Saturday, May 16, 2009

युद्ध दावानल की तरह भारत भूमि पर फ़ैल गया। वही हुआ जो श्रीकृष्ण चाहते थे। धर्म की विजय। कर्ण की महत्वाकांक्षा, द्रौपदी का दर्प, अर्जुन का मतिभ्रम, भीम का अंहकार, युधिष्ठिर की भीरुता, दुर्योधन की लिप्सा, शकुनी का कपट, भीष्म की अंधभक्ति, अश्वाथ्थामा की कुंठाए, द्रोणाचार्य का अभिमान, सभी इस युद्ध की लपटों में स्वाहा हो गया। हर वासना इस अग्नि में जल कर महत्वहीन हो गई।

हर लिप्सा समाप्त हो जाती है। सबका अंत वही होता है भस्मीभूत। सभी अनंतेव महादेव की शरण में। त्रिकाल दर्शी महाकाल की लपेट में। हर सृजन विलुप्त हो जाता है, हर क्षण एक नई सृष्टि का जन्म होता है हर क्षण एक नई मृत्यु को गले लगाने के लिए। माया अपना चरम स्वरुप दिखलाती है भस्मीभूत हो जाने के लिए, और तब यह सूक्ष्म शरीर तपता है गरम गरम आंच से जिसकी पवित्रता गंगा जैसी है, जो स्पर्धा से विहीन है और अस्तित्व रखती है इस अन्तरिक्ष में केवल स्वयं के लिए, वह केंद्रित होती है उस उज्जवल परम प्रकाशित सूर्य में विलीन हो जाने के लिए जो सूर्य फिर विलीन हो जाता है एक ऐसे प्रकाश के गह्वर में जो चिरकाल से प्रकाशमान है। जब जब अन्धकार गहन हो जाता है, अनेको शक्तिया एकजुट हो जाती है इस अंधकारमय जीव को प्रकाश का रास्ता दिखलाने।

जीवन काल एक चिता के समान है जिसमे जीव जलता है, जब जलता है तो पवित्र हो जाता है, पवित्र हो जाता है तो पिछले कर्मो से छूट जाता है, पिछले कर्मो से छूट जाता है तो नवीन रचना की ओरे उन्मुख हो जाता है क्योकि सृष्टि बनी है जन्म से, मरण से और इन सबके बीच बसी हुयी माया से।

मेरा सादर प्रणाम उस मयूर पंख धारी पुरूष को जो परा, अपरा से परिचित है, जिसने मेरे भीतर उस पवित्र अग्नि को प्रज्ज्वलित किया। जिसने मुझे हर क्षण रुलाया, मेरे भीतर की मलिनता को मेरे नयनो के आसुओ से धोया, जिसने मुझसे मेरा साक्षात्कार कराया। उस काम, अकाम, तपस्या, सौंदर्य, असौंदर्य, आदि सभी शक्तियों को मेरा प्रणाम है जो सदैव मनुष्य को आगे के पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करेगी।

युधिष्ठिर ने इतना कह कर द्रौपदी इत्यादि के साथ प्रयाण का संकल्प लिया।

HARYASHWA!

Monday, March 30, 2009

रणभूमि !

इधर कृष्ण अंगुलियों पर शत्रु गिन रहे थे। हस्तिनापुर के राजप्रासाद में टोहलेने गुप्तचर आधिकारिक तौर पर नियुक्त थे, परन्तु वहा की हवा का रुख जानने के लिए कृष्ण ने स्वयं जाना श्रेयस्कर समझा।

ख़बर आई थी की अर्जुन इन्द्र से शस्त्र लेने में सफल हो गए था। संग में पाशुपत भी अर्जुन हासिल कर चुके थे। युद्ध के लिए आवश्यक सामग्री लगभग तैयार थी। परन्तु युद्ध होने से पहले युद्धविराम की चेष्ठा आवश्यक थी।

स्वयम कृष्ण जानते थे की शान्ति सुलह की बाते यहाँ किसी की समझ आने वाली नही है। यदि ऐसा होता तो ये नौबत ही क्यो आती? परन्तु राजनीति भी आख़िर नीति है। नीति से चलना विजय पथ की ओर जाना है।

आने वाले युध्ध किन किन नीतियों की धज्जिया उड़ने वाली है उन्हें इन्सबका अंदाज़ था। अतः कृष्ण चले आए शान्ति का प्रस्ताव लेकर दृष्टिहीन ध्रितराष्ट्र व् शकुनी के राजमहल में।

अंगराज कर्ण, दुर्योधन, दुशासन, अन्य कौरव, गांधार देश के मित्र राजा, शिशुपाल, जरासंध के प्रतिनिध इत्यादि से प्रासाद खचाखच भरा हुआ था।

