Wednesday, October 1, 2008

गोधुली के क्षण बीतते जा रहे थे। राधा अब भी जमुना के तीर बैठी श्याम की बांसूरी हाथो में लिए दूर कही खोयी हुयी थी। धुंधलका गहन हो चला था। और संग ही धुंधली होती जा रही थी कांह की वापसी के आस। काहे राधे, नयन खोये जा रही है। अरी दुष्ट था वो।
कान्हा कह के गया था राधे अब भेट हो न हो। मथुरा जा रहा हू। गुप्तचर की सुचना के अंतर्गत अब समय हो गया है कृष्ण के चलने का।
कृष्ण, राजपुरुष? गुप्तचर? कृष्ण कब से मथुरा की राजगद्दी का स्वामी हो गया? वो तो ग्वाला है। उसके मन-दर्पण का स्वामी। मेरा भोला नादाँ कान्हा मथुरा के कंस का अंत कैसे करेगा?
राधे को चक्कर आ रहा था। थक कर जमुना तीरे आ बैठी।
अश्रुओं की धारा रुकने का नाम नही ले रही थी।
रातो रात कृष्ण को मथुरा की राजनैतिक चहल पहल की भनक नही लग सकती। वह जानता था ये सब। फिर राधा को अंधेरे में क्यो रखा गया? क्या ये राजनीती ऐसी ही होती है? प्रेम, निष्ठां, दर्द का कोई अस्तित्व नही?
राधा अब एक ग्वालन है और कृष्ण एक राजपुरुष। अब उसका और राधा का क्या मेल? कौन जाने कांह लौटेगा भी या नही। अब तो उसका एक रानीवास होगा। यहाँ गोकुल में वह गोपियों को भी फटकने नही देती थी अब मथुरा के महलों से क्या ताल मेल?
जलन, मोह, विरह, मिल कर राधा को जैसे नश्तर चुभा रहे थे। कांह ने राधे से प्रेम का नाट्य रचा था अन्यथा कोई ऐसे जाता है भला?

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