मनुष्य का अस्तित्व क्यो है? महत्वाकंक्षाओ की गलियों में भटकने के सिवा, और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की आकांक्षाओ के सिवा क्या इस इतनी बड़ी सृष्टि का कोई और भी अर्थ है?
भूख लगी तो अन्न उपजाया, श्रेष्टतम दिखने की तमन्ना जागी तो सूत से लेकर रेशम तक के वस्त्र धारण कर लिए, तन बेचैन हुआ तो स्त्री ले आया, पुत्र, पुत्री, व्यवसाय, न जाने क्या क्या पसारा। इस कभी न रुकने वाली, कभी न थकने वाली दौड़ में मनुष्य अंधाधुन्द दौड़ लगाताहै, किंतु किसलिए, मृत्यु के वश में हो जाने के लिए।
अनंत कुबेर राशीपरम सुन्दरियों का सहवास, आलिशान महल, गगनचुम्बी सफलता जाने किस नशे में मानव चूर रहता है । किसलिए? मृत्यु अवश्यम्भावी है। जो आया है जाएगा। बारिश की बूंदे है कब तक रहेंगी, ओझल हो जाएँगी फिर आसमान में।
क्या सोचकर मानव इतना फसाद करता है। चोरी, डाका, जंजाल, केवल अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाने के लिए। कितना पा पाताहै सब कुछ पा कर भी। क्या सचमुच पा पाता है?
कौन सी अनुभूति, उसके अतृप्त ह्रदय, असंतुष्ट मन को तृप्ति का एहसास दिला पायेगी?
संस्कृति की सीडिया लम्बी होती जा रही है और मानवता का कद छोटा।
मन क्यो चंचल रहता है? क्या था वो जिसने कंस को नन्हे नन्हे बाल शिशुओ का वध करने की प्रेरणा दी? क्या कमी थी? कौन सी महत्वाकांक्षा कब किसे कौन से सोपान पर ले जा पाई है?
कौन सी इच्छा पूरी होकर सदा के लिए तृप्ति की गोद में सो जाती है? क्या मानव स्वाभाव यह नही है की एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी की तलाश में निकल पड़ जाता है? फिर तीसरी, फिर और.... फिर और...... इस दौड़ में एक साँस लेने का भी अवकाश ले पाता है वह?
अकेले आए है, जाना भी अकेले है। आज यह तेरा है, कल मेरा होगा, फिर किसी और का हो जाएगा, फिर यह अतृप्त आत्माएं कितना भी भटके इनकी क्या गति हो सकती है? कोई कितने जन्म ले सकता है? क्या कोई अंत नही इस जनम-मरण के हिसाब का? कोई किस हद तक अपनी ज़रूरतों का गुलाम रह सकता है? क्या इतना कमज़ोर है मनुष्य? क्या इतना नश्वर?
कृष्ण जितना सोचते उतनी ही उनकी प्रश्नों की संख्या बढती जाती। वे हिसाब नही लगा पा रहे थे की मानव जनित इस कुसमाज की जड़ो को कहा से सुधार जाए? और कितने कृष्ण चाहिए इस ब्रह्माण्ड को एक रहने का स्थल बनाने के लिए? और कितने कृष्ण?
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2 comments:
अच्छा चिन्तन किया है।अध्यात्म सीढी पर चढना यही से शुरू होता है।जारी रहे।
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