भावनाओ के ज्वार भाटे से जूझती हुई रुक्मिणी झरोखे में बैठी स्वामी की प्रतीक्षा कर रही है। प्रतीक्षा भी कैसा शब्द है? तितिक्षा जैसा लगता है। साँझ ढलने आई, कब से बिन बताये गए है, बिन बोले चले गए,किसी से संदेश भी नही भिजवाया, कहा हु, कब आऊंगा, कुछ भी नही?
यदि क्रोधित है तो कम से कम कुछ क्रोध तो प्रर्दशित कर जाते, परन्तु वह भी नही, स्वामी को समय ही नही है, अपनी राजनैतिक गतिविधियों से।
रुक्मिणी मन ही मन कृष्ण को याद कर परेशानहुए जा रही थी। वैसे कृष्ण जब राजप्रसाद में ही रहते है, तो रुक्मिणी इधर उधर के कामो में उलझी रहती है, तब नही ध्यान रहता कृष्ण महल की अटारी पर खड़े है, अथवा कही और उलझे है। बस है। उतना ही काफ़ी है। अब नही है तो इतनी बेचैनी।
रुक्मिणी को आज भी याद है जब पहली ही बार उसने कृष्ण को देखा तो बस देखती ही रह गई थी। उसके अंतर्मन ने तभी उसे कह दिया था की यही पुरूष उसके तन-मन का स्वामी है, अन्यथा वह कही और सलंग्न ही नही होगी। कृष्ण उसके प्रेम की पाती पाते ही उसे सब से लड़ कर ले गए थे। भीषण संग्राम के पश्चात रुक्मिणी कृष्ण की भार्या हो पायी थी। परन्तु आज सोचती है, के भार्या होना ही काफ़ी नही है। वे तो फिर भी लगे रहते है अपने काम काज में और वह दिवस भर के औपचारिकताओ को पूरा कर के भी खड़ी रहती है पति की प्रतीक्षा में, अंतर्मन ने हंस कर कहा प्रतीक्षा नही तितिक्षा में। वैसे भी पुरुषों के लिए यह सब उपहास का विषय रहता है। तुम नारियो को काम नही रहते, भावनाओ में डूबे रहने के सिवा। पुरूष है तो बहुत तीर मार रखे है। ज़माने भर के जिम्मेदारिया, सम्मान, अपमान इत्यादि इत्यादि, इससे से तो हमारी प्रेम भरी तितिक्षा ही भली।
स्वामी कही भी जाओ, कितने भी दिन के लिए जाओ, कम से कम मिल कर तो जाओ? नयन मिला कर चुरा कर मत जाओ, हा हा समस्त जम्बुद्वीप का ज़िम्मा उठाये फिरते हो, परन्तु जिससे नैना मिला कर हृदय चुराने का जोखम उठाते हो, एक संदेश नही भिजवा सकते के विदा दो, फिर मिलेंगे? वह भी रुक्मिणी ही करेगी? फिर ताना सुनो के गले ही पड़े रहती हो। पल भर के लिए भी नही छोड़ती। अरे झूट क्यो बोलते हो? झूट बोलना तो कृष्ण की पुरानी आदत है। और अपने किए वादों से फिरना तो उससे भी पुरानी। कपटी, झूठे, मन मोहना, मायावी, झूठे आंसू दिखा दिखा कर सच मुच ही रुला देते है। जाने क्या मज़ा आता है इन्हे ये सब करने में।
बेचारी रुक्मिणी नारी स्वाभाव से परेशान झरोखे में बैठी न जाने क्या क्या सोचे जा रही थी।
जब से मिली है, विरह कुछ कम तो नही सहा है। परन्तु इसकी कोई सीमा भी तो हो? सब सिरदर्दी रुक्मिणी की है, कृष्ण को तो बस स्वतंत्र फिरने से मतलब है। एक प्रश्न इन पुरुषों को पूछ लो, बस गले की हड्डी लगने लगती है।
द्वारिका का भीतर का माहौल कुछ ठीक नही था। अभी अभी तो कृष्ण ने नींव डाली है द्वारिका की, और अभी से कृष्ण के विरोधी पनपने लगे है। पीठ पीछे चाकू भोकने वाले। वे सोचते है, के बलराम में उतनी शक्ति नही है राज काज सँभालने के, उत्तराधिकारी को लेकर अपार राजनैतिक मंत्रनाये चलती ही रहती है, कृष्ण के विरोधी सामंत वर्ग के ही नही अपितु कुछ वे मंत्री गन भी है जो ऊपर से स्वयं को सज्जन दर्शाते है, और भीतर से द्वारिका की जड़ो को खाने का भी काम कर रहे है। कृष्ण की अपनी ही शैली में जीने की आदत से इस विशिष्ठ वर्ग को सदैव ही आपत्ति रही है। इस तरफ़ ध्यान देना आवश्यक है।
परन्तु अभी कृष्ण का ध्यान है केवल हस्तिनापुर व् इन्द्रप्रस्थ पर।
रुक्मिणी के मुख पर चिंता के बादल साफ़ झलक रहे थे।
स्वामी मिलिए शीघ्र कुछ समाचार है राज काज को लेकर।
रुक्मिणी मन ही मन कृष्ण से मिलने की प्रार्थना कर रही थी।
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