सभी को कौतुक द्वारिकाधीश वासुदेव श्री कृष्ण का था। सभी सर्प की भांति फन उठाये कृष्ण की बीन को सूंघते से नज़र आए। एक भय सभी को सताता था, जाने अब क्या हो इस कृष्ण की झोली में। सभी को वे राजा कम कोई जादूगर अधिक ही लगते थे। कब जाने कौन सा तमाशा खड़ा हो आए। और कृष्ण को तो जनता भी मिल जाती है तालिया बजाने के लिए। इस बीन्बजैया का तमाशा देखने आज फिर सभी हाज़िर थे।

कृष्ण ने शान्ति प्रस्ताव प्रस्तुत किया। दुर्योधननही माना। कृष्ण जानते थे यही होगा। अतैव उठ खड़े हुए। जाते जाते उन्होंने कर्ण की सरसरी दृष्टि घुमाई, और घोषणा की, सभी राज्यों के प्रतिनिधियों व् राजाओ की स्वीकृति से अब यह स्पष्ट हो गया है की युद्ध तो होना ही है। पांडवो का केवल एक ही वर्ष अज्ञातवास का रह गया है। जो समाप्त होते ही युद्ध की घोश्नाकाल निर्धारित करेगा। सभी राज्य अभी से यह निर्णय ले ले की कौन किस ओर है?

....वैसे भी समय एक दलदल समान है, जिसमे यदि कोई रथ का पहिया धंसा तो धंसता ही जाता है, अतैव में अनुरोध करूँगा की सभी सम्राट अपने पैरो की ज़मीन देख समझ कर चुने.........

कर्ण अचानक ही आसन छोड़ उठ खड़े हुए।

ये स्वर उन्होंने स्वप्न में सूना था।

तो कृष्ण आया था स्वप्न में चेतावनी देने। अर्थात सुयोधन की हार सुनिश्चित है। सभी कहते है कृष्ण जादूगर है, ये जादू कुछ समझ में नही आ रहा.....

कृष्ण जाते जाते मोहिनी मुस्कान कर्ण के भयभीत मानस पर अंकित कर चुके थे।

...इसलिए तो आए थे इतनी दूर..... शकुनी की हार सुनिश्चित करने!

Saturday, March 28, 2009

दर्पण!

