कृष्ण स्वयं को सहेज नही प् रहे थे। कल तक वे एक नंदकिशोर गोपालक हुआ करते थे और आज वे यदु वंश की नींव का पत्थर बनने जा रहे थे। अत्यन्त नाटकीयता से कंस का वध तो हुआ परन्तु सभी जानते है कि यह एक पूर्वनियोजित योजना थी।
पिता वासुदेव एक जर्जर कंकाल हो चुके थे, राजा उग्रसेन अत्यन्त वृद्ध। बलराम रोहिणी का पुत्र था अतः उग्रसेन का उत्तराधिकारी घोषित नही किया गया, सभी कि नज़र किशोर कृष्ण पर ही टिकी थी।
महल अत्यन्त वैभवशाली व भव्य था। दास दासी, तोरण, भव्य कक्ष, अद्भुत विहार, क्रिराग्रह, सभी मन मोहक था। इतनी चहल पहल में कान्हा का कही अस्तित्व मिट सा गया था।
'प्रणाम वासुदेव'। कृष्ण चौक गए।
पल भर पहले वे माँ यशोदा की फटकार, राधा के झूठे क्रोध को मन ही मन में सहेजे जा रहे थे। यहाँ सब नया है। यहाँ माँ नही है। राधे नही है। क्या सोचती होगी राधा। यही कि कृष्ण ने उससे छल किया है।
वह गाव की निर्मल, अबोध क्या जाने साम्राज्य, समाज, और डूबते हुए यदुवंश के सूर्य को। कंस ने नीतियों के साथ ही साथ मथुरा के कोशो को भी खोखला कर दिया है। एक सूत्रधार कही से मिल जाए इस वंश को। और कृष्ण जानते है वे अकेले है इस साम्राज्य के योग्य उत्तराधिकारी। परन्तु अब कृष्ण कंस की नीतियों को नही दोहराएंगे। मथुरावासियों को आदत सी हो गई है अपमान और अराजकता सहने कि। एक कृष्ण को नायक का रूप लेना पड़ा।
कितने लोग समझ पाएंगे इस पीड़ा को कि कृष्ण और साम्राज्यवाद के बीच कांह कही खो गया है। नयन रोयेंगे पर छु प कर। कभी सम्राट भी रोता है भला। राधा का क़र्ज़ नही चुका पाएंगे। उसके अनमोल प्रेम कि कीमत नही दे पाएंगे। उसके खाली आँचल को कभी नही भर पाएंगे।
कितना छोटा हो गया है इतना बड़ा साम्राज्य एक भोली राधा के सामने।
कहा से शक्ति आती hai राधा में। उसे देख कर कृष्ण सहेजते है स्वयं को। विष का यह प्याला पीना पड़ेगा कांह को। राधा विवाहित है। उसके पति को कंस ने ही जीविका दी थी और अब वह कृष्ण का सेवक होगा। राधे ने कभी उसे पति नही माना। परन्तु क्या करती विवश थी पिता और माता के समक्ष। प्रेम का एहसास हुआ भी तो देर से । ब्याह के मायने तक नही जानती थी परन्तु किशोरी होने के नाते पिता ने गौना नही किया। किशोर व् य व् किशोर मन क्या जाने ये बाते समाज कि। आज कृष्ण जान पाए मन के अथाह विश्मंथं को। विष है कि गले तक भर आया है। कृष्ण का राजतिलक हो रहा है पर नेत्र रो नही सकते। कैसे रोयेंगे इस जर्जर टूटे हुए समाज के क्षीण ढांचे पर। राधा तुम जलो, में जलूँगा। यह अग्नि परीक्षा देनी होगी। यह आहुति देनी होगी। कृष्ण को नींव का पत्थर बनना पड़ेगा। बांसुरी छोड़ आए है कृष्ण राधे कि झोली में। अब कृष्ण केवल रणनीति अपनाएंगे। बनाना पड़ेगा कृष्ण को महानायक। अन्तर का कांह कही दूर हंस रहा था, देखो ये कृष्ण है जिसे लोग इश्वर कहते है। कितना एकाकी, कितना अधूरा, कांह ...... या कृष्ण?
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1 comments:
ये ब्लॉग समीक्षाधीन क्यों है भई?
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