। परन्तु पल भर में अपनी ही नीतियों व् मान्यताओ को जड़ो से काट फेंकता है। समाज कहता कुछ है, करता कुछ है। समाज के बड़े बड़े ठेकेदार जो पलते है इसी समाज के क्षीण वर्ग का रक्त पी पी कर, जिन्होंने अपना स्थान बना रखा hai, विभिन्न प्रकार की कहानियो का गठन कर के अथवा झूट की बुनियाद पर दिखावे की म्यान रख कर, कौन से मुह से नारियो को देवी का स्थान प्रदान करने की बातें करता है?
नारी देवी होती है। कोई द्विपक्ष नही। तभी तो माता का गौरव पाती है। तभी तो कष्ट में भी तपती रहती है। तभी तो पति के संग अग्निसमर्पित होने की प्रथा को भी वह निबाह गई। कितने पुरूष है जो नारी के मृत शरीर के संग समर्पित व् समाप्त हो गए?
कृष्ण राह भर सोचते जा रहे थे। राजा युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता है। क्या युधिष्ठिर को इस सन्दर्भ में अपनी सोच बदलने की आवश्यकता नही है? वे राजा है। दर्प, हठधर्मिता, भीरुता किसी भी हाल में एक शक्तिशाली सामराज्य स्थापित नही कर सकता। उन्हें यदि सत्य की इतनी ही चिंता है तो इस सत्य को समाज के ढांचे पर , उस के असली आयाम निर्धारित करने पड़ेंगे। नही तो यदि हर राज्य की द्रौपदी वस्त्रहीन हो निष्कासित होती जायेगी। नारी की ध्वस्त स्थिति किस प्रकार के सत्य का प्रतिपादन कर रही है? यही के नारी एक वस्तु है? जब चाहे जुए में जीत लिया जाए, जब चाहे जुए में हारा जाए?
कौन सा सम्राट ऐसा कर सकता है? ये सम्राट नही हो सकता। ऐसा मनुष्य केवल आसक्तियों व् तृष्णा का अधीन दास हो सकता है। फिर कैसे जीतेंगे वे अपनी लड़ाई adharm के ख़िलाफ़?
कृष्ण को उत्तर की प्रतीक्षा करनी होगी यह वनवास पूरा होने तक।
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