उर्वशी का केवल अभिमान आहत हुआ। परन्तु अर्जुन का मन दर्पण चूर चूर हो चुका था। उर्वशी तो अप्सरा है। प्रेम करने के लिए स्वतंत्र, काम मग्न होने के लिए स्वतंत्र। स्वर्ग के उपभोगों से घिरी। उसके लिए साक्षात् इन्द्र घुटनों के बल उसके सामने झुके रहते है। वह तो फिर भी अर्जुन को भूल जायेगी। आख़िर एक मनुष्य को एक अप्सरा क्यो याद रखेगी, और रखेगी भी तो कब तक? उसे आयु, सौन्दर्य, सुख की कोई कमी नही।
परन्तु अर्जुन क्यो आहत है? काम विमुख होने से? एक सुंदर अप्सरा को खो बैठने से? नही। बात इतनी सी नही है। उस अप्सरा ने क्या विचार कर अर्जुन को एक खिलौने की उपमा दी? फिर क्या सोच कर उनकी कोमल भावनाओ के साथ खिलवाड़ किया? कोई किसी को केवल इसलिए इस्तेमाल करता है क्योकि उसे तृष्णा होती है? यदि वे पिघल जाते, यदि वे उर्वशी से संलग्न हो भी जाते, तो अर्जुन का क्या जाता?
उर्वशी कदाचित ठीक ही कह रही थी। वे अपना पुरुषत्व हस्तिनापुर ही में रख आए है। या फिर वे उसे भी चौसर में हार चुके है। अब वे प्रेम करने के काबिल ही नही रह गए है, या फिर प्रयत्न कर के भी वे प्रेम नही कर पा रहे है। कौन उन्हें रोक रहा है? कौन सा तीर ह्रदय में चुभ रहा है?
स्त्री के ज़हर बुझे शब्द अर्जुन की आत्मा को चुभो रहे थे।
तो इसलिए कृष्ण ने भेजा था यहाँ।
उर्वशी ने अनजाने ही अर्जुन को एक नए प्रकाश से अवगत करा दिया था।
उर्वशी के मारे हुए तीर ने अर्जुन के मंदार पर्वत को हिला हिला कर विष उगलने के लिए मजबूर कर दिया था। अमृत का पता नही, परन्तु इस विष को पी पी कर अर्जुन एक अनोखे निःशब्द को महसूस कर रहे थे।
.....वही मिलेगी कर्ण की काट....
अर्जुन कर्ण की पीड़ा को अब समझ पाए। किस प्रकार एक स्वर्ग सुंदरी ने अर्जुन को अपने अभिमान की बलि चढा दिया था, उसी प्रकार कर्ण कितनी बार ऐसी मार खा चुका है। द्रौपदी का हास्य अर्जुन के कानो में कौंध गया जो उसने दुर्योधन व् कर्ण पर बतौर तीर मारा था। तो इस विरल, विष से निकलती है तीरों की बौछार। शक्ति कर्ण की बाहूओ में नही है। शक्ति तो उस पीड़ा में है जो अर्जुन ने आज उर्वशी से पायी है। उर्वशी ने उसे अपमान की घुंटी नही दी अपितु उसे दर्पण दिखलाया है। सत्य है। वे एक स्त्री की काम दशा को कोई अंजाम नही दे पाये जब की वे स्वयम मंत्र मुग्ध थे। वे इतने पीड़ित थे की उन्हें उर्वशी की पीड़ा केवल वासना ही लगी।
तुम्हे क्या हो गया है अर्जुन? उनकी अपनी अंतरात्मा ने उनसे प्रश्न किया? काम था तो क्या? था तो अपने सत्य रूप में। जैसा था, जो था सो था। उर्वशी ने कमस्कम उनकी तरह असत्य भाषण तो नही किया। तभी तो वे शीश झुकाए वहा से चले आए। मन ही मन उर्वशी के सौन्दर्य को निहारना परन्तु उसके समक्ष ऐसा प्रस्तुत करना जैसे की कुछ हो ही नही? असत्य है। यह पौरुष किस प्रकार होगा? यह तो संयम भी नही है। मन में बीज फूटने के पहले ही उसे दबा देना और फिर अपनी सफाई देते फिरना, यह कैसा पुरुषत्व है?
कृष्ण उन्हें मुस्कुराते दिख पड़े। हा अर्जुन, यही शक्ति हासिल करने तुम्हे भेजा गया था स्वर्ग। तुम्हारा झूट चूर चूर हो गया है। अब सत्य को अंगीकार करो। वह जैसा है वैसा। जो है सो है!
अर्जुन आँखे मूँद कर सोने का प्रयास करने लगे।
उनकी आँखों के समक्ष फिर फिर उर्वशी जल में से बहार आकर खड़ी हो गई।
उनके कानो में अप्सराओ के स्वर गूँज रहे थे।
झूठे। भ्रमित।
क्या ये सत्य है?
हा है।
वे मानते है की वे भी काम के इतने ही अधीन है।
क्या सत्य ही वे उर्वशी को माता का स्थान देते है?
नही जानते।
बस इतना जानते है की उर्वशी की सुन्दरता उन्हें मोहित तो कर गई परन्तु इतनी भी नही की उन्हें अपनी धुरी से हिला सके।
उर्वशी में रूप का अंहकार है। विलासिता की देवी है वह। उन्हें इन सब से कोई सरोकार नही। परन्तु प्रेम बिना काम?
फिर तो वे बस इन अप्सराओं के हाथो का खिलौना भर सिध्ध हो जायेंगे। जब तक दिल किया ये स्वर्ग की देविया जिन्हें किसी वस्तु की कमी नही, उनके साथ खेलेंगी और जब मन भर जाएगा तो पुरुरवा की तरह एकांत में भटकने त्याग देंगी।
वे नही कर सकते अपनी मर्यादा के साथ खिलवाड़।
इससे पहले वे चित्रांगदा से प्रेम कर चुके थे। उलूपी ने उनका अपहरण कर लिया था परन्तु नागकन्या ने फिर भी उनके साथ ज़बरदस्ती नही की थी। इन अप्सराओ से तो वे नाग कुल की कन्याए सही थी।
