Sunday, November 23, 2008

सृष्टि

परमेश्वर क्या होता है? विराट रूप क्या होता है?
क्या ये हम ही नही होते है जब अपने अदने से कद से ऊपर ऊपर उठने का प्रयास करते है?
कोई भौतिक वस्तु अथवा भौतिक पदार्थ की लिप्सा अंतर्मन को भीतर से खोखला करने लगती है तब एक ज्योति जागृत होती है स्वयं में से ही जो समस्त अंधकार को चीरने की क्षमता रखती है। तब अनुभूति होती है इस विशाल ब्रहमांड की जो फैला हुआ है निर्विकार तक।

तब मै उठने लगता हु। मेरा आकार बढ़ने लगता है। मेरी आकंक्षाये छोटीहोती जाती है, मेरा घनत्व बढ़ता जाता है। मेरा रूप देख कर कर समस्त विश्व आश्चर्यचकित हो जाता है। मै लड़ता हूँ स्वयं से और लड़ता जाता हूँ, मेरी मानस शक्ति बढती जाती है। मेरा शक्ति पुंज विस्तृत होता जाता है और समस्त जगत का मै एक विराट परम परमेश्वर रूप प्रकट हो जाता हु।

आज श्री कृष्ण गहन विचार मग्न थे।

द्वारिकाधीश सवेरे से ही कुछ अनमने से अपने विचारों में लीन थे। बुआ कुंती की ओर से हस्तिनापुर की खबर ख़बर कम अपशगुन अधिक लग रही है।

आज द्रौपदी का अपमान हुआ था। हस्तिनापुर नरेश ध्रितराष्ट्र की पुत्रवधू का अपमान।

किसने किया यह शर्मनाक कर्म?

स्वयं नरेश पुत्र राजकुमार दुर्योधन ने।

क्यो किया?

राजकुमारी को पाने की विषैली महार्वाकंक्षा के तीर ने दृष्टिहीन बना दिया है। सम्राट तो है ही दृष्टिहीन। चटोरे चालाक शकुनी के नयनो से राजकाज सत्ता संभालेंगे तो पुत्रवधू क्या पुत्री भी दिखाई नही देगी।

द्रौपदी परम सुंदरी है। ओज तेजस्व की साक्षात् अग्नि रूपा मूर्ति। क्षत्राणी है । दूत संदेश लाया है की परम ओजस्वी राजकुमारी ने अपने केश खुले छोड़ दिए है। दुशासन के रक्त से धोने की कसम खायी है।

दुशासन। यह दुशासन मेरे ही सामने पला, बढ़ा, कब इसकी उच्च्न्ख्लता इतनी बढ़ गई की राजपुत्री पर झपट बैठा?

वासना धर्मांध क्यो होती है? लिप्सा लोलुपता राजपुत्रो को हीनतम शुद्रो से भी हीन स्तर पर गिरा देती है। कौन सी नज़र से आज के बाद इतिहास दुर्योधन को देखने वाला है?

और भीष्म पितामह ? वे क्या कर रहे थे? चुपचाप हाथ बांधे दृष्टि नीचे झुकाए ज़मीन देख रहे थे? कहा गई वीरता? एक नारी का अपमान कोई बड़ी बात नही है। यहाँ इतना गोरखधंधा चलता है, ये एक और सही। क्या जाता है? किसका क्या जाता है? कहा है पंचाल नरेश स्वयं राजकुमारी के पिता? दामादों को हाथ से धोने के डर से बैठे होंगे अपने रेशमी पलंगो पर महलों में कैद होकर?

जितना बड़ा सम्राट उतनी ही क्षुद्र दृष्टि।

कृष्ण का मस्तक धधक रहा था। हृदय पीड़ा से व्याकुल होने लगा था। राधे को प्रेम किया था उन्होंने। राधे का रोम रोम स्वयं कृष्ण के प्रेम से दीयों की तरह जलता था। परन्तु राधे को इस दृष्टि से देखना दूर वे ऐसा दुस्साहस कभी नही कर पाए। कर भी नही पाएंगे। जब वह है ही उनकी। अपनी अंतरात्मा से भी कभी कोई जोर जबरदस्ती होती है क्या?

लालच, प्रेम नही जान सकता। नारीदेह पुरूष के अन्तर के जानवर को जगा देती है कोई नई बात नही है परन्तु वह नारी क्या चाहती है उसका कोई मोल नही?

पिता ने गौना कर भेज दिया ससुराल में, अब चाहे उसके टुकड़े टुकड़े हो जाए, या गली के कुत्ते नोच खाए, वह पड़ी रहेगी अपने परम परमेश्वर पति के भरोसे। ऐसा पति जो उसे जुए में हार जाता है। स्वयं को दाव पर लगाने के पश्चात।

यह नारी है। अधीन, परातंत्र पति की अर्धांगिनी। वह पति जो स्वयं की रक्षा नही कर सकता, जो स्वयं के अधिकारों की रक्षा नही कर सकता उस नारी का क्या करेगा जिसे पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर घर में लाया है। और वह नारी कहा जायेगी जब उसका अपना ससुराल उसे वेश्या बुलाये। जब घर के जेठ देवर उसकी स्वयं की देह को हाट बनाने बैठ जाए।

कृष्ण चतुर है। पहले इन्द्रप्रस्थ के अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने द्वारीकधीश की ओर से राजमहल में राजाधिकारी छोड़ दिए थे। कदाचित जब द्रौपदी ने विवश हो कर हे कृष्ण हे कृष्ण पुकारा होगा, स्वयं द्वारिका के राजदूत व् राजाधिकारी कृष्ण की ओर से प्रस्तुत हो गए थे। दुश्शासन का दुस्साहस धरा का धरा रह गया। चक्कर खा कर गिर पड़ा, सवेरे से सम्पूर्ण ग्रामीण द्वारिका व् हस्तिनापुर में यही चर्चा है की कृष्ण ने द्रौपदी का चीर बढ़ा दिया है।

कृष्ण अन्तर्यामी है, कृष्ण परम परमेश्वर है।

कृष्ण एक ठंडी निश्वास के साथ उठ खड़े हुए।

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