Thursday, October 9, 2008

कृष्ण सोचते ही जा रहे थे। राजमहल की औपचारिक चहल-पहल जैसे उन्हें छु भी नही पा रही थी। अब वे क्या करे? वे सबके साथ न्याय करेंगे। विश्वसनीय मित्र उद्धव के साथ। पिता वासुदेव के साथ। माता देवकी के साथ। इस संपूर्ण जम्बुद्वीप के साथ। राधा के साथ? क्या दोष है उसका? राधा का हृदय पुकार पुकार कर उन्हें विचलित कर रहा था। मति सुन्न पड़ती जा रही थी। विवाहित है तो क्या हुआ? वे राजा से भी अधिक महत्वपूर्ण स्थान पर है। पल भर में राधे को वृन्दावन से उठा कर राजमहल में अपनी छत्रछाया में ले लेंगे। परन्तु इसका जनसमूह पर क्या असर पड़ेगा? विरोध से नही डरते कृष्ण। क्यो नही ला सकते वे राधे को यहाँ?
नही ला सकते। अभी समस्त द्वीप पर इस सत्ता का बिगुल बजना बाकि है और पहले ही कृष्ण जनमानस के ह्रदय में आक्रोश नही पैदा कर सकते। उन्हें याद है राधा के माता पिता ने कभी उसका कृष्ण से मिलना स्वीकार नही किया था। ग्राम ने भी कभी उनके रास को मान्यता नही दी थी। कृष्ण समझ नही पा रहे थे अंततः वे स्वयं से व सभी से इतना संघर्ष क्यो कर रहे है? उनका पदार्पण मथुरा के राजमहल में लोकहित वश हुआ है। तो क्या कांह का कोई अस्तित्व नही? क्या कांह का होना अनैतिक है? क्या कोई प्रेम नही कर सकता? नीतिनुसार, सामाजिक मान्यतानुसार यदि विवाह किया तो ठीक नही तो सब ग़लत है। ये कहा का न्याय है? क्या विवाह प्रेम समन्धित नही होना चाहिएऔर यदि एसा नही होता तो विवाह होना ही क्यो चाहिए?
तभी निष्ठुर हृदय की एक प्रताड़ना ने कृष्ण को चेताया "हे कृष्ण वासुदेव " आप यदु वंश के नायक घोषित किए गए है। चीत्कार आपको शोभा नही देता। आपकी कर्मभूमि आपको विह्वल हो पुकार रही है।
कर्मभूमि! हाँ। व्यक्ग्तिगत भोग, व्यक्तिगत प्रेम, व्यक्तिगत सुख कदाचित सामाजिक कर्तव्यों से अधिक महत्वपूर्ण नही हो सकता।
कृष्ण ने स्वयं को संयंत किया। ब्रहाम्मुहूर्त हो चला था। रात्रि आँखों ही आँखों में कटी थी। संपूर्ण रात्री, शय्या कंटक पूर्ण थी। कहा दिन भर गैया चरा कर, गोपियों संग ठिठोलिया कर राधा को सता कर वे , रात्रि भर बांसूरी बजा कर राधे को बेचैन करते और कहा अब रेशमी शयन कक्ष में वे करवट बदल रहे है।
भोर का सूर्य ॐ नमन से आरम्भ हुआ। राजमहल के भीतर अत्यधिक कुशलतापूर्वक निर्मित किए हुए नील सरोवर में वे स्नान करने उतर पड़े। सुंदर कमल सूर्य देव को नमस्कार कर रहे थे। कृष्ण ने नयन मूँद लिए व बेसुध सरोवर की गहराईयों में उतरते चले गए। मस्तिष्क पटल पर सूर्य के प्रकाश की आभा जगमगा रही थी।
'जमुना का पानी भी गहरा है। काला है कृष्ण की तरह।' पक्षी के कलोहल से जग पड़े वे। तैर कर ऊपर आए तो देखा एक हंसिनी उड़ गई थी, हंस अकेले सरोवर में क्रंदन कर रहा था। कृष्ण बेबस उसे देखते रहे।
"मथुरा नरेश ने संदेश दिया है महाराज की आप व बड़े भ्राता मल्ल युध्ध क्रीडा के लिए आ जाए। " उद्धव ने झुक कर संदेश दिया।

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