अप्सराओ ने अवश्य ही अर्जुन के मन के युद्ध को भांप लिया होगा। तभी तो उनके समक्ष हंसती ही जा रही थी। परन्तु जब अर्जुन प्रेम में थे तो थे। उन्होंने कभी असत्य भाषण नही किया। किंतु ये अप्सराए केवल क्रीडा हेतु उन्हें मांग रही है। जब राजकुमार थे तो अनेको सेविकाए उनके साथ जलमग्न होने हेतु तैयार रहती थी, वह उनकी आजीविका थी। मन के डोरों को थामने का प्रयास अर्जुन भी नही करते यदि वह उर्वशी उनसे सचमुच प्रेम करती। जैसे कृष्णा ने किया। जैसे चित्रांगदा ने किया। जैसे राधे ने कृष्ण से किया। परन्तु काम हेतु वे किसी का खिलौना बनने के लिए तैयार नही है और न ही वे किसी के सेवक है।
वे कर्ण नही है जो केवल अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ण करने हेतु दुर्योधन के पीछे रहता है। कर्ण ने अपनी कुंठाओ का जंजाल द्रौपदी कांड में खोल कर रख दिया था। स्वर्ग की सुंदरी है तो क्या हुआ वे स्वयम को न्योछावर कर देते यदि वह स्पष्ट शब्दों में उनसे कहती की वह उनसे प्रेम करती है, उनके सुख-दुःख में साथ देने को तैयार है। फिर वे उनसे संतान उत्पत्ति भी कर सकते थे, उसका पालन, पोषण, सभी कुछ, परन्तु केवल कामाग्नि पूर्ति हेतु क्रीडा उनसे नही होगा। और आज वे स्पष्ट शब्दों में उर्वशी को समझा भी देंगे। फिर चाहे जो हो।
रात्रि का वह पहर भी आ गया। इन्द्र अपने आसन पर बैठे थे। उर्वशी ने नृत्य के पश्चात इन्द्र से वही रहने का अनुरोध किया।
"हे इन्द्र" धनजंय आपके पुत्र है तो क्या उन पर स्वर्ग के नियम लागू नही होते?
उर्वशी ने इन्द्र से प्रश्न पुछा।
इन्द्र ने अर्जुन की ओर प्रश्नचिन्ह दृष्टि से देखा। होते है यदि अर्जुन सहमति दे तो।
"हे इन्द्र" क्या कभी आपने स्वर्ग में संयम का दंड स्वयम पर लागू किया है?
"इसकी कभी आवश्यकता नही पड़ी उर्वशी"
इन्द्र ने उत्तर दिया।
उर्वशी लहरा कर इन्द्र दे सामने आ खड़ी हुई। तो हे इन्द्र आप मुझे ये बतलाये की यदि कोई अप्सरा किसी पुरूष पर आसक्त तो हो जाए तो क्या उस पुरूष का ये धर्म नही की उसके आसक्ति को तृप्ति प्रदान करे?
"इसका उत्तर तो केवल अर्जुन ही दे सकते है उर्वशी"
अर्जुन स्थान से उठ खड़े हुए।
हे देवी, यदि आप ही की तरह में भी काम के तीर से आहत हो काम की तृष्णा से पीड़ित होता तो अवश्य ही आप को अंगीकार करता परन्तु में केवल प्रेम की भाषा जानता हु।
हे अर्जुन क्या पुरूष का यह धर्म नही की एक स्त्री यदि अनुरोध करे तो उसकी ओर ध्यान दिया जाए।
अर्जुन गंभीर हो आए। हे देवी मेरे पूर्वज पुरु ने आपकी ओर ध्यान दिया। आपको रानी बनाया। आपने क्या कियाउनके पौरुष को धिक्कार कर आप फिर इन्द्रलोक आ गई।
में पुरु नही हु। में अर्जुन हु।
अर्जुन तुम तो पुरूष भी कहलाने के काबिल नही हो। तुम्हारी दृष्टि साफ़ कह रही थी तुम मंत्रमुग्ध थे।
हा देवी। में मंत्रमुग्ध था। परन्तु में आपका सेवक नही हु।
तो अर्जुन तुम पुरूष भी नही ho । यदि कभी अपने अंतर्मन से पूछो तो तुम्हारा मन तुम्हे बतलायेगा की तुम मेरे साथ अपना पौरुष इसलिए नही दिखला सकते क्योंकि तुम अपनी धर्मपत्नी की सुरक्षा नही कर पाये। तुम निर्वासित हो यहाँ केवल shstro की भीख हेतु आए हो। तुम अपना पौरुश्बल वही हस्तिनापुर की शतरंज पर रख आयेहो।
अर्जुन और नही सुन सकते थे। उनके अपने मन ने उन्हें इतना पीड़ित किया था। अब वे एक नारी के हाथो अपमानित नही हो सकते थे। कृष्णा ने उन्हें सूना सूना कर बधिर कर दिया था। हा में केवल और केवल शस्त्रों के लिए आया हु। में तुमसे प्रेम नही करता और न ही किसी के हाथो का खिलौना हु। में काम पूर्ति का साधन नही हु।
तो हे अर्जुन यदि तुम्हारा मन दर्पण कभी तुम्हे तुम्हारी सच्ची तस्वीर दिखाए तो उस दिन इस पुरूष का वेश त्याग देना। तब तुम न नर का रूप रखना और न ही नारी का। तुम पुरूष नही हो परन्तु तुम नारी भी नही हो।
इन्द्र उर्वशी को रोकते हुए कहने लगेशांत देवी। अपने शब्दों को सीमा दो। अर्जुन अवश्य ही तुम्हारे कथन पूर्ण करेगा परन्तु उसकी अवधि सीमित कर दो।
इन्द्र ने अर्जुन से अंततः कह ही दिया, हे अर्जुन ये स्वर्ग है। में इन्द्रियों का स्वामी हु, और इन्द्रियों का शमन यहाँ नही होता है अतैव तुम उर्वशी के श्राप को जीयोगे। परन्तु केवल एक वर्ष के लिए।
अर्जुन ने झुक कर प्रणाम किया व् चल दिए।

