द्रौपदी सर झुकाए अपने कक्ष में मौन कही शून्य में टकटकी लगाये हुए थी। भारतवर्ष के महानतम शूरवीरों की भार्या एक वस्त्र में लिपटी खड़ी थी। उसके मान की धज्जिया स्वयं उसकी मर्यादा की पताका थामने वालो ने उडाई थी।
आज वह एक ऐसी लाश थी जो न मिटटी में दफ़न हो पाई और न ही सम्पूर्णतया चिता में जल पाई। मिटटी के इस खिलौने को कौन से आशय से संभाले? वह अब भी जीवित है, क्यो ? उसकी समझ से बाहर था। जी तो किया आग लगा दे इस हस्तिनापुर की जीवित अट्टालिकाओं को, इन निर्लज्ज झरोखों के पर्दों को नोच नोच कर तहस नहस कर दे, एक महारानी चीथडो में लिपटी अपनी मर्यादा की दुहाई दे रही थी और यह समस्त संसार अपनी शूरवीरता की कहानिया फिर भी कहने से थकता नही है।
केश खोल कर द्रौपदी लाल लाल नेत्रों से जैसे ठहाके लगाना चाहती थी। वाह रे पुरूष प्रधान समाज। लोहे की ढाले, तलवारे जंग खायी हुई है। पल भर में ये सभी पुरूष नपुंसक ही सिद्ध हो जाते है। कौन से मन से वह अपने पतियों को पतिपरमेश्वर का मान दे? समाज नारी से सौ सवाल कर बैठता है, की क्या वह बेहया है जो अपने पतियों का त्याग कर देगी? वह ये क्यो नही पूछता जो व्यक्ति एक स्त्री का पुरूष होने का कर्तव्य नही निबाह पाया वह एक साम्राज्य का निर्वाह कैसे करेगा?
प्रश्न केवल नारियों के लिए है? पुरूष हर प्रश्न पूछे जाने पर मुह बाये क्यो खड़ा हो जाता है? नारी का अस्तित्व एक शिशु तक ही सिमित क्यो है?
द्रौपदी आज लुटे हुए मोहरों की तरह चौसर के पानो पर बिखरी पड़ी हुई थी। अग्नि, मान मर्यादा, सिन्दूर सब जैसे उस पर हंस रहे थे।
हस्तिनापुर की पुत्रवधू, इन्द्रप्रस्थ की महारानी, राजा द्रुपद की पुत्री वह द्रुपद जो मान अभिमान का युद्ध द्रोणाचार्य से लड़ गया था, आज पुत्री का मान तहस नहस होने पर हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
अच्छा ही है जो प्रकृति ने इन पुरुषों को शिशुओ को पैदा करने का अधिकार नही दिया अन्यथा सृष्टि कब की रुक जाती। स्वयं को पीड़ा, त्याग से बचाना खूब आता है इन्हे। जीवन maano चौसर का खेल है और स्त्री उस पर पड़ी हुई बिसात, जो जीत जाए तो पुरूष का मनोरंजन और हार भी जाए तो उसका कुछ नही बिगड़ता।
द्रौपदी इतिहास से पूछने वाली है की रणभूमि क्या केवल उसके दर्प का परिणाम है अथवा दुर्बल, मक्कार पुरुषों की लिप्सा का?
वाह रे भारतवर्ष की ऊंची मर्यादा, यह वह मर्यादा है जिसने राम से एक भी प्रश्न नही पुछा और सीता पृथ्वी की गोद में समां गई। द्रपादी सीता नही है। वह नही चुकायेगी कीमत उस अपराध का जो उसने किया ही नही।
कृष्ण की सांत्वना ने द्रौपदी का धैर्य बंधाया है। वह नही छोडेगी इस रणक्षेत्र को।
द्रौपदी भारतवर्ष की मर्यादाशील पृष्टभूमि का एक ऐसा शर्मनाक पन्ना थी जो इतिहास लाख लाख मुह छिपा कर मिटाने की कोशिश करे, कभी नही मिटा पायेगा, हर युग में नारी स्वयं को द्रौपदी के उधार के चीर में लिपटा हुआ पाती है, बस कृष्ण ओझल है।
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