Saturday, October 11, 2008
कान्हा से कृष्ण
"राजकुमारों की शिक्षा का प्रबंध किया जाए। कृष्ण व् बलराम गुरु सांदीपनी के अंतर्गत ज्ञान प्राप्त करेंगे।" सभी वरिष्ठ अधिकारीयों व् मंत्रियो की यही मंत्रणा थी। क्योंकि कृष्ण का कैशोर्य ग्रामीण शैली का था अतः राजसिक प्रशिक्षण आवश्यक था। परन्तु उद्धव, नन्द, व् वासुदेव जानते थे की कृष्ण प्रशिक्षित था। वह अद्भुत बालक था। क्यो न कहलाये अद्भुत , यदु वंश का उत्तराधिकारी था। पिता वासुदेव के मित्र नन्द बाबा ने कृष्ण का प्रशिक्षण बलाकावस्था में ही प्रारम्भ कर दिया था। तभी तो बलाकावस्था में भी कृष्ण कंस के सभी प्रयासों को विफल कर पाया। कृष्ण की मोहिनी मुस्कान सभी के लिए आश्चर्य का कारन हुआ करती थी परन्तु कृष्ण स्वयं में बहुत कुछ छुपाया करते थे। अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना उन्होंने चुने हुए यदु नायको से सीखा था जो लम्बी अवधि से कंस के अंत की प्रतीक्षा कर रहे थे। आज मथुरा कही से भी सुरक्षित नही थी। एक अन्तराल के बाद राजकुमारों की वापसी हुई थी जिसके लिए बड़े बड़े महानायकों ने सूक्ष्मता व् गंभीरता से कंस का सामना किया था। कूटनीति व् राजनीती दोनों का ही अभ्यास अब कृष्ण व् बलराम को करना होगा। यदु वंश इन दोनों के हाथ में है। पिता वासुदेव जानते थे इस छोटे से साम्राज्य में महत्वकांक्षी नायको की कमी नही है जिन्हें देशभक्ति से अधिक केवल सत्ता लोलुपता ही अधिक आकर्षित करती है। कृष्ण का इन लोगो में उठाना बैठना होगा। सात्यकी जैसे कई वरिष्ठ नायक है जो दम्भी व् उद्दंड है। कृष्ण व य में छोटा है परन्तु अब उसे राजा बनाना है। शस्त्रीकरण, अध्यात्म, विज्ञानं, वाणिज्य व् गणित सभी में कृष्ण का प्रशिश्क्षण आवश्यक है। हा केवल एक प्रशिश्क्षण देने की आवश्यकता नही है संगीत व् नृत्य। 'हा हा गोकुल वृन्दावन में येही तो प्रशिश्क्षण होता था' बलराम की टिपण्णी से सभासदों के मुख पर बरबस मुस्कान खीच आई। केवल कृष्ण टेढी भोहो से बलराम को ताकता रहा। पिता वासुदेव हंस पड़े व् राजकुमारों के प्रस्थान की तयारी में लग गए।
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