रिपुदमन !

अर्जुन टहलने इन्द्र के प्रासाद से बहार आ गए। सेब के बागान, उन पर लिपटी हुई फूलो के गुच्छोसे भरी हुई बेले, बादलो से ढका आसमान, और इस छोरसे उस छोर पर चमकता हुआ इन्द्रधनुष। गहरे हरीतिम वन, चौकडियाभरते हुए मृग, नन्हे नन्हे चीतल शावक, बाघ, बारह्सिंघ, यह सभी निर्भीक, बिना एक दूसरे से कोई वैर भावके शांत भ्रमण करते दिख पड़े।
विभिन्न प्रकार के मयूर पक्षी पंख फैलाये नृत्य करते व् श्वेत हंस झीलों में क्रीडा कर रहे थे।
इन्द्र के उद्यान में जल फवारो में उनकी अप्सराए जल क्रीडा कर रही थी। अर्जुन नही जानते थे वहा पैर रखना निषेध है। वे तो बस पृकृति के सौन्दर्य में उलझे न जाने कब वहा पहुच गए, नही जान पाए।
उन्हें देखते ही समस्त अप्सराओ का ध्यान उनकी ही तरफ़ आकर्षित हो आया।
अर्जुन इस अकास्मात मुठभेड़ के लिए तैयार नही थे। वे वही के वही खड़े रह गए।
उनके नेत्र स्वयम ही नीचे झुक गए।
परन्तु ये अप्सराए तो उन्हें देखती ही जा रही थी। यदि वे पृथ्वी पर होते तो कुछ और ही होता। स्त्री लज्जा से लाल हो आती, या तो अर्जुन की खैर नही, या स्वयम स्त्री ही भाग जाती। परन्तु यहाँ ऐसा कुछ नही।
वे सभी अप्सराए निर्निमेष अर्जुन को देखती ही गई। उन्हें ऐसा लगा के वे सभी उन्हें उन में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित कर रही थी।
अर्जुन ने हाथ जोड़ कर क्षमा मांग ली।
अप्सर्ये एक दूसरे की ओर देख कर हंसने लगी।
आओ धनञ्जय।
स्वर्ग की जल क्रीडा का आनंद उठाओ।
एक अप्सरा ने चुटकी बजाते हुए कहा, मनुष्यों की खासियत है, की कितने ही नयन चंचल क्यो न हो रहे हो परन्तु दिखाते ऐसा है जैसे दमन ही सर्वश्रेष्ट है। आर्य जाती तो यही करती है। काम का दमन। प्रेम का शमन। वीर्य से मुख चुरा कर ऐसा दिखलाती है जैसे की इनके अंगो में यह होता ही नही। मनुष्य इतना भ्रमित व् झूठा क्यो होता है?
दूसरी अप्सरा ने हँसते हुए कहा, लज्जा का गहना?
अर्जुन को ऐसा लगा जैसे वे बिन बात ही घिर गए है।
ये सभी अप्सराए इन्द्र की अमानत है।
वे सच्चे आर्य है, और दूसरो की अमानत की वे केवल रक्षा कर सकते है, भक्षण नही।
"ऐसे न हंसो" ये यहाँ अतिथि है।
हमारे स्वामी के सुपुत्र है।
अतः इन्द्रलोक पर इनका उतना ही आधिपत्य है।
उन सभी अप्सराओ में सबसे आकर्षक, स्वर्णिम आभा वाली एक नवयुवती जल में से निकल कर अर्जुन के समक्ष खड़ी हो गई।
उर्वशी!
ओह उर्वशी!
कोई आश्चर्य नही की पुरुरवा, अर्जुन के पूर्वज प्रेम में पागल हो अनंत अवधि तक विरह में भटके थे। उन्होंने राजपाट सब त्याग दिया था। तो वह उर्वशी ये थी। कोई आश्चर्य नही।
वह तो बनी ही प्रेम व् काम हेतु थी। लंबे सुनहरे केश, सर्प की भांति बलखाई हुई काया, स्वर्णिम त्वचा, बड़ी बड़ी गहरी काली आँखे, नए पीपल के कच्चे पत्तो जैसे अधर, अर्जुन उन्हें देखते ही रह गए।
उर्वशी मोहित हो अर्जुन को देखती ही रही।
पुरुरवा का अंश आज फिर उसके सामने जीवंत हो खड़ा हो गया था।
उर्वशी पुरु से प्रेम करती थी।
परन्तु इन्द्र के अधीन हो उसे स्वर्ग पर पुरु को त्याग कर आना पड़ा।
आज इतने वर्षो के पश्चात उसी पुरु कावंशज उसके सामने खड़ा था।
अर्जुन ने सविनय हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी।
उर्वशी ने सम्मोहन करने जैसे आवाज़ में कहा, अर्जुन हम अप्सराओ का धर्म केवल प्रेम व् आसक्ति ही है।
हम बंधी नही होती है।
हम किसी से भी प्रेम करने के लिए स्वतंत्र होती है।
"परन्तु मेरे लिए आप माता है" में पुरुरवा का वंशज हु। देवी न में गन्धर्व हु, न ही देव। में केवल एक मनुष्य हु अतैव मेरा धर्म मुझे यही कहता है की आप मेरी माता है।
क्योकि में इन्द्र पुत्र हु व् आपमेरे पिता की संगीनिया है अतैव में इस जल क्रीडा में सहभागी नही हो सकता।
अर्जुन दृष्टि झुकाए पीछे हट गए। कुछ दूर चल कर वे वापिस महल में अपने कक्ष में चले गए।
उन्हें यहाँ कुछ भी अच्छा लग नही रहा था।
वे कब से नारी-विमुख हो गए?
उर्वशी के क्रोध का ठिकाना न रहा।
पुरु जैसे दिखने वाले इस पुरूष को प्राप्त करने हेतु वह मचल गई थी।
कुछ भी हो जाए वह उसे पाकर ही रहेगी।
आज की रात्रि न्रित्य्सभा उर्वशी के यौवन से महकने वाली है। उर्वशी ने एक आखरी आसक्त दृष्टि अर्जुन के कक्ष पर डाली।
कौन है यह पुरूष जो उसेना कह गया?
वह इन्द्र की सर्वश्रेष्ठ न्रित्यांगना है।
अर्जुन की इतनी हिम्मत ? उसका आमंत्रण ठुकरा दिया गया?
उर्वशी इस पुरूष की कामाग्नि में झुलस रही थी।

