Sunday, October 12, 2008

"पीड़ा की झोली में प्रीतम कर डाला तुमने अर्पित,
तप-तप कर, जल-जल कर प्रीतम,
तीव्र हो गई मेरी प्रीत!"
पुरे उफान से बहती हुई जमुना के शांत तीर पर राधा समाधिस्त है । प्रेम ने उसे जोगन बना दिया है। रात, दिन, राधे को केवल कान्हा का ही रूप दीखता है। राधे की माता ने रो रो कर सारा वृन्दावन सर पर उठा रखा है। वैद्य को बुलाया गया है। सभी कहते है राधे बावरी हो गई है। ये लक्षण शुभ नही है। राधे को किसी उच्चतम वैद्य को दिखलाना ही चाहिए। राधे ग्राम्प्रमुख की पुत्री थी। माता-पिता को राधे की चिंता खाक किए जा रही थी। पिता उठाते बैठते केवल यही कहते इश्वर किसी को पुत्री का पिता न बनाये। माता दिन रात भाग्य को कोसने लगी। हे इश्वर ये मेरी पुत्री को कौन टोना टोटका कर गया। मेरी पुत्री तो ऐसी न थी। सखिया राधे को मनाती तो किस तरह। कही से कृष्ण आ जाए। कान्हा ऐसे कैसे निठुर हो सकता है। प्रेम नही समझता तो न समझे परन्तु मनुष्यता तो जानता ही होगा।
येही होता है, येही होता आया है, समृद्धि शाली कृष्ण अब ग्राम क्यो आने लगा?अ री वह तो छोटो थो पर राधे उससे पाँच वर्ष बड़ी, नारी है, लज्जा नही आई छोकरे से नयन लडाते समय! जितने मुह उतनी बाते। कोई राधे को देख रो पड़ता तो कोई मुह बनाकर बगल से निकल जाता। कदाचित इस सृष्टि में जितना प्रेम बदनाम है कोई दूसरीचीज़ नही, आकर्षण भी नही!
सोने-चांदी से लदे बड़े बड़े राजे महाराजे नव्यौव्नाओ को उठा लाये तो बड़प्पन, और यदि एक भोला मन किसी को मन में बिठा ले तो मच जाता है तमाशा। कौतुहल का विषय हो जाता है। हर किसी को चिंता है राधे का क्या होगा? कोई सहानुभूतिवश , तो कोई आलोचक बन कर राधे की माता को पट्टी पड़ता ही रहता है।
इन सबसे अनजान, बेखबर राधे स्वयं को कान्हा मानने लगी है। बांसुरी हाथो में थम रात्रि भर बजाती है, की यशोदा को भी कृष्ण का भान होने लगा है। आँचल में मुह छिपा कर सिसक सिसक रोने के सिवा वह कर भी क्या सकती है?
कान्हा था ही एसा।

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