मानवता के परखच्चे उड़ना कोई नवीन घटना तो नही है। वर्षो से, सदियों से, कई जन्मो से यही होता आया है। बनाने वाले ने न जाने क्या सोच कर यह धरती बना दी, उसे प्रकृति से सजा दिया, न जाने विकृति कहा से आ गई?
क्यो आ गई?
कोई अपना ही घर क्यो फूंकता है? कोई अपने ही देश में आग क्यो लगाता है? फिर अत्यन्त सावधानी से मुखौटो का प्रयोग कर अपनी दानवी हिंसात्मक विकृतियों को कैसे छिपा लेता है? घर के घर में पता नही लगता के यह व्यक्ति मेरे प्राणों का प्यासा है। मनोविकारों की जड़े कितनी गहरी है, अंधकूप की भांति पाताल लोक से निकलती हुई, पृथ्वी की सतह को लहुलुहान करने का षड़यंत्र रचती रहती है यह विकृति!
इतने वृक्ष है गहन जंगलो में, सभी पंछी एक एक neer banakar रह सकते है, इतने फल दिए है देने वाले ने, सभी एक एक फल खा कर क्षुधा मिटा सकते है। इतनी धरती दी है, इतना पानी दिया है, और दिया है दूर दूर तक फैला हुआ यह विस्तृत आसमान यह बताने के लिए की हे मनुष्य हृदय को फैला लो इस आसमान की तरह जिसके साए में पूरा जगत आ जाता है।
परन्तु हाय रे मानव सभ्यता! पशुता के चंगुल से आज तक swatantra नही कर पाई स्वयं को।
निम्न से निम्नतम स्तर पर उतर कर वहशी खेल खेलती है।
शकुनी आराम से हस्तिनापुर के राजप्रासादों में पैर फैला कर baitha हुआ है। उसकी हर चाल टेढी है। मुस्कान वक्र है। वह जानता है, समय के बहाव को किस वक्रता से मोड़ लिया जाता है। वह घर बैठे बैठे इस जम्बुद्वीप के परखच्चे उडाना जानता है। वैसे भी जिस देश का राजा दृष्टिहीन हो vahaa की प्रजा भी दृष्टिहीन देर सवेर हो ही जाती है। दृष्टि से अंधे, कानो से बहरे, जीह्वा से गूंगे, हाथ पैरो से लाचार, यदि कोई लाचार नही हो तो धन का लालच दे कर अपने जैसे बना दो, जो धन से न माने, उसे इस दुनिया से उठा दो, यही तो है राजनीति!
शकुनी अट्टहास कर के हंस रहा है। याद है किस तरह उसने पाँच पांडव व् उनकी माता को ज्वलनशील राजप्रासाद में घेर कर मार डालने का षड़यंत्र किया था? उनकी किस्मत जो वे बच गए, अब नही बचेंगे।
जब भेदी घर में बैठा हो तो शत्रु को देश की सुरक्षा दीवार पार करना मुश्किल नही पड़ता। शकुनी का विस्तार गली गली में है। बरसों से उसने अपनी जड़े जमाने के लिए अपराधी वर्ग के युवको की भीड़ जमा की है। शकुनी की वक्र चाले राजनीति तक ही सीमित नही है। वे सम्मिलित है जन मानस के घरो में, जो जब समय आता है, मोहरों की तरह काम आ जाते है, अन्यथा आसान है अपने ही घर में आग लगाना?
जन मानस जो भूखा है सदियों से, जिसके बच्चो को शिक्षा की छांव तो दूर दो समय का दूध भी नसीब नही होता, जिसने देखा है अपनी ही aatma को मरते हुए, जिनके लिए एक समय का अन्न ही काफ़ी है, भोजन प्राप्ति व जल ही काफ़ी है मानव अस्तित्व के लिए, यह वर्ग, जो राजधिकारियो की नज़रो से ओझल रहा है। प्रशासन सदियों से ऐयाश है। जनता के मालिक बनने के बाद उसे और चुसो, उनकी रग रग से रक्त की एक एक कोशिका खीच लो, फिर वे नही रह जाते किसी के। अपने देश के भी नही। वे देशभक्ति क्या जानेंगे जो केवल जलते है इस रोष से की हमें किसी ने अनाज का एक दाना नसीब नही होने दिया, या जो जलते है इस आग में, की में काबिल था फिर भी मेरे हिस्से का आसमान मुझे नही मिला?
ये वर्ग पड़ जाता है शकुनियों की हाथ में, और शकुनी खेलता है रक्त की होली। कितने वीर पुरुषों की समाधि बन जाती है, इस रंग्लीला को अंजाम देते देते। कितने अभिमन्यु गिर पड़ते है ज़मीन पर, शकुनियों के संबंधियों से लड़ते लड़ते।
प्रशासन इतना apang क्यो होता है?
शकुनी को इतनी जगह मिल ही कैसे जाती है के वह गुरु कृपाचार्य, गुरु द्रोणाचार्य, सबल राजकुमार सुयोधन जैसे व्यक्तित्व को विकारों से भर सके?
वह इसलिए की हम सभी में एक शकुनी छिपा है। हम सभी सोचते है, की यह सम्पूर्ण साम्राज्य केवल मेरा है। एक सुई की नोक के बराबर भी हिस्सा किसी को नही दिया जाएगा। समस्त मेरा। लार टपकाता हुआ कुत्ता व् मरी हुई लाशो पर गोल गोल चक्कर काटते हुए गिध्ध, यही है शकुनी का साम्राज्य, यही है शकुनी का विस्तार। हम देते है शकुनी को पनपने की जगह। हम देते है उसे इजाज़त अपनी सभ्यता, अपनी विरासत, अपने मौलिक स्तंभों की धज्जिया उडाने की।
जन जन मिल कर बनाता है देश। फिर मुठ्ठी भर सत्तालोलुप राजनैतिक अधिकारी, अथवा अपराधी वर्ग के हाथो में क्या करता रहता है राजसिंहासन।
इधर कृषको के खेत जल गए है। ये वर्ष पानी नही बरसा है। जंगलो में आग लग कर saangwaan की लकड़ी का कोई व्यापार नही हो पाया है। धनिक वर्ग, गरीब वर्ग सभी एक ही तराजू में झूल रहे है, शकुनी के लिए इस से अच्छा समय क्या हो सकता है, जन मानस को बहका कर अपने हक में कर लेना कौन सी बड़ी बात है?
मस्तिष्क पर मकडियों के jaale पड़े है। हे जन मानस यदि रोकना चाहते हो इस विनाश की लीला को, तो आँखे खोलो।
धन की चकाचौंध से ऊपर उठ कर केवल अपने हल की आवाज़ तो सुनो, मुठ्ठी भर ज़मीन के लिए आवाज़ तो उठाओ, मिल कर कदम उठाओ, फिर देखो कौन सा शकुनी टिक पायेगा?
लेकिन नही, अभी तो भारतवर्ष के सीने पर महाभारत का युध्ध बाकि था। सूत्रधार की पुकार नही पहुच पायेगी उस समय की शिलाओ तक।
अभी अज्ञान का अँधेरा गहन है।
यह रक्तपात कैसे रुकेगा?
स्वयं श्रीकृष्ण नही रोक पा रहे!
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