Friday, March 27, 2009

दलदल !

एक गहरी खाई, गहरी और गहरी, बड़ी सी, विस्तृत, एक दलदल, कीचड ही कीचड, जिसमे पाव और नीचे और नीचे धंसता ही जा रहा है। कर्ण उस दलदल में फंसते ही जा रहे थे। हाथ मारे , पाव मारे , चीखे, कोई नही। उनके रथ का पहिया नीचे नीचे, और उस के साथ वे भी नीचे और नीचे, "मित्र मेरे होते हुए तुम्हे कोई हरा नही सकता", ऐसा वे सुयोधन से कह रहे थे परन्तु पृष्ठभूमि में न जाने कौन यह कह रहा था...... यदि तुम रहे ही नही तो........ सुयोधन का फिर क्या? .... किस की आवाज़ थी वह? .... कुछ जानी पहचानी सी.......कर्ण की साँस घुटने लगी.... उन्हें अपने प्राण जाते से प्रतीत हुए.....आँखे फटने लगी, भय व् कौतुक ने उन्हें और अधिक जकड लिया....
गहरी नींद से कर्ण उठ बैठे। प्रातः होने को थी। ब्रह्ममुहूर्त का स्वप्न। सच होता है। सुना है ऐसा।
कर्ण का सर पीड़ा से फटा जा रहा था। वह आवाज़ किसकी थी? सुनी सुनी सी। कौन है सुयोधन का शत्रु जो स्वप्न में उन्हें चेतावनी देने आया था?

