Sunday, October 12, 2008

प्रेम सुध बुध भुलाता है; सुना था. आज देखा अपनी आँखों से, महसूस किया इस हृदय से. राधे को जमुना तीरे देख हर कोई ठिठक कर वही खड़ा रह जाता है. बावरिया स्वयं को कान्हा कहती है. बांसुरी को है की छोड़ती नही. प्रेम की ये महिमा समझ नही आती. कोई क्षुधा हो तो भोग कर शांत कर ले पर प्रेम को क्या चाहिए. तन जब मेरा है तो आत्मा उसकी तो नही आ जायेगी मुझ में. परन्तु राधे के साथ येही हो रहा है. केवल तन उसका है मन कान्हा की छवि से झिलमिला रहा है. आँखे उसकी स्वयं की नही रह गई है; देखती है तो लगता है कान्हा ही देख रहा है..नेत्रों से पानी की धारा बह रही है परन्तु आँखों में फिर भी कही कांह की रहस्यमयी मुस्कान छिपी है. मन पीड़ा से बिलख रहा है परन्तु कही गहरे में जैसे राधे इस संसार से पार हो गई है. नेत्र मूँद कर बैठे तो पीड़ा भी नही है. सब कुछ कान्हमय हो गया है. जैसे कोई साँस रोके सागर के तल में चुपचाप बैठ जाता है. . राधे स्वयं से ही क्रोधित हो जाती है तो स्वयं ही कृष्ण बन कर मना लेती है. कौन समझाए अ री कुछ नही धरा ये सब में. राधे जमुना देखे तो लहरों में कान्हा की ही छवि है, मटका देखे तो हंसने लगती है जैसे अभी अभी छलिया कंकर से मटका फोड़ ने की फिराक में हो. माटी में बैठे तो जैसे कान्हा के दामन से लिपट कर बैठी हो या फूलमाला सी कान्हा के गले में झूल रही हो. कभी कभी राधे को यू भी भान होता है की मधुबन के वृक्षो की डालियों से लटके हुए झूलो में कान्हा ही झूल रहा है और रह रह कर उसे बुला रहा है राधे आ जा हिडोले में झोके लेंगे. कानो से लग कर बहने वाली हवा कान्हा का नाम ले ले कर पुकार रही है. कृष्ण की कभी न रुकने वाली सृष्टि में राधा वह सूर्य बन चुकी थी जो केवल जलना जानता था, बुझना नही. कृष्ण की राजनैतिक चहल पहल में अनजान बेखबर राधे कृष्ण में सिमट कर ब्रह्माण्ड को जैसे चुनौती दे रही थी. प्रेम की महिमा कोई न जान ,,पाया जिसने जानी अग्निपरीक्षा का पात्र बना!

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