Friday, November 28, 2008

इर्ष्या ! पड़ोसी देश को पड़ोसी देश से! उसकी उन्नति से इर्ष्या! उसकी सफलता से इर्ष्या! कैसे इस भव्य खड़ी इमारत को ढहा दू, बस इतना ही संघर्ष!
यही हो रहा था हस्तिनापुर में भी! इन्द्रप्रस्थ की भव्यता से इर्ष्या। उसके वैभव से इर्ष्या! पाँच राजकुमारों के स्नेहमय परिवार से इर्ष्या! अनुपम सुंदरी स्त्री पांचाली कृष्णा से इर्ष्या।
शकुनी ने अपनी टेढी चाल हस्तिनापुर के सीने पर चल दी थी। अपनी बहन गांधारी के सुहाग का वंश उजाड़ने की कसम जो खायी थी उसने।
इर्ष्या मति को ऐसे कैसे भ्रष्ट कर देती है?
युधिष्ठिर के मस्तक पर शकुनी ने वह दाग दिया है की उसकी लोकप्रियता अब सदैव चंद्रमा की तरह कलंकित रहेगी। स्वयं पत्नी द्रौपदी उसका मान नही रख पायेगी। एक चाल, और सम्पूर्ण इन्द्रप्रस्थ मुठ्ठी में। शकुनी से जुआ? अपनी कुटील मुस्कान चेहरे पर रख शकुनी अपनी सफलता से फूला नही समां रहा था। सब सही हो रहा था। पांचाली मुठ्ठी में आ चुकी थी। हस्तिनापुर की मिटटी सदैव के लिए पलित हो जाती यदि वह.... वह... शकुनी के चेहरे की वक्रता बढ़ने लगी, वह कृष्णअपनी चाल न चल जाता। अपने श्रेष्ठ अधिकारी नियुक्त कर रखे थे उसने। महाराज ध्रितराष्ट्र के कान भरने में शकुनी ने कोई कसर नही रखी परन्तु इस जम्बुद्वीप पर कृष्ण के खिलाफ कोई चाल चलना शकुनी को भी भारी पड़ता है। क्या है इस कृष्ण में? कहते है योग्पुरुष है। योग! मूर्खो की मति का भ्रम! अथवा स्वप्न दृष्टाओं का इन्द्रधनुषी ताना बाना। इतनी ही शक्ति है कृष्ण के योग में तो बचा क्यो नही लेता हस्तिनापुर को अपनी शक्ति से? इतनी ही योग शक्ति है कृष्ण में तो पाँच पांडव क्यो भटकते रहते है। हर बार शकुनी के हाथ जीत लगी है, और अब तो शकुनी की जीत अपनी चरम सीमा पर है। कुटिल शकुनी कृष्ण की काट सोचता ही जा रहा है। इन्द्रप्रस्थ के राजप्रासादों में वह कृष्ण को नीचा दिखा सकता था, पूरी तयारी हो चुकी थी परन्तु स्वयं कृष्ण ने झूठे बर्तन धोने का कर्म हाथो में लेकर स्वयं को ऐसा महापुरुष सिद्ध किया की शकुनी को भी कोई काट नही सूझी। और उसी मौके का फायदा कृष्ण ने उठा लिया, महाराज ध्रितराष्ट्र से राजनैतिक तौर पर स्वयम के प्रतिनिधि स्वयं महल में नियुक्त करा दिए। शकुनी जानता था ये अधिकारी कम गुप्तचर अधिक थे। कृष्ण को राजप्रासादों के क्षण क्षण की सुचना रहती थी।
दुर्योधन के मित्र व बहनोई जरासंध, दुशाला का पति मथुरा को अग्नि के सुपुर्द कर आया था, इस कृष्ण की उसने जान ही ले ली होती यदि यह ग्वाला उस रणभूमि से भाग न खड़ा होता। चोर। चोरी से दबे पाव अपनी जनता को संग ले कर दुष्ट द्वारिका में जा बसा। और अब देखते ही देखते सम्पूर्ण समुद्र, बेशकीमती समुद्री खजाने, वनस्पति, मत्स्य, मणि-मानिक इत्यादि इस अकेले कृष्ण के अधीन है। द्वारिका के aishwary की कहानिया सम्पूर्ण जम्बुद्वीप में बच्चे बच्चे के मुख पर है। और इन सबका महानायक है यह ग्रामीण, ग्वाला, कृष्ण। uh ! कैसे कैसे लोग राजनीति में है। ग्वाले, चोर!
इससे पहले की शकुनी कृष्ण की और अधिक तारीफे सोचता, महाराज ध्रितराष्ट्र का शकुनी के लिए बुलावा आ पंहुचा।

1 comments:

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

यह शोक का दिन नहीं,
यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
यह युद्ध का आरंभ है,
भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
हमला हुआ है।
समूचा भारत और भारत-वासी
हमलावरों के विरुद्ध
युद्ध पर हैं।
तब तक युद्ध पर हैं,
जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
हासिल नहीं कर ली जाती
अंतिम विजय ।
जब युद्ध होता है
तब ड्यूटी पर होता है
पूरा देश ।
ड्यूटी में होता है
न कोई शोक और
न ही कोई हर्ष।
बस होता है अहसास
अपने कर्तव्य का।
यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
वास्तविकता है।
देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
एक कवि, एक चित्रकार,
एक संवेदनशील व्यक्तित्व
विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
लेकिन कहीं कोई शोक नही,
हम नहीं मना सकते शोक
कोई भी शोक
हम युद्ध पर हैं,
हम ड्यूटी पर हैं।
युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
कोई मुसलमान नहीं है,
कोई मराठी, राजस्थानी,
बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
हमारे अंदर बसे इन सभी
सज्जनों/दुर्जनों को
कत्ल कर दिया गया है।
हमें वक्त नहीं है
शोक का।
हम सिर्फ भारतीय हैं, और
युद्ध के मोर्चे पर हैं
तब तक हैं जब तक
विजय प्राप्त नहीं कर लेते
आतंकवाद पर।
एक बार जीत लें, युद्ध
विजय प्राप्त कर लें
शत्रु पर।
फिर देखेंगे
कौन बचा है? और
खेत रहा है कौन ?
कौन कौन इस बीच
कभी न आने के लिए चला गया
जीवन यात्रा छोड़ कर।
हम तभी याद करेंगे
हमारे शहीदों को,
हम तभी याद करेंगे
अपने बिछुड़ों को।
तभी मना लेंगे हम शोक,
एक साथ
विजय की खुशी के साथ।
याद रहे एक भी आंसू
छलके नहीं आँख से, तब तक
जब तक जारी है युद्ध।
आंसू जो गिरा एक भी, तो
शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।
इसे कविता न समझें
यह कविता नहीं,
बयान है युद्ध की घोषणा का
युद्ध में कविता नहीं होती।
चिपकाया जाए इसे
हर चौराहा, नुक्कड़ पर
मोहल्ला और हर खंबे पर
हर ब्लाग पर
हर एक ब्लाग पर।
- कविता वाचक्नवी
साभार इस कविता को इस निवेदन के साथ कि मान्धाता सिंह के इन विचारों को आप भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचकर ब्लॉग की एकता को देश की एकता बना दे.