कर्ण ने स्वयम को दर्पण में देखा।
वे किसी राजकुमार से कम नही लगते। अपितु दूसरो से कुछ बढ़ कर लगते है।
उनके रूप, रंग, सदचरित्र के चर्चे है। सुयोधन से सामीप्य की वजह से उन्हें हर तरफ़ प्रतिष्ठा प्राप्त है। ... परन्तु यह कितना सत्य है? यदि सुयोधन न होता तो?
कौन है वह?
क्या पहचान है उसकी?
वह एक सूतपुत्र है।
तो क्या?
वह सूतपुत्र है तो उसका क्या दोष है?
उसकी माता कौन है?
कर्ण ने सुना था की कवच कुंडल उसके साथ ही पाए गए थे। अर्थात वह किसी कुलीन राजवंश से है। कदाचित सूर्य वंश से क्योकि कवच कुंडल पर सूर्य की मोहर है। कर्ण ने अपने कवच कुंडल ध्यान से देखे। वे इन्हे प्रतिदिन देखते है। इन्हे देख देख कर वे अपने सूतपुत्र होने की कमी को कुछ सीमा तक महत्वाकांक्षा के शिखर पर लाने का प्रयास करते है, परन्तु न जाने क्यो कुंठा उन्हें दिन प्रतिदिन जकड़ती जाती है।
वे वह दिन कभी नही भूल पाये जब द्रौपदी ने सूतपुत्र कह कर उन्हें स्वम्वर में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन नही करने दिया। उन्हें कब स्त्री की आसक्ति थी? वे तो केवल अपने मित्र के लिए उस तुच्छ मत्स्या को अपने तीर से मार कर यह बतलाना चाहते थे की महाराज द्रुपद की शर्त कोई असंभव नही थी। फिर भी अर्जुन बाज़ी मार ले गया।
अर्जुन...अर्जुन...अर्जुन! कर्ण थक गए उस नाम को लेकर। जिसे देखो बिन बात ही उन्हें अर्जुन से स्पर्धा में लगा देता है। फिर अर्जुन इसलिए जीत जाता है क्योकि वह अवैध नही है। क्योकि उस पर राजवंश की मोहर है। क्योकि कर्ण की माता का नाम कोई नही जानता परन्तु ये सभी जानते है की वह एक सूतपुत्र है।
कर्ण आज प्रातः के स्वप्न में डूब गए।
आज उन्हें हस्तिनापुर में जाना होगा। सुनते है कृष्ण कुंती बुआ से मिलने आने वाले है।
जाते जाते कुछ राजकार्य हेतु दरबार में ही रुकेंगे।
अवश्य ही शकुनी व् दुर्योधन आज दरबार से कही नही जायेंगे।
कर्ण से कहा गया है वहा रहने के लिए।
कर्ण जानते है दुर्योधन केवल अपना बल दिखलाने के लिए उन्हें अपने साथ लिए फिरता है, परन्तु फिर भी वे आभारी है, जब उनके अपने माता पिता ने उन्हें त्याग दिया तो दुर्योधन का यह एक स्वय्म्केंद्रित आभार भी उन्हें अधिक ही प्रतीत होता है। वे उसकी कीमत अवश्य चुकायेंगे चाहे कुछ भी क्यो न हो। चाहे उनके प्राण ही क्यो न चले जाए और आज उन्होंने अपने प्राण जाते देख लिए थे... वह आवाज़ किस की थी?

