नारी स्वाधीन है। अपने आप में निर्मित एक परम सत्ता। वह एक ऐसी उ च्छन्खल नदी है जो किलोल करती हुई ऊंचे-ऊंचे पर्वतो में रास्ता बना लेती है। बंधा होता है पुरूष। अपने दायित्वों से। पुरूष भारी भारी bediyon में jakda हुआ धर्म का परचम लिए चलता है। अधीन होकर swadheenta का पुजारी कैसे हो सकता है vo? नारी स्वयं में स्थित एक सत्ता है। साक्षात प्रकृति।
प्रेम किया तो किया। समर्पण किया तो किया। अब कौन पूछेगा राधे से के क्या कर रही हो? कितनी अबोध हो? उससेप्रेम करती हो जो तुम्हे याद भी नही करता? परन्तु राधा अब नारी कहा है? वह तो एक परम सत्ता है जिसपर कृष्ण का निवास है। अपने आप में एक ब्रह्माण्ड जो कृष्ण के नाम से उद्दीप्त है। कौन दृष्टता करेगा ये पूछने की के यह नैतिक है या अनैतिक?
कौन जुर्रत करेगा उस ज़मीन पर पैर रखने की जो चिंगारियां उगलती हो परन्तु अपने वक्षस्थल से शीतल प्रेम के उदगार बहाती हो। राधे वह बहता हुआ स्त्रोत है जो कृष्ण रुपी शिला को हर पल कण कण में बदल देता है। कृष्ण विवश है उस वेग में बहने को परन्तु साथ ही बंधे हुए है दायित्व व् धर्म रुपी बंदरगाहों से। राधे की उर्जा उन्हें हर पल एक शिला से एक महीन कण में बदल देती है और वे फिर बड़े यत्न से सभा में स्वयं को एकत्रित कर लोगो के समक्ष प्रस्तुत करते है। तमाम कार्यो के मध्य किसी कोने में राधे जलती रहती है किसी मद्धिम दीप की तरह। समझ नही पाते है वे की ऊंचे और ऊंचे उठते जा रहे है वे या अपनी ही प्रेम पिपासा के मरुथल में भटकते जा रहे है। राधे से क्या कहेंगे? एक बोल भी फूटेगा मुह से?
मयूर मुकुट धारी श्री कृष्ण याचक से भी गए बीते है जो इस समय सम्पूर्ण राज्य के स्वामी है परन्तु अपने ही हृदय के सामने निर्बल। राधे जैसे निर्झर स्त्रोत का अंश होकर भी प्यासे। राधे को धारण कर के भी वंचित। प्रेम त्याग क्यो मांगता है? कृष्ण एसा प्रेम कभी कर पाएंगे किसी से?
स्वाधीन राधे अपने कृष्ण को ह्रदय में बैठा कर मग्न हो गई है। और कृष्ण अपने संघर्ष को हृदय में छिपाए और एक तपोभूमि पर कदम रखने जा रहे है , गुरु संदीपनीके आश्रम में।
2 comments:
bahut sunder lekh
thanks Makrand.
HARYASHWA
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