कृष्ण की कर्मभूमि में राधा धूल बन कर समाहित हो गई। बांसुरी का स्थान लिया सुदर्शन चक्र ने जो गुरु संदीपनी द्वारा भेंट किया गया था। ब्रह्मचर्य की अवधि पूर्ण कर युवा कृष्ण भारतवर्ष का इतिहास लिखने चल पड़े थे। अब स्मृति की छूटीहुई गलियों में वे झांक कर भी क्या करते? मस्तिष्क, तन, मन, सर्वथा नए वर्षो के साथ साथ नया युवा रूप ले रहा था। अब दामन थामने वाला कांह कही खो चुका था। वो कांह खो चुका था जिसके नयनो से प्रेम छलक जाता था। तपोभूमि में कृष्ण तपकर रणभूमि का बांका योद्धा बन चुका था। यशोदा माँ के द्वारा रगरग में भरा हुआ दुग्ध लाल क्षत्रिय रुधिर में बदल चुका था। कृष्ण की एक दृष्टि काफ़ी थी शत्रु की नींद उड़ने के लिए। जहा दृष्टि का काम नही वहा मोहक मुस्कान ब्रह्मास्त्र था। यह कृष्ण वह कृष्ण नही था जो गोकुल छोड़ आया था। यह कृष्ण तो जैसे एक धधकता हुआ ज्वालामुखी था जो सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, चौसर, चतुराई, जैसी हर चिंगारी को स्वयं के वश में किए हुए था। क्यो कृष्ण ने स्वयं को इतना बदल दिया था? कदाचित प्रिया का विछोह एक हार थी जो स्वीकार्य नही थी। प्रेम का उन्माद कृष्ण से अब कोसो दूर था। भारतवर्ष ने एक इश्वर को जन्म दिया परन्तु उसकी प्रिया उससे क्यो हर ली गई थी? कौन जाने उस मनमोहक मुस्कान का अर्थ यही रहता हो की हे जनमानस मैंने तुम्हारे लिए जन्म लिया है परन्तु मेरे लिए किसने जन्म लिया है? उस विराट रुपी परम परमेश्वर के पीछे यदि कही ध्यान सहेज कर देखो तो बांसुरी मिलेगी जो जमुना तट पर अकेली पड़ी थी। स्मृतिया धोखा नही देती, उन्हें सिखाया जाता है की हे स्मृति अब तुम यहाँ आना बंद कर दो। उनके लिए द्वार बंद किए जाते है परन्तु मन है की अनजाने ही दस्तक दे जाता है। और वे फिर-फिर स्वयं को वे इस भूल के लिए क्षमा नही कर सकते। वह क्या था जो कृष्ण को भारतवर्ष के सर्वाधिक भीषण रक्तरंजित रणक्षेत्र की तरफ आकर्षित कर रहा था। क्या वह क्रोध था जो हर प्रेमी को उसकी प्रेमिका की जुदाई के फलस्वरूप मिलता है? विष, हलाहल, पी पी कर कृष्ण सावरे हो चुके थे। सावरे क्या वे तो साक्षात कृष्ण ही हो चुके थे।
आने वाला समय अब इस योद्धा का साक्षी था। कृष्ण यज्ञ की एक आहुति हो चुके थे। न केवल उनमे आग थी, चिंगारी थी, वरन धू धू कर जलने के लिए अब तैयार थी भारतवर्ष की राजनैतिक पृष्ठभूमि।
इस सुर्ख रक्त के लाल रंग के मध्य गुलाबी राधा कही दूर विलूप्त्प्राया थी। पांचजन्य शंख ने फिर कभी बांसुरी को होठो से लगने का अवसर प्रदान नही किया। कदाचित विरह अग्नि रूप ले चुका था और राधा उस अग्निकुंड की समिधा हो चुकी थी। सुशुप्त स्नेहल प्रेम ने कृष्ण को पीला पीताम्बर तो पहनाया परन्तु स्वयं कृष्ण को बर्फ सा जर्द कर दिया था। वे प्रतिष्ठित चक्रवर्ती सम्राट थे जिनके हृदय का दीप अब एक हवनकुंड बन चुका था या फिर धू धू कर जलने वाली मशाल जो जितनीरोशन होती उतनी ही जलती जाती भस्म होने तक, भस्म करने तक ।
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