Wednesday, March 25, 2009

इन्द्र! स्पर्श, दर्श, रसना, नृत्य, कला, सौंदर्य, वस्त्र, आभूषण......यह मायावी नगरी जाने कहा से प्रारम्भ होती है, जाने कहा सीमित हो जाती है? यह ऐसी दिखती है जैसे किसी नवयौवना ने अपने अनमोल आभूषण रात्रि में इस समस्त आकाश पर बिखेर दिए हो। तारो की तरह टिमटिमाती इस नगरी में प्रलोभन हाथो में स्वागत के फूलमाल लिए खड़े ही रहते है। यौवन यहाँ अधखिली कलियों से ही बाँध तोड़ तोड़ कर अटखेलिया करने हेतु बहने लगता है। गन्धर्व, किन्नर, और न जाने कितने प्रकार के आकर्षक युवक-युवतिया हाथो में नृत्य वाद्य लिए कर्णप्रिय सुर लगाये फिरते रहते है। सोमरस की मादकता इस नगरी की प्रत्येक स्त्री, प्रत्येक युवक में दिखाई पड़ती है। वय स्वर्णिम आभा से झिलमिलाती रहती है। विलास यहाँ हर अटारी पर आलस्य से भरा रेशमी वस्त्रो में लिपटा पड़ा रहता है। वृक्ष अनेक प्रकारों के फूलो से लदेहुए है। जिनकी सुगंध राह चलती हवाओ में बसी हुई है। यह इन्द्र की नगरी है। उसके राजदरबार में काम रति के साथ पैरो में घूँघरू बाँध मादक नृत्य करता रहता है। यहाँ रहने वालो को मनुष्य नही कहते। यहाँ की मादा को अप्सरा कहा जाता है। यहाँ के नरो को गन्धर्व कहा जाता है। संगीत उनका धर्म है। नृत्य उनके प्राण है। यौवन उनकी चिर स्थायी संपत्ति है। यहाँ बसने वाले मनुष्यों की भाँती पसीने से तर बतर नही होते है। इसे स्वर्ग कहा जाता है। यह प्रकृति का वह अंश है जो जीविका कमाने के लिए नही अपितु केवल प्रेम व् सौन्दर्य जीने के लिए बना है। मनुष्यों के स्वप्न जगत का एक हिस्सा जिसे पाने के लिए मानव ज़रा आने तक तरसता है।
प्रजापति इन्द्र जिस भूखंड पर रहते है, किसी भी दृष्टि से भूपति नही कहलायेगा। इसे कहा जाता है स्वर्ग। हिमालय की गोद में उतर कर, कैलाश पर्वत पर पहुचने से पहले ही इन्द्रलोक पड़ता है। समुद्रतट से बहुत ही ऊंचा, जम्बुद्वीप पर सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित होने की वजह से इसे स्वर्ग नाम दिया गया है। यह स्थान सदैव ही बादलो से घिरा हुआ है। यहाँ रहने वालो को देख कर नही लगता वे मनुष्य है। उन्हें जैसे इश्वर ने मनुष्यों पर केवल राज करने के लिए बनाया है। काम-मुखी अप्सराए यहाँ तितलियों की तरह बाहर से आए हुए युवको, व्यापारियों, योद्धाओं पर इतराती फिरती है। हा, इन्द्र की आज्ञा के बिना यहाँ कुछ नही होता है। यहाँ प्रत्येक अप्सरा इन्द्र के आधीन है। यदि वे आज्ञा दे तो ही कोई अप्सरा किसी पुरूष से लिप्त हो सकती है अथवा नही। वह आजीवन इन्द्र जो स्वर्ग का देवता है, उसकी दासी बन कर रहेगी। इन अप्सराओं को देख कर नही लगता की वे ऐश्वर्य को त्यागना कभी पसंद भी करेंगी।
"ये तो कभी जंगलो में कृष्णा की भाँती कभी नही चल पाएँगी", अर्जुन ने मन ही मन सोचा।
कृष्ण ने अर्जुन को इन सभी के बारे में समझा दिया था। परन्तु समझाने से क्या होता है? यात्रा तो अर्जुन को करनी है। संवेदनशील अर्जुन अभी भी कृष्ण को कोस रहे थे। एक तरफ़ कह गए योद्धा बनो। पुरुषार्थ पहचानो। और दूसरी ओर ऐसी नगरी में जाने बोल दिया जहा की युवतिया बस आँखे फाड़ फाड़ कर उन्हें आमंत्रण दिए जाती है। उनका क्षत्रिय रक्त वीर रस त्याग कर कही सौन्दर्य रस में न डूब जाए।
इस नगरी की चकाचौंध देख कर वे पसीने पसीने हो आए।
ऐसा नही है की वे नारी से डरते है। महलों में दसियों का जमघट, व् राजाओ के प्रासादों में क्रीडाये हेतु जब तब सुन्दरियों से सामना होता है रहता है, परन्तु तब वे राजकुमार हुआ करते थे।
नियति ने उन्हें पटककर औंधा मुह गिरा दिया है। अब वे केवल एक धनुर्धर है।
इतना डर तो तब भी नही लगा था जब पानी में ऊपर गोल घूमती हुई मत्स्य की आँख को भेदना था।
यहाँ तो वे स्वयम एक मत्स्या की तरह महसूस कर रहे थे। जैसे अर्जुन ऊपर लटक कर गोल गोल फिर रहे हो, और नीचे साक्षात् कामदेव रति को आलिन्गंबध्ध कर हाथो में तीर लिए अर्जुन को निशाना किए खड़े हो।
पल भर में समझ गए अर्जुन।
कृष्ण...... यह केवल कृष्ण का काम है।
अर्जुन मन ही मन मुस्कुरा उठे।
कृष्ण भी बहुत अजीब ढंग से प्रशिक्षण देते है।
इन प्रलोभनों में से होकर अब इस धनुर्धर को दिव्य शस्त्र पाने होंगे।
....और एक परीक्षा ...............
परन्तु सामने आते हुए ऐरावत व् इन्द्र, और उसकी भव्यता सुन्दरता से आवाक अर्जुन जहा खड़े थे, वही खड़े रह गए।
उन्हें याद आई कृष्ण की रहस्यमयी मुस्कान, युद्ध, जीतना है तो इन्द्र की शरण में जाओ।
वे मुझे जितवाना चाहते है या इन सुन्दरियों के हाथ मरवाना?
इससे तो गुरु द्रोणाचार्य ही ठीक थे जो रात्र भर एक पैर पर खड़ा कर अभ्यास लेते थे।
जाने क्या मज़ा आता है कृष्ण को ये सब करने में?
अर्जुन इन्द्र के साक्षात्कार के लिए